गाढ़ी पीली शाम का साया लंबा हो रहा है… वेस्टइंडीज़ क्रिकेट का सूर्य डूब रहा है

क्रिकेट के खेल में किसी पूर्व के प्रतिभट को इस तरह से शायित, हताश और युद्ध से विमुख देखना विषण्णकारी है।

मैं लगभग यह विश्वास ही नहीं कर पाता कि ये वेस्टइंडीज के ही खिलाड़ी हैं। इनकी न तो कोई देहभाषा रह गई है, न कोई कला रही, ना पूर्व की प्रतिष्ठा का अंशमात्र बाकी रहा और ना ही किसी तरह का पौरुष बच सका..! और वह प्रभुत्व तो जैसे कोई पौराणिक कथा की स्मृति भर हो।

परिवर्तन संसार का अटल सत्य है परंतु यह परिवर्तन मुझे तोड़ता है। मैं वेस्टइंडीज को भारत के हाथों तीन दिनों में परास्त होते हुए देखता हूं तो मुझे लगता है कि यह क्रिकेट का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण और अन्यायी सत्य है। एक सुदीर्घ श्वास भरते हुए मैं किसी पुराने चलचित्र को याद करता हूं तो मुझे कुछ दुर्धर्ष योद्धा दीखते हैं..

एक सनसनाती हुई गेंद की चोट से किसी कलात्मक ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज के विकेट को जिमनास्ट की भांति गुलाटियां खाते हुए पाता हूं और तभी स्लिप में कुछ धुरंधर मार्शल की पीठ पर हाथ रख कर मुस्करा रहे होते हैं जबकि स्वयं मार्शल, होल्डिंग, गार्नर…या रॉबर्ट्स जैसे गेंदबाज़ कह रहे होते हैं कि नहीं..! नहीं! कुछ खास कला नहीं थी इस गेंद में! वह तो बल्लेबाज़ ही चूक गया। लेकिन सच तो यह कि गेंद और बल्ले का जैसा संतुलन वेस्टइंडीज ने कायम किया था वैसा कभी कोई और न कर सका।

पूरी दुनिया ने वैसे सहज एथलीट खिलाड़ी नहीं देखे। महान होल्डिंग तो जैसे गेंद को छोड़ भर देते थे और वह सर्वगुणसंपन्न होती थी। उछाल, स्विंग, संतुलन और रफ्तार से लैस।

मार्शल दस कदमों से दौड़कर सौ कदमों का असर पैदा करते थे। क्रिकेट के मैदान पर वैसा आतंक आज तक कोई और नहीं जमा सका। रफ्तार ऐसी कि लिटिल मास्टर के हाथों से बल्ला उखाड़ कर गली तक पहुंचा दे। जबकि स्वयं लिटिल मास्टर कहते थे कि नई गेंद से गेंदबाज़ी करते हुए एंडी रॉबर्ट्स कई बार अझेल होते थे। किस-किस का नाम लूं और किस किस को भुला दूं।

रंगभेद के प्राचीर पर खड़े होकर अट्टहास करने वाले पश्चिमी देश कभी इन कालुओं के भुजदंड से भय खाते थे। वेस्टइंडीज के प्रहार से भला कौन बच सका था? किस दिग्गज को उसने अपनी जंघाओं के नीचे नहीं रखा… और किस धुरंधर गेंदबाज़… बल्लेबाज़ को उसने पानी नहीं पिलाया!

मुझे याद है, सत्तर के दशक में एक बार वेस्टइंडीज़ और इंग्लैंड के बीच श्रृंखला चल रही थी। शाम का खेल खत्म होने तक एक या दो विकेट गिर चुके थे, गैरी सोबर्स ने मोर्चा सँभाला ही था।

खेल खत्म हुआ और पब की रंगीनियां पसर गईं। पियक्कड़ क्लाइव लॉयड, सोबर्स को खींचे लिये गए। फिर तो रात की प्रत्यंचा ढीली पड़ती चली गई। दोनों ने सुबह के चार बजे तक शराब पी। होटल पहुंचते हुए दोनों नशे में धुत थे। यह बात और थी कि चार घंटों के बाद उन्हें मैदान पर मोर्चा संभालना था।

सोबर्स ने नींद को टाल दिया। यहां तक कि शावर के नीचे भी नहीं गए कि पानी की धार और कमजोर करेगी। लेकिन जब वे मैदान पर उतरे तो उन्हें दो-दो बॉब विलिस नज़र आ रहे थे। सोबर्स ने कहा था कि एक दो ओवर तक तो उन्हें किस्मत ने बचा लिया, फिर किस्मत की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। सोबर्स ने सभी गेंदबाजों को धुनते हुए उस मैच में 154 रनों की यादगार पारी खेली थी।

वेस्टइंडीज़ का क्रिकेट ऐसी विचित्र कहानियों से भरा पड़ा है। 1983 के विश्वकप फाइनल में भारत से हार के बाद वेस्टइंडीज ने हमारे देश का दौरा किया था और वन-डे सीरीज़ में हमें 5-0 से रौंद डाला था। तब महान विवियन रिचर्ड्स से किसी पत्रकार ने पूछा था कि यह कैसे हुआ.. तो चुइंग गम चबाने वाले उन कुख्यात जबड़ों को ज़रा टेढ़ा करते हुए रिचर्ड्स ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा कि गुरु हर कुत्ते का एक दिन होता है..!

आज वही वेस्टइंडीज़ जैसे खेल को ढो रहा है। वहां भी भयंकर राजनीति है और अर्थाभाव ने लोगों को बास्केटबॉल की और झुकाया है। वेस्टइंडीज़ की टीम पिछले कई वर्षों से खराब खेल रही है।

महान लारा के लास्य के बाद तो उसकी सारी कांति ही जैसे जाती रही। बल्लेबाज़ों में लारा उस लीग के अंतिम नक्षत्र थे। माफ कीजिए… मैं क्रिस गेल को उस पांत में नहीं रखता।

और गेंदबाजों में महानतम मार्शल की मृत्यु के बाद तेज़ गेंदबाज़ी को किसी प्रेत की छाया ने ढंक लिया। ऐसा लगता है जैसे मार्शल अपने साथ ही उस कला को ले गए। वैसे भी एंडी रॉबर्ट्स ने पाँच साल पहले ही कहा था, कि फास्ट बॉलर्स आर डेड…

मैं निकट भविष्य में इस महान क्रिकेट टीम का पुनरुत्थान नहीं देख पाता। इसकी कोई संभावना ही नहीं है। वेस्टइंडीज़ में अब क्रिकेटर नहीं होते। वहां के स्टेडियम में अब उन महान खिलाड़ियों के स्टैंड भर हैं। वेस्टइंडीज़ क्रिकेट का सूर्य डूब रहा है गाढ़ी पीली शाम का साया लंबा हो रहा है..!

सशक्त देश में ही खेल और खिलाड़ी पनपते हैं, मरे हुए देश का खेल भी मर जाता है

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