काशी का ठग : चिट भी मेरी, पट भी मेरी; नहीं चलती साहब!

बीते कई दिनों से हमारे आसपास ऐसे संदेशों की भरमार सी हो गई है जो काशी के ठगों के कुशलता की विषय में बात करते हैं। फिर एक राजनेता द्वारा उन ठगों को ठगे जाने की बात करते हैं।

संयोग से चार दिन पहले घर आने के क्रम में आधे घंटे के लिए काशी में उतरा था। तब इन संदेशों की ओर सहज ध्यान चला गया।

बनारस में रहते हुए या उससे पहले बचपन से ही हम उस शहर के विषय में कई बातें सुनते आए थे। फिर बात चाहे वो उसके विश्व के सबसे पुराने जिंदा शहर होने की हो, ‘मरणं मंगलम यत्र…’ जैसी युक्तियां हो; या ‘राँड़, साँड़, संन्यासी, इन से बचें तो सेवे काशी’ जैसी इस शहर की मस्ती।

पहली बार जब मैं वहाँ गया था तो ‘भौकाल’ जैसे शब्दों से पाला पड़ा। ये ‘गुरुओं’ का शहर था, ‘अउर बताओ गुरु! से शुरू होने वाले संवाद, भो… वाले गाली से खत्म होते थे। हर-हर महादेव और जय-जयकारों में अपनी मस्ती ढूंढने वाले इस शहर में वो गाली, गाली न होकर भोले के प्रसाद की तरह था। इसलिए उसे वहाँ लोग गाली मानते भी नही।

आम बनारसी जीवन को फक्कड़ की तरह जीने वाला होता है। जिस धरती से महान दर्शन निकलते हैं, वहीं चार्वाक के चेले भी होते हैं जो इन तमाम दर्शनों को ठेंगे पर रखकर चलते हैं। बनारस अपने मिजाज़ से बनारस है। इसमें काशी भी बसती है और अभिजात्य सी हो चली वाराणसी भी। इसीलिए बनारस अपने अल्हड़पन में भी एक अजीब सी ‘सोफिस्टिकेशन’ लिए होता है।

काशी मोक्षदायिनी है क्योंकि ये जीवन के महत्व को जानती है। कहते हैं काशीवास का लाभ किस्मत वालों को ही मिलता है। बाबा विश्वनाथ, संकटमोचन, काल भैरव की ये नगरी विशेष इसलिए है क्योंकि ये आपको एक-एक पल जीना सिखाती है। वरुणा और असि अपने मृतप्राय से अस्तित्व के बावजूद भी प्रासंगिक हैं। ये ऐसा शहर है जहाँ एक बार रह लेने वाला इसे ‘मेरी काशी’ ही कहता है।

काशी अपने महत्व के साथ बीते चार-पाँच सालों में और अधिक चर्चित हो गई है। प्रधानमंत्री मोदी के सांसद बनने से इस शहर के चर्चे बढ़ गए हैं, इसकी चमक-दमक बढ़ गई है। यहाँ पर्यटक बढ़ गए हैं। इस बार ट्रेन में मेरे कम्पार्टमेंट में पाँच यात्री विदेशी थे। उनमें एक अकेली यात्रा करने वाली नवयौवना भी थी। ज़ाहिर है, हमने विदेश के मोर्चे पर जो कार्य किया है, वो यहाँ भी दृष्टिगोचर हुआ है। अगर हज़ारों किलोमीटर दूर कोई महिला अकेले नॉन-एसी स्लीपर कोच में यात्रा कर पा रही है, तो ये उसका हम में बढ़े विश्वास का ही नतीजा है!

चमचमाती हुई काशी के विषय में जब सरकार या भाजपा से जुड़े लोग बात करते हैं तो मुझे हँसी आती है, क्योंकि वो अतिशयोक्ति करते हैं। प्रधानमंत्री के हालिया बनारस यात्रा में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अपने भाषण में मोदी से प्रेरणा लेने की बात कर रहे थे। इस दौरान वो कह गए कि मोदीजी उन्हें अब भी प्रेरित करते हैं, और जब वो 1977 में बीएचयू के छात्र संघ के महासचिव थे, मोदीजी उन्हें तब भी प्रेरित करते थे। अब पता नही अध्यक्ष महोदय तब ये प्रेरणा कैसे लेते थे! मालवीय जी को भारत रत्न दिए जाने पर भी नेताओं का लहज़ा ऐसा होता है जैसे उन्होंने कोई एहसान किया हो!

लेकिन ये बड़ी बात नहीं है। सत्ता के आस-पास ऐसे लोग हो ही जाते हैं। ये ऊपर बैठे लोगों पर है कि वो इनको कैसे संभालते हैं। वर्ना ‘यशस्वी-प्रधानमंत्री’ हाल के वर्षों के सबसे मज़ेदार जुमलों में है। ऐसा कि जैसे कोई दूसरा शब्द बना ही नहीं।

लेकिन इन सबके भीतर अच्छे प्रयासों को नही दबना चाहिए। हम भारतीय भूलते बड़ी जल्दी हैं, इसलिए हम 2013 भूल गए है। प्रधानमंत्री जब अपने कार्यों का उल्लेख करते हैं तब हम ऊब तो जाते हैं, लेकिन तब हम वर्तमान में होते हैं। हम यदि चार साल पीछे लौटें तो पता चलेगा कि परिस्थितियां कितनी बदली हैं। मैं मानता हूं कि विकास अवश्यम्भावी है। हम सब यही मानते हैं। हम मानते हैं कि जो भी सत्ता में होता ये करता ही, उसे ये करना ही होता! लेकिन अतीत इसकी गवाही नहीं देता।

प्रधानमंत्री को काशी के ठगों का ठग कहने वाले शायद आईना देखना भूल जाते हैं। मत भूलिए कि जिस काशी का जिम्मा उनपर आया था वो रसातल में थी। चार साल पहले अस्सी घाट की सूरत सबने देखी थी टीवी पर। आज ज़रा घूम आइए वहां! ये वही लोग हैं जो प्रधानमंत्री की हर काशी यात्रा पर हो-हल्ला करते हैं, मगर फिर काशी को ठगने का आरोप भी लगाते हैं। चिट भी मेरी पट भी मेरी नहीं चलती साहब!

चमचमाते हुए घाट अब बनारस की यूएसपी हैं। वहाँ बिजली के लटकते हुए तार नहीं दिखते। हेरिटेज लाइटिंग और अंडरग्राउंड केबलिंग ने शहर को सुंदर बनाया है। गैस पाइपलाइन-उज्ज्वला योजना ने जीवन को सुलभ बनाया है। बनारस के चारों रेलवे स्टेशन शहर को चार चांद लगाते हैं। शिवगंगा-महामना-जनशताब्दी जैसी ट्रेनें शासन के प्राथमिकता को दर्शाती हैं। वीवीआईपी एमपी होने का दंश अलग होता है। लेकिन जब कैबिनेट के मंत्री बनारस के ‘मिनी-पीएमओ’ में ड्यूटी देते हैं तो उस बात की संभावना भी खत्म हो जाती है।

मैं, सत्तर सालों में क्या हुआ जैसी किसी बहस में नहीं पड़ना चाहूँगा। मगर इन चार वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण ये हुआ है कि बनारस के लोगों का अपने पहचान को लेकर स्वाभिमान कई गुणा बढ़ गया है। काशी को अपनी कर्मस्थली बनाने वाले महामना मालवीय की अबतक तो उपेक्षा ही हुई थी। ऐसे में जब लोगों ने अपने कार्यकाल में ही खुद को ‘भारत-रत्न’ घोषित कर लिया था, महामना को ये सम्मान न देने के क्या कारण रहे होंगे?

बनारस में 2016 में सरकार ने राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव का आयोजन कराया था। उस दौरान मुझे प्रधानमंत्री द्वारा ‘आदर्श-ग्राम योजना’ के अंतर्गत चुने गए गाँवों जयापुर और नागेपुर में कलाकारों को लेकर जाने का मौका मिला था। आधुनिक विकास के हर पैमाने पर फिट बैठते हैं ये गाँव। अब सुना है कि अगले साल वहाँ विदेश मंत्रालय के प्रवासी-भारतीय सम्मेलन का भी आयोजन होना है।

बनारस के सांसद के पिछले चार वर्षों के कार्यों का ब्यौरा लिखने के लिए एक लंबी सीरीज़ लिखनी होगी। बहुत कुछ बदल गया है वहाँ, ट्रॉमा सेंटर और कैंसर संस्थान से लेकर क्षेत्रीय नेत्र संस्थान तक; अकेले बीएचयू को ही इतना सब मिला है, भारत अध्ययन केंद्र से लेकर अटल इन्क्यूबेशन सेंटर और वैदिक विज्ञान सेंटर तक। कल तक जिस विश्वविद्यालय को अपने पहचान को लेकर जद्दोजहद करना पड़ता था, उसे सरकार का सहयोग भर मिल जाने से अंतर्राष्ट्रीय महत्व मिलने लगा है।

इन वर्षों में जापान, जर्मनी और फ्रांस जैसे तीन देशों के राष्ट्राध्यक्ष बनारस आए। उन्होंने वहाँ आरती देखी। जर्मनी के राष्ट्रपति ने तो बीएचयू के छात्रों से संवाद भी किया। वो जर्मनी की सबसे बड़ी समस्या का समाधान भारत में ढूंढ रहे थे। उनके सवालों से लग रहा था कि जैसे हम ही उनकी उम्मीद हैं। मुझे उनकी आँखों में एक जिज्ञासा दिख रही थी, क्योंकि वो हर एक जवाब के बाद वापस प्रश्न करते थे। ऐसे कि एक घंटे से कम समय के लिए तय कार्यक्रम में वो डेढ़ घंटे से अधिक सवाल करते रहे।

मगर आपका क्या! आप तो विकास न होने का रोना भी रोएंगे और श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधा के लिए विश्वनाथ मंदिर से घाट तक कॉरिडोर बनाए जाने पर काशी के प्राचीनता की हत्या का आरोप भी लगाएंगे।

ठीक भी है, काशी की खूबसूरती उसके काशी होने में ही है। इसलिए मैं कभी नहीं चाहता कि काशी क्योटो हो जाए! काशी तबतक ही ज़िंदा है जबतक वहाँ साँड़ और मानव एक ही सड़क पर एक साथ चल पाएं! काशी चौड़ी सड़कों में नहीं है, अपनी गलियों में है। प्रधानमंत्री ने जब काशी को क्योटो बनाने की बात की होगी तब उनका आशय भी यही रहा होगा।

आप विरोध करिए! विरोध ज़रूरी भी है। वो जायज़ होगा तो हम भी आगे बढ़कर आपसे पहले विरोध जता देंगे। लेकिन सिर्फ विरोध करने के लिए तो विरोध मत ही करिए!

धर्म आचरण का विषय है, पूजा-पद्धतियों तक सीमित नहीं

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