हिसाब बराबर होगा… कालिका खप्पर भर कर रक्तपान करेगी

हिसाब होगा!!

बराबर होगा!!

चित्र में स्त्री के हाथ में कटा शीश देख रहे हैं?

यह पहला सदमा था, उस दुर्जेय शक्ति के लिए, जो विगत 25 वर्ष से इस गलतफहमी में जी रहा था कि मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता!!!

विगत हजार वर्षों से, जिहादी, यूरोपियन्स, चर्च, कम्युनिस्ट, मैकालेवादी और सेक्यूलर्स द्वारा मातृभूमि की अस्मिता तार तार करके जो घाव दिये गए हैं उनका कोई पार ही नहीं है।

प्रकृति में बिना हिसाब का कुछ नहीं होता।

जिसने जो किया है, उसे भुगतना अपरिहार्य है!!

हिसाब जितना देरी से होता है, उतना ही भयावह होता है। सूद समेत।

रावण का हिसाब 14 वर्ष में हुआ, महाभारत 100 वें वर्ष में और नकली स्वतंत्रता सेनानियों का 70 वर्ष में।

इन हजार वर्षों का हिसाब कब होगा?

जब भी होगा, अत्यंत वीभत्स होगा।

कालिका खप्पर भर कर रक्तपान करेगी।

घोर स्वर में डमरू बजेगा।

शिव का प्रलयंकारी तांडव होगा।

हिमाचल के खण्ड पिघलकर टूटेंगे।

बदला लिया जाएगा, उन वारिसों से जो आज भी उत्पीड़क की परंपरा का वहन कर रहे हैं।

हे मी लाड्ड,,,,, हे बुद्धिजीवी, हे मीडिया, हे धिम्मी,,, हे बड़के सेक्युलर,,,!!
तुमको क्या लगता है, भारत टूट गया है?

आज जो हँस रहे हैं, कारसेवकों पर गोली, गोधरा, 1947 के दंगे, नोआखाली, मुजफ्फरनगर, भगवा आतंकवाद, साध्वी प्रज्ञा पर हुए अत्याचार, टुकड़े टुकड़े गैंग, सबरीमला, आधीरात को न्यायालय में मजमा, पद्मावती, चंदन गुप्ता, कमलेश तिवारी, असीमानंद, 1984 का नरसंहार, छलकते मूत्र के जाम, और सोच रहे हैं कि उनका कुछ भी नहीं बिगड़ा?

जो नित्य नये षड्यंत्र में मशगूल हैं।

जो एक सहिष्णु को मृत्यु की हद तक खुरच रहे हैं!!

जो सोई हुई देवी के आंचल खींचकर स्वयं को विजयी घोषित कर रहे हैं।

जो एक भोले समाज को कुंठाओं का घोल पिला अट्टाहास कर रहे हैं!!

जो एक मूर्छित अबला की आबरू लूटने को उन्मत हैं।

जो अपनी गुंडागर्दी की ताकत को अजेय अस्त्र मान बैठे हैं।

जो मातृभूमि, मातृभाषा और मातृसंस्कार को व्यंग्य में उड़ा देते हैं।

जो एक घायल,वृद्ध, अपाहिज को लात मारकर खुद के ताकतवर होने के दम्भ में

जी रहे हैं!!

जो एक रुग्ण की असहायता का लाभ उठाकर, उसके अलंकरण उतारने में व्यस्त हैं।

जो यज्ञवेदी के चारों तरफ मदिरा पीकर नन्गे नाच रहे हैं!!
होगा, सबका हिसाब होगा!!

जैसे खेत के स्वामी की अनुपस्थिति में सुअरों का समूह उत्पात मचाता है, और उसके कुत्ते बाद में एक एक को फाड़कर लहू की धारा बहा देते हैं, वैसे ही हिसाब होगा।

जैसे 13 वर्ष दुःसह अपमान की अग्नि में जलते हुए भीमसेन ने छाती फाड़कर लहू पिया, वैसा हिसाब होगा!!

जैसे अनेक मंदिरों का उध्वंसक अफजल खान, प्रतापगढ़ की तलहटी में ठोकरें खाते हुए, हाथों द्वारा पेट से बाहर निकली अंतड़ियों को संभालते हुए प्राणों की भीख मांगने लगा, वैसे हिसाब होगा!!

जैसे जलती हुई चिता पर, सामने उछलते यमराज को देख, भल्लाळदेव आतंकित हो गिड़गिड़ाने लगा, वैसे हिसाब होगा।

कोई भ्रम में न रहे कि हिसाब बाकी रहेगा!!

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