आपकी वैज्ञानिकता भी विज्ञान पर आपकी ‘आस्था’ से ज्यादा और कुछ भी नहीं

कुछ शंकालु आत्माएं सनातन पर वैज्ञानिकता का प्रहार करती हैं और हम भी जवाब में वैज्ञानिकता का डंडा लेकर बचाव में उतर आते हैं।

भाई, अब आप जीतें या हारें, पर आप उनके मैदान में उतर आए और उनके नियमों से खेलने लगे। उनके लिए तो यही जीत है।

जरा ऐसे सोचें… क्यों सनातन को वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरा उतरना है? क्यों पड़ें हम अपना वैज्ञानिक दृष्टिकोण सिद्ध करने के फेरे में? क्यों गिनाएं हवन और यज्ञ के वैज्ञानिक फायदे, जनेऊ की वैज्ञानिक उपयोगिता, मंत्रों की शक्ति के वैज्ञानिक तथ्य? अध्यात्म को विज्ञान से अप्रूवल लेने की, मान्यता और स्वीकार्यता खोजने की क्या गरज है?

हमारे वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवतम में ब्रह्मांड की संरचना की एक व्याख्या है। अब अगर वह विज्ञान की दी हुई आपकी व्याख्या से हूबहू मेल नहीं खाती तो यह हमारी समस्या क्यों हो?

वेदों में जो व्याख्या है, वह किसी भौतिक उपयोगितावादी उद्देश्य से नहीं दी गई है। किसी ऋषि को ग्रहों उपग्रहों पर अंतरिक्षयान या स्पेस में सैटेलाईट नहीं भेजने थे। वह उनके लिए काम की वस्तु नहीं थी।

वे ऋषि आज होते तो भी वे स्मार्टफोन लेकर नहीं घूम रहे होते, ना ही एप्पल के मैकबुक को देखकर चमत्कृत हो रहे होते। वे एक सूक्ष्मजगत में रहते थे, एक आध्यात्मिक दृष्टि से सृष्टि को देखते थे। उनके ऑब्सर्वशन्स उनकी दृष्टि का सत्य थे। अगर आपके पास वह दृष्टि नहीं है तो आप वे सत्य नहीं देख सकते… यह आपकी समस्या है, सनातन की नहीं।

आप अपने आपको वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला समझते हैं, पर आपकी वैज्ञानिकता भी विज्ञान पर आपकी ‘आस्था’ से ज्यादा और कुछ भी नहीं है। आपको नासा कुछ बताता है, कहता है कि उसके स्पेस स्टेशन या उसके यान वॉयेजर ने कुछ पाया है… या वैज्ञानिकों ने हब्बल टेलिस्कोप से कुछ देखा है… आप उसे सत्य मान लेते हैं।

आप हब्बल टेलिस्कोप के आसपास भी नहीं फटके पर आपके लिए वह सत्य है क्योंकि आपकी उनमें ‘आस्था’ है। अगर आपकी आस्था नहीं होती और आप कहते कि ऐसा कोई टेलिस्कोप है ही नहीं, या वॉयजर कभी अंतरिक्ष में गया ही नहीं, तो किसी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। लोगबाग आपको मूर्ख समझते, और क्या!

हमारे ऋषि-मुनियों ने जो भी अवलोकन किए, जो भी निष्कर्ष दिए उनके पीछे उनकी एक विधि थी, उनके अपने आध्यात्मिक प्रयोग थे। उन्होंने अपने मन की शक्तियों के टूल्स इस्तेमाल किये… अगर आपके पास वो टूल्स, वो शक्तियाँ नहीं हैं तो आपको उनके निष्कर्षों का अर्थ नहीं समझ में आएगा।

एक अंधे को इंद्रधनुष के रंग नहीं दिखाई देते. अब वह अंधा चाहे वहाँ सैटेलाइट भेज ले या हवाई जहाज… वह इंद्रधनुष पर नहीं पहुँच सकता। इसका अर्थ नहीं है कि इंद्रधनुष होता ही नहीं… हाँ, आप आँख के अलावा अपनी बाकी इंद्रियों से उसे नहीं समझ सकते… उसे छू नहीं सकते, उसे सुन नहीं सकते, सूँघ नहीं सकते, चाट कर चख नहीं सकते… पर इंद्रधनुष वहाँ होता है और अंधे को छोड़ कर बाकी सबको दिखता है.

अगर अंधे को वह नहीं दिखता तो यह इंद्रधनुष की समस्या नहीं है… इसे अंधे की समस्या रहने दीजिए… उसे कृपया इंद्रधनुष की लंबाई, चौड़ाई और वजन बताने का प्रयास मत कीजिये। क्या फायदा?

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