बहरूपिये : भाग-2

प्रोफ़ेसर जी डी अग्रवाल उर्फ़ स्वामी सानंद की मृत्यु के बाद से जैसा की अपेक्षित था, नाना प्रकार के लेख, एडिटोरीयल व विडीओ आने लगे है।

ये लेख, वीडियो बनाने वाले और कोई नहीं बल्कि वामपंथी लेखक और एडिटर ही हैं जिनके ट्रैक रिकॉर्ड, फ़ंडिंग के स्रोत से हर कोई वाक़िफ़ रहा है।

चूँकि इन वामपंथियों के लेख भ्रमित कर सकते हैं, अतः इनपर और भी विस्तार से लिखना पड़ा ताकि बात पूर्णरूपेण बताई जा सके।

देश में कोई भी परियोजना आए, एक पर्यावरण एक्टिविस्ट उसके विरोध के लिए वामपंथियों के खेमे से ज़रूर होता है जिसकी विदेश से फ़ंडिंग होती है। जल विद्युत परियोजनाओं के विरोध में भी ऐसा ही है।

ऐसा नहीं है कि जल विद्युत परियोजनाएँ प्रकृति को कोई नुक़सान नहीं पहुँचाती। नुक़सान पहुँचाती हैं ठीक वैसे ही जैसे सड़क, इमारतों व भवनों आदि के निर्माण में पेड़ कट जाते हैं, वैसे ही जैसे कृषि के लिए भूमि तैयार करने से जंगल कट जाते हैं आदि आदि।

लेकिन प्रकृति से माफ़ी माँगते हुए यदि समय रहते इस क्षति की भरपाई कर दी जाए तो प्रकृति पर इसका प्रतिकूल असर अतिन्यून किया जा सकता है। जैसे सड़क बने तो जितने पेड़ काटे गये, उसके दोगुने या चौगुने सड़क के दोनो ओर लगा दिए जाएँ। जिनकी ज़मीने लीं, जिनके घर मकान गिराएँ, उन्हें उतना पर्याप्त मुआवजा दीजिए कि विस्थापित व्यक्ति संतुष्ट हो जाए, अपना घर पहले से भी ज़्यादा बेहतर बना सके, काम रोज़गार शुरू कर सके।

और यदि ऐसा कर दिया जाए तो इसे sustainable development कहेंगे जो समय की माँग है। धीरे धीरे ही सही लेकिन विकास की दौड़ में अनेकों ग़लतियां करते हुए व्यक्ति ने milking और exploitation का फ़र्क़ सीखा है। यदि सड़क बनाने पर उपरोक्त भरपाई न की जाए तो ये प्रकृति का exploitation है, यदि ये भरपाई कर दी जाए तो इसे milking कहेंगे।

ठीक उसी प्रकार जब एक जल विद्युत परियोजना बनती है तो एक बड़े क्षेत्र में जंगल जलमग्न होता है, पेड़ कटते हैं, लोगों का विस्थापन होता है। इससे मछलियों का आवागमन (migration) बाधित होता है जिससे उनकी जनसंख्या प्रभावित होती है। जल को साफ़ रखने के लिए मछलियाँ ही कारक होती हैं। यदि मछलियाँ नष्ट हो जाएँ तो नदी की स्वयं को शुद्ध करने की शक्ति ख़त्म हो जाएगी।

लेकिन एक बाँध बना देने के बाद यदि पहले से भी कई गुना ज़्यादा पेड़ लगा दिए जाएँ, तो जंगल में पशु पक्षी भी क्षमा कर देते हैं। यदि विस्थापितों को पर्याप्त मुआवजा राशि दे दी जाए और उनके लिए विद्यालय, अस्पताल, कॉलोनी बनवाकर उनका ख्याल रखा जाए तो वो भी क्षमा कर देते है।

[बहरूपिये : भाग-1]

रही मछलियाँ, तो उसके लिए तकनीकी अविष्कार है ‘फ़िश लैडर’ जो उन्हें बाँध के दोनों ओर आवागमन (migration) के लिए रास्ता देता हैं जिससे उनकी जनसंख्या पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव भी अति न्यूनतम हो जाता है। इसलिए मछलियाँ भी माफ़ कर देती हैं और नदी की स्वयं को शुद्ध रखने की शक्ति भी बनी रहती है।

और ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ़ किताबी बातें हैं। यदि आपने NTPC के प्लांट देखे होंगे तो आपको चारों ओर हरियाली व जंगल दिखाई दिया होगा। इतनी हरियाली प्लांट बनने से पहले भी नहीं होती थी।

प्लांट के निकट होने के बावजूद वहाँ का वातावरण शहरों से भी ज़्यादा स्वच्छ! क्योंकि पर्यावरण मंत्रालय से अनुमति इसी शर्त पर मिलती है कि जितने पेड़ काटोगे, उससे कई ग़ुने लगाने होंगे और यदि कम्पनी में ईमानदारी हो तो ये पेड़ सिर्फ़ कागज़ पर नहीं, बल्कि हक़ीक़त में लगते हैं और उनका प्रभाव भी दिखता है।

ईमानदारी ही मायने रखती है, असम्भव कुछ भी नहीं! जल विद्युत परियोजना लगाने वाली अन्य PSU कम्पनियाँ बहुत ज़िम्मेदार व ईमानदार कम्पनियां है। पर्यावरण मंत्रालय द्वारा उन्हें इन चीज़ों का मेंडेट पहले से ही है।

मालूम हो जल विद्युत परियोजना से सबसे सस्ती और reliable बिजली मिलती है जिससे ग्रिड में बेहतरीन स्थिरता आती है। ये परियोजनाएं कोईं ग्रीन हाउस गैस भी उत्सर्जित नहीं करती और सालों साल हरियाली के बीच बिजली पैदा करती हैं। साथ ही कृषि के लिए जल उपलब्ध कराती है।

कनाडा, USA, ब्राज़ील, चाइना ये सभी भारत से कहीं आगे है जल विद्युत परियोजनाओं के विकास में और उनकी नदियाँ भी स्वच्छ हैं! यहाँ भारत के पास डेढ़ लाख मेगावाट से भी ज़्यादा हाइड्रो पावर पोटेंशियल होने के बावजूद वो इसका आधा लक्ष्य भी हासिल नहीं कर पाया है, इन्ही स्वामी सानंद जैसे एक्टिविस्टों को बदौलत! देश भर में और भी कई स्वामी सानंद हैं!

समझने की बात है कि वर्तमान में गंगा पर दो ही बड़ी परियोजनाएं हैं, एक उत्तराखंड में गंगा के स्रोत भागीरथी पर बना टिहरी बाँध, दूसरा गंगा के समुद्र समागम स्थल से पूर्व बना फ़रक्का बैरेज। बाक़ी अन्यत्र क़रीब 24 परियोजनाएँ केवल कागज़ पर नियोजित हैं और उन्हें इन ही एक्टिविस्टों के विरोध के चलते अमली जामा नहीं पहनाया जा सका।

यदि टिहरी बाँध से गंगा प्रदूषित होती तो ये प्रदूषण ऋषिकेश व हरिद्वार में क्यों नहीं हुआ! ये कानपुर, प्रयागराज, बनारस में आकर गंगा इतनी ज़्यादा प्रदूषित क्यों हुई! इसी से सिद्ध होता है कि गंगा प्रदूषण के मुख्य ज़िम्मेदार हैं चमड़े के कारख़ानों से निकला अपशिष्ट, मल मूत्र, सीवेज वाटर, शुगर फ़ैक्टरी, साबुन फ़ैक्टरी, अनेकों नाना प्रकार की फ़ैक्टरी से निकला अपशिष्ट, बूचड़खाने से निकला मल मलीदा ख़ून इत्यादि जो गंगा में मिल रहा है और प्रदूषित कर रहा है।

दूसरा कारण है बिना रोकटोक, बिना रेगुलेशन मछुआरों द्वारा गंगा में तेज़ी से मछलियों का मारा जाना, जिस कारण गंगा में मछलियों की कमी हो गई है और उसकी स्वयं को शुद्ध करने की शक्ति भी ख़त्म हो रही है।

तीसरा कारण है गंगा के दोनों तटों के नज़दीक तेज़ी से वनों का कटाव एवं आवासीय विकास, जिस कारण वर्षा व बाढ़ में पानी प्रदूषित होकर कूड़ा कचरा लिए गंगा में जा मिलता है जबकि पर्यावरण की दृष्टि से दोनो तटों पर दो-दो किलोमीटर चौड़े सघन वन होने चाहिए।

चौथा कारण लाशों इत्यादि का दाह संस्कार किए बग़ैर उन्हें गंगा में प्रवाहित करना भी है!

गंगा जल में तो collifague नामक लाभदायक बैक्टीरिया भी होता है जो colliform जैसे हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करता है इसीलिए गंगा जल वर्षों रखो, बदबू नहीं आती! लेकिन इतने बड़े मात्रा में प्रदूषण से collifague जैसा लाभदायक बैक्टीरिया भी नष्ट हो रहा है। कुछ दिन में गंगा जल भी आम जल हो जाएगा जिसे आप लम्बे समय स्टोर नहीं रख पाएँगे!

अब ज़रा बतायिए कि गंगा प्रदूषण के असल कारणों पर कितने एक्टिविस्टों ने आमरण अनशन किया! आपने कभी देखा स्वामी सानंद को इन मुद्दों पर आमरण अनशन करते हुए। अब जब STP बनाने का काम शुरू हुआ तो स्वामी सानंद बोलने लगें कि STP छोटी बन रही है, ऐसी बन रही है, वैसी बन रही है!

यदि इतनी ही चिंता थी तो एक समय जब आपको भारत सरकार ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में बतौर मेंबर सेक्रेटरी नियुक्त किया था (जो चेयरमैन से केवल एक पोस्ट नीचे होता है) तो आपके हाथ में सब था, तब आपने इस दिशा में क्या किया था?

तब आप सब कर सकते थे! आप राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के काम काज करने के तरीक़े को भी बदल सकते थे, सही डिज़ाइन के STP लगवा सकते थे, चेकलिस्ट, ऑनलाइन मॉनिटरिंग आदि लागू करवा सकते थे! जो व्यक्ति मरने की हद तक जा सकता है, वो पावर में रहते हुए बड़ा परिवर्तन ला सकता है! लेकिन ज़िम्मेदारी से भागना था और अनशन तो सिर्फ़ एक बहाना था!

वास्तव में श्री जी डी अग्रवाल उर्फ़ स्वामी सानंद, अन्ना हज़ारे, मेधा पाटकर आदि जैसे लोगों के गैंग से ही थे, आमरण अनशन का आवरण लेकर ये विदेशी हितों को ही सधवाते रहे हैं! वो तो अन्ना हज़ारे बेचारे रामलीला मैदान में मरते मरते बचे थे, नहीं तो इनका गैंग इनको मारना ही चाह रहा था!

ज़रा सोचिए कि जब बतौर मेंबर सेक्रेटरी ख़ुद पर ज़िम्मेदारी थी तब स्वामी सानंद ढेला न हिला पाए, अब गंगा प्रदूषण के असल कारणों से ध्यान भटकाकर परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं?

जब देश में ऐसे जयचंद हो तो किसी विदेशी को यहाँ आने की ज़रूरत क्या है, उनका काम ऐसे रिमोट कंट्रोल से हो जाता है! समय की माँग है कि ऐसे बहरूपियों का पर्दाफाश हो और लोग इनके मायाजाल से बाहर निकले।

कुछ वर्षों पहले एक न्यूज़ चैनल ने गंगा प्रदूषण के असल कारणों पर अच्छी पड़ताल की थी जिसे निम्न लिंक पे देखा जा सकता है –

बहुरूपिये : भाग-1

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