एक भीड़ है जो भारत है..

तो क्या हुआ ग़र लोग रात के अंधेरे में रेल की पटरियों पर चढ़कर रावण दहन देख रहे थे!
तो क्या हुआ लोग चटकते पुतलों से रह-रह कर उठते प्रकाश पुंज में अथाह अंधकार को नहीं देख सके!
तो क्या हो जाता है.. जब हम उत्सवधर्मिता में लगभग उन्मादी होकर मृत्यु के अतलांत जलधि में उतर जाते हैं!
तो क्या हो जाता है जब हम किसी पुल पर उसकी प्राणसीमा से अधिक भार दे देते हैं..! नौका की नाक तक सवार हो जाते हैं..मंदिरों में दर्शन के लिए कतार में हाहाकार मचा देते हैं..हमारे लिए तो जीवन और मृत्यु नदी के दो तट हैं..!! इधर से चल कर उधर पार उतर जाते हैं..!!! मृत्यु हमारे लिए सहज है उतना ही सहज जितना कि जीवन । क्योंकि हमें शतियों से दुःख की धूल झाड़कर चल देने की आदत सी हो गई है । अरे मर गए… ! बस इतना ही । परंतु इस मृत्यु में एक साथ कितनी ही चीजें भस्म हुईं, इस बारे में कौन सोचता है ?

ठहरिये.. इससे पहले कि फेसबुक के महान दार्शनिक.. दलित चिंतक, उद्भट विद्वान या उत्पाती विचारक कल की त्रासदी में राम के ऊपर उस बलात्कारविॆशारद, दसमूड़ामूर्ख और लंपटाधीश रावण की विजय को देख लें..।

मैं साफ़ कर दूं कि यह एक हादसा है। और हादसे से अधिक तो आंखें बंद कर मृत्यु का वरण कर लेने जैसा है, जिस पर विश्वास करना भी स्तब्धकारी है। वहां न तो राम की विजय हो रही थी, ना ही रावण पराभूत हो रहा था। वह तो प्रतीकात्मक खेल था। जिसे हम खेलते हैं।

परंतु, इन्हीं खेलों को खेलते हुए हम कितने उच्छृंखल, नियमविरुद्ध, उत्तरदायी नागरिकता के बोध से विहीन हो जाते हैं। अरे..! हमें रावण दहन देखना है तो देखना है बस!! उसके लिए रेल की पटरियां तो क्या हम मेट्रो के पुल पर भी चढ़ सकते हैं! किसी भी गाछ की फुनगी पर लटक सकते हैं, किसी भी जर्जर छत की छाती पर सवार हो सकते हैं!!

हमारे देश में यातायात का प्रमुख साधन है रेल। उसके प्रति हमारी जवाबदेही या जिम्मेदारी शून्य है। जो करना है सब रेलवे को ही तो करना है। सुरक्षा से लेकर संरक्षा और सुविधाओं की व्यवस्था तक। हमें तो बस यात्रा करनी है। खुले फाटक में रेल जाना है। फाटक का दरवाजा गिर गया है तो नीचे से करामात दिखलाते हुए बाइक लेकर निकल जाना है और कई मर्तबा तो रेल के इंजन को मुंह चिढ़ाते हुए पटरियों को पार कर जाना है। ये सब स्टंट हमारे जीवन में समाहित हैं। हम इसके अभ्यस्त हैं। ये न हों तो जीवन का आनंद कहां है.. कितना एकरस हो जाए हमारी दैनंदिनी। जब तक हम नियम न तोड़ें, गंध न फैलाएं या कुछ ऐसा न कर जाएं जो हमें अतुल्य भारत बनाता हो, तब तक हमारे जीने का क्या अर्थ है!!!

अब देखिए, कितना विकट दुःख है। एक क्षण में दशहरा दुखभरा हो चुका है। कल्लोल करती भीड़ कराह उठी है। उत्सव का आनंद अखंड वेदना में ढल चुका है। नवरात्र की सारी नीलिमाएं बुझ बुझ कर भस्म हो चुकी हैं। यहां से वहां तक हाहाकार है। जो मरे हैं वो सिर्फ एक प्रांत के निवासी नहीं होंगे बल्कि कई प्रांतों के रहने वाले होंगे। उनका दुःख वहां-वहां पहुंचेगा, जहां-जहां से चल कर वे अमृतसर तक आए। रोजगार करते जीवन जीते रहे। उत्सव मनाते रहे अब दग्ध हृदय को संभाले सांत्वनाएं पा रहे हैं। परंतु सांत्वना से जीवन तो नहीं लौटता ना। ऐसी भयावह और दुखद मृत्यु कि रूह के रेशे रेशे हो जाएं। हे ईश्वर..

इस देश के प्राण कंठ में कैद हैं। पूरा जिस्म भीड़ की चपेट में है। अथाह आबादी इधर-उधर डोलती है। गांव के गांव उठ-उठकर शहर में आ गए हैं। अब तो भीड़ में रहने की आदत कुछ ऐसी हो गई है कि शांति काटने को दौड़ती है। दो तीन दिनों के लिए इधर उधर चला भी जाता हूं तो यही गंधाता शहर याद आने लगता है, जहां एक नागरिक के रूप में हमारी शिक्षा अधूरी है। कम से कम संपूर्ण उत्तर भारत को इसकी महती आवश्यकता है। हम बस चल देते हैं, पार उतर जाते हैं। यात्रा कर लेते हैं। तीर्थ कर स्वयं को तार लेते हैं। परंतु इन सभी क्षणों में मृत्यु निरंतर हमारे साथ चलती है। यों तो जीवन और मृत्यु दोनों अभिन्न हैं लेकिन ईश्वर के दिए इस अमूल्य उपहार को हम कितनी लापरवाही से लुटा देते हैं।

यह न सिर्फ अपने जीवन का मूर्खतापूर्ण त्याग है बल्कि अपने साथ कितने ही सगे संबंधियों और प्राणाधारों को पीड़ा देना भी है। समाज और देश को मलिन करना है। निरंतर ये संदेश देना है कि भारत तो भुक्खड़ों का देश है, यहां कभी भी कोई कट सकता है, कोई मर सकता है। बच्चों को लेकर जाता हुआ कोई ड्राइवर अपने कान में मोबाइल फोन सुनते हुए रेलवे फाटक पार कर सकता है। यहां कुछ भी संभव है। इस सहज संभाव्यता को ही असंभव बना लें तो भारत में जीवन का मूल्य दमक उठे… सभी दिवंगत आत्माओं को मेरी श्रद्धांजलि.. उनके परिजनों के शोकसंतप्त हृदय को ईश्वर अपने अवलेह से शीतल करें…

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