जितने भी साईँ भक्तों को आप जानते हैं, उनमें से कौन श्रीराम का शत्रु है?

यह लेख शिर्डी के साईं पर है। केवल रणनीति समझाता लेख है, और दिल से नहीं दिमाग से ही पढ़ने की आवश्यकता है।

पहले ही साफ कर दूँ कि मुझे साईं में ज़रा भी आस्था नहीं है, in fact कोई भी भाव नहीं है। और इस लेख में केवल स्ट्रेटजी की ही बात होगी इसलिए साईं के चरित्र की भी बात नहीं आएगी।

महाराष्ट्र विधानसभा 2015 के समय यह बवाल उठाया गया कि साईँ मुसलमान था इसलिए हिंदुओं को वहाँ नहीं जाना चाहिए। साथ साथ ही जो साईँ का चरित्र प्रसिद्ध है उसमें से चुन चुन कर नकारात्मक पंक्तियों को हाइलाइट किया जाने लगा। इस वक्तव्य के साथ काँग्रेस के करीबी शंकराचार्य स्वरूपानन्द जी का नाम जोड़ा जाता है।

महाराष्ट्र में साईँ भक्तों की बहुत बड़ी संख्या है क्योंकि साईँ को वहाँ सौ सालों से अधिक हुए है। सिनेमा ने भले ही साईँ को ‘ऑल इंडिया सेंट’ बना दिया हो, साईँ की पूजा सौ सालों से अधिक हो रही है।

उनके सभी शुरुआती भक्त तो अधिकतर मराठी लोग ही रहे हैं। मेरे स्कूल के अगल बगल ही दो साईँ मंदिर थे जिनमें एक तब ही पचास साल पुराना था – यह 1967 की बात है। गुरुवार को उसके बाहर कई लोग फूलमाला आदि बेचते थे। मेरे परिचितों में भी सैकड़ों परिवारों में साईँ को पूजनेवाले थे, अब भी होंगे, मैं ही कभी पूछता नहीं।

2015 के विधानसभा चुनाव पर उठाए गए इस विवाद ने कई परिवारों में और दोस्तों में संबंध बिगाड़ दिये। लेकिन धीरे धीरे बातें नॉर्मल हुई क्योंकि लोगों को यह समझ आया कि ये स्वामीजी ने आज तक कभी भी किसी दरगे पर जाने से रोका नहीं है।

और ये विवाद भी चुनाव के समय ही खड़ा कर दिया है इसे समझना आवश्यक है। नेताओं के पीछे कार्यकर्ता अपनी दोस्ती खराब कर बैठते हैं और नेता गले मिलकर खाना खाते हैं, तो दोस्ती खराब करने से क्या फायदा?

यही समझ यहाँ भी आने लगी। क्योंकि साईँ भक्त, राम का भी भक्त था ही, उसके मंदिर से अपने देव निकाले नहीं जाते थे, बस साईँ की एक तस्वीर या मूर्ति आती थी इतना ही। धीरे धीरे रिश्ते पूर्ववत होने लगे, तुम्हें साईँ को पूजना है तो पूजो, मुझे मत बुलाना, यही पुराना हिन्दू एटीट्यूड आ गया।

यह रही सामाजिक स्थिति। अब बात करें रणनीति की, कि मुझे वहाँ क्या दिखता है?

1. वहाँ एक हिन्दू मंदिर है जहां एक दिवंगत व्यक्ति की समाधि की पूजा, आरती आदि सभी हिन्दू विधि से, हिन्दू पुजारियों द्वारा हो रही है। उसे वे समाधि ही कहते हैं, कोई उसे कब्र नहीं कहता।

2. वहाँ श्रद्धालु हिंदुओं की बरसों की अर्पित कमाई की अरबों रूपए मूल्य की संपत्ति है।

3. मुझे उस अथाह संपत्ति को देखते हुए जीभ चाटते विधर्मी और उन्हें तवज्जो देते हुए नामधारी हिन्दू नेता दिखते हैं, जिनके नाम जबरन मंदिर प्रवेश के साथ जोड़े जाते हैं। चूंकि सबूत नहीं है इसलिए नाम लेना उचित नहीं।

4. मुझे शिर्डी का भौगोलिक लोकेशन समझ आता है और उसका भू-सामरिक महत्व भी। आसपास के महत्व के हिन्दू तीर्थ, उनसे कनेक्टिविटी और नज़दीक ही सेना के बेसेस भी दिखते हैं।

5. मुझे शिर्डी संस्थान द्वारा शुरू किए गए उपक्रमों की जानकारी है – क्या ये सभी संपत्ति के स्रोत और ये संपत्ति जो आज हिंदुओं के ही काम आ रही है – किसके बहकावे में आ कर हम छोड़ रहे हैं? जिन्होंने हाजी मलंग, हाजी अली या अजमेर आदि जाने से कभी रोका नहीं, एक लफ्ज भी कहा नहीं, उनके कहने पर?

अंत में एक ही बात याद दिलाऊँगा – सैकड़ों साल पहले जब तुरंत वापस ले सकते थे तब जिनके मुंह पर दरवाज़े बंद कर दिये गए उनके ही वंशज आज हमारे घर जलाने की धमकियाँ दे रहे हैं और बहुत खर्चे कर के आज घर वापसी के कार्यक्रम किए जा रहे हैं। क्या अगली पीढ़ियाँ पछताए और कोसे, ऐसे ही काम करने को हम अभिशप्त हैं? अपने हाथों से हिंदुओं की संपत्ति शिर्डी पर ‘चांद-तारा’ लहराने निकले हो क्या?

राम रहीम, आसाराम, रामपाल – इनके ध्वस्त होते ही उनके क्षेत्रों में मिशनरियों की बढ़त की खबरें नहीं सुन रहे हैं आप? साईँ को भी ऐसा ही समझिए, और कुछ कहने या हिंदुओं को किसी अन्य मार्ग पर ले जाने के लिए वो मौजूद भी नहीं है।

भूल जाएँ कि साईँ का नाम चाँद मियां था, आप को नहीं आस्था, तो दूर रहें। लेकिन ज़रा याद कीजिये कि जितने भी साईँ के भक्त आप जानते हैं, कौन श्री राम का शत्रु है? आप ने जय श्रीराम कहा तो वो भी जवाब में जय श्रीराम कहता है, शिर्डी में राम नवमी को भगवा झण्डा लेकर जाता है, अपना हिन्दू सहोदर ही है वो।

और आगे जाकर पूछता हूँ, जितने भी श्रीराम के शत्रुओं को आप जानते हैं, कितने साईँ के भक्त हैं?

दोनों का उत्तर घंटानाद ही आयेगा।

प्रभु श्रीराम से ही सीखिये – रावण पर विजय पाना था, सीता माता को वापस लाना था, वे अयोध्या की सेना का इंतज़ार करते नहीं बैठे और न ही रास्ते में पड़ते अन्य राजाओं के पास गए।

लेख की शुरुआत में ही मैंने स्पष्ट किया था कि लेख में केवल रणनीति की बात होगी। अगर आप के हिसाब से कहीं भी साईँ का महिमा मंडन किया हो तो बताएं। इसलिए कमेन्ट करते समय लेख के अनुरूप ही कमेन्ट करें। मुझे जो कहना है मैंने बिलकुल स्पष्ट लिखा है, इसलिए कृपया “याने आप का मतलब है….” वाले हथकंडे न अपनाएं।

जय हिन्द!

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