बुराई का प्रतीक नहीं, सभ्यता पर संकट था रावण

यह बड़ी विचित्र बात है कि प्रत्येक दशहरे पर मॉरल साइंस के लेक्चर आरंभ हो जाते हैं। यथा- ‘रावण मन के भीतर है’, अपने अंदर के रावण को मारो… इत्यादि।

पता नहीं किस स्वयंभू विद्वान ने यह कह दिया कि रावण मन के भीतर रहता है और इस व्याख्या को हिन्दू समाज सर झुका के ढोता फिर रहा है। रावण मन के भीतर नहीं बल्कि बाहर हमारे समाज में गली मोहल्लों में नगरों और गाँवों में घूम रहा है।

रावण किस रूप में है यह समझने से पूर्व इस पर विचार करना आवश्यक है कि रावण वस्तुतः कौन है। रावण कोई अच्छाई से हारने वाली बुराई का नाम नहीं है। अच्छाई और बुराई मानव स्वभाव के गुण मात्र हैं जिनका संतुलन जीवन में रखना आवश्यक है। अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर कोई भी यह संतुलन साध सकता है और इस प्रकार वह अच्छाई-बुराई के बन्धन से परे होकर किसी विधा में पारंगत हो सकता है।

रावण ने यही किया था। रावण की मृत्यु के पश्चात मन्दोदरी कहती है कि तुमने इन्द्रियों को जीत कर कठिन तपस्या से इतनी सारी सिद्धियाँ प्राप्त की थीं परन्तु शत्रुता और प्रतिशोध के आवेश में उन्हीं इन्द्रियों ने तुम्हें पराजित किया।

यहाँ मन्दोदरी रावण को गुणी तो कह रही है साथ में यह भी बता रही है कि इन्द्रियों को वश में करना और सिद्धियाँ प्राप्त करना किसी प्रकार की महानता का प्रमाण नहीं है। यह वैसे ही है जैसे आजकल यूनिवर्सिटी से बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ लेकर निकले लड़के जिहादी आतंकवादी बन जाते हैं। 9/11 की आतंकी घटना को अंजाम देने वाले मोहम्मद अट्टा और उसके साथियों से लेकर मन्नान वानी तक इसके उदाहरण हैं।

रावण ऐसा ही एक विद्वान था जिसने युद्धकला सहित विविध विधाओं में सिद्धि प्राप्त कर ली थी। अच्छाई और बुराई जैसे क्षुद्र मानवीय गुण-अवगुण उसे परेशान नहीं करते थे। वह लंका का सम्राट था किंतु उसका आतंक तीनों लोकों में विद्यमान था।

रावण वस्तुतः कोई खराब मानवीय प्रवृत्ति अथवा सामाजिक बुराई ही नहीं बल्कि समूची सभ्यता पर संकट था। वाल्मीकीय रामायण के बालकाण्ड में स्पष्ट वर्णन है कि जब विश्वामित्र राजा दशरथ के यहाँ श्रीराम को मांगने आते हैं तब दशरथ के पूछने पर बताते हैं कि रावण नामक राक्षस को ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त है और उसने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा है-“स ब्रह्मणा दत्तवरस्त्रैलोक्यं बाधते भृशम्”। मन के भीतर की इन्द्रिय जनित बुराईयाँ इतनी शक्तिशाली नहीं हो सकतीं कि इनके वश में होकर कोई तीनों लोकों में उत्पात करे।

जब व्यक्ति मन से ही कमजोर हो जायेगा तो वह दुनिया पर राज क्या खाक करेगा? यह वही कर सकता है जिसने मन को काबू में कर के कई विद्याएँ सीखी हों और उसका लक्ष्य विश्व से आर्य सभ्यता का नाश करना हो। इसके लिए रावण ने कई हथकण्डे अपनाये। उसके द्वारा नियुक्त राक्षस पूरे विश्व में यत्र तत्र भयंकर मारकाट करते रहते थे।

विश्वामित्र कहते हैं कि रावण स्वयं यज्ञों में विघ्न (मांस हड्डी) डालने नहीं जाता वह इसके लिए मारीच सुबाहु को भेजता है। ठीक उसी प्रकार जैसे आज इस्लामिक स्टेट पाकिस्तान अपने यहाँ से जिहादियों को समूचे विश्व में निर्यात करता है। समूची रामायण श्रीराम और राक्षसों के युद्ध से इसीलिए भरी पड़ी है क्योंकि बाल्यकाल से लेकर रावण के वध तक श्रीराम ने न जाने कितने राक्षसों का वध किया था।

हमारे यहाँ मन की बुराइयों को समाप्त करने के लिए भगवान् को अवतार नहीं लेना पड़ता। इसके लिए उन्होंने ऋषियों एवं योगियों को अपनी कृपा से इतना समर्थ बनाया है कि वे मानवों को मन को वश में रखना और शरीर को स्वस्थ रखना सिखा सकें। श्रीराम इसलिये वन्दनीय हैं क्योंकि उन्होंने रावण का वध कर पूरी सभ्यता पर आये संकट को समाप्त किया था।

माता सीता पर रावण की कुदृष्टि तो थी ही उनका अपहरण करना उसकी राजनैतिक चाल भी थी। इसे आज के समय में Psychological Warfare कहा जाता है। शत्रु की सबसे बड़ी कमजोरी को पकड़ना और उसे एक बार में पूर्ण रूप से समाप्त न कर के उसपर अपना नियंत्रण रखना यह युद्धकला की नीति है।

इस्लामिक स्टेट पाकिस्तान ने यह नीति कश्मीर के भूभाग पर कब्जा कर अपनाई. यही नहीं आर्य सभ्यता का नाश करने के लिए रावण ने साधारण जनता से अधिक उन्हें सताया जिनके पास ज्ञान परम्परा सुरक्षित थी। इसीलिए ज्ञान परम्परा का संरक्षण तथा संवर्धन करने वाले ऋषि मुनियों के श्रेष्ठ प्रतिनिधि विश्वामित्र ही सर्वप्रथम राक्षसों से अपनी रक्षा के लिए गुहार लगाने अयोध्या जाते हैं।

अरण्यकाण्ड में जब श्रीराम वानप्रस्थ आश्रम में जाते हैं तब उनसे नाना प्रकार के ऋषि मिलने आते हैं जो कई प्रकार के गुणों से युक्त होते हैं। कोई सूर्य चन्द्रमा की किरणों पर ही जीवित होता है तो कोई कच्चे अन्न खाकर जीता है। महर्षि वाल्मीकि कुल 21 प्रकार के ऋषियों का वर्णन करते हैं जिन्होंने किसी न किसी प्रकार से अपनी शारीरिक अथवा मानसिक बाध्यताओं पर विजय प्राप्त की थी। ऐसा कर के उन मुनियों ने विविध सिद्धियाँ प्राप्त की थीं जिनका उपयोग वे लोक कल्याण हेतु करते थे। उन तपस्वियों ने श्रीराम को दिखाया कि आइये देखिये ये भयंकर राक्षसों द्वारा मारे गए मुनियों के कंकाल हैं- “एहि पश्य शरीराणि मुनीनां भवितात्मनाम्। हतानां राक्षसैर्घोरैर्बहूनां बहुधा वने।”

यही कार्य आज के समय में वामपंथी और अर्बन नक्सलियों ने किया है। उन्होंने हमारे तन्त्र में घुसकर हमें ज्ञान रूपी अस्त्र (जो फेंक कर मारा जाता है) तथा शिक्षा रूपी शस्त्र (जो हाथ में होता है) से वंचित कर दिया। इसके स्थान पर ‘साक्षरता’ और ‘सूचना’ के झुनझुने पकड़ा दिए गए जिसे बजाकर हिन्दू समाज स्वयं को धन्य समझता है।

विवादित ढाँचा गिराये जाने के पश्चात् 20 वर्षों तक वामपंथी लेखक पत्रकार और सेक्यूलर अकादमिक बिरादरी ने दिन रात मेहनत कर के डिस्कोर्स में यह स्थापित किया कि 6 दिसंबर ’92 की घटना एक घिनौनी साम्प्रदायिक घटना थी। बाकायदा भगवान् राम के चरित्र पर लांछन लगाये गए उन्हें खलनायक घोषित किया गया। नोम चोम्स्की आज इसे manufacturing consent का नाम देते हैं।

रामायण काल में रावण भी यही करता था। स्थिति यह हो गयी है कि आज हिन्दू समाज प्रत्येक नवरात्रि धूमधाम से मनाता है किंतु विद्या की देवि काश्मीरपुरवासिनी सरस्वती के धाम शारदा प्रदेश को भूल गया है जो आज पाक अधिकृत कश्मीर में जिहादियों के कब्जे में है। जिसके द्वार कभी आदि शंकर के लिए खुले थे आज उसके भग्नावशेष वानप्रस्थ के उन्हीं मुनियों के कंकालों की भाँति श्रीराम की बाट जोह रहे हैं जो कभी रामायणकाल में रावण से भयाक्रांत थे।

रावण हमारे भीतर नहीं बाहर है। आँखें खोलकर देखिये उसके दश सहस्र सिर दिखाई पड़ेंगे। शत्रु की पहचान न होना यह रावण की ही मायावी शक्ति है जो हमें सत्य नहीं देखने देती। हमारी ज्ञान परम्परा का निरन्तर ह्रास हुआ है। हम विदेशियों के ज्ञान में अपना योगदान दे रहे हैं जिससे उनकी शक्ति में वृद्धि हो रही है।

हमारी मौलिक चिंतन और वैचारिक धारा पुरातन काल में स्थिर हो गयी है, यह रावण की ही माया है। अनेकों रावण हमारी जनसंख्या हमारी जीवनशैली को प्रभावित कर रहे हैं, जातीय विष घोलकर हिन्दू समाज की एकता को विभाजित करने का कार्य कर रहे हैं, न्यायालय हिंदुओं की श्रद्धा को अपने पैरों की जूती समझता है, राजनैतिक और प्रशासनिक तन्त्र का एक बड़ा भाग हिन्दू विरोधी है, अनेकों रावण बुद्धिजीवी बन हिन्दू सभ्यता की अस्मिता पर प्रश्न किये जा रहे हैं और आपको रावण मन के भीतर नजर आता है?

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