उसके सपनों को तोड़ने से बड़ा गुनाह कोई हो नहीं सकता

हमारा धंधा ही ऐसा है साहब… मोटा इन्वेस्टमेंट करते हैं, अनेक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते हैं, अफसरों से लगाकर क्लर्क और चपड़ासी के सामने गिड़गिड़ाते हैं, लोहा, सीमेंट, ईंट, पत्थर में ज़िंदगी गुज़ारते हैं और दुनिया के किसी भी धंधे से अधिक आलोचना का पात्र बनते हैं।

फिर दोहराता हूँ कि हर धंधे में कुछ गन्दी मछलियां होती ही हैं जो पूरे तालाब को गन्दा करती हैं। क्या मसाले में घोड़े की लीद मिलाने वाले नहीं होते? दूध में पानी मिलाने वाले, कम तोलने वाले, नकली ब्रांड बेचने वाले, कपड़ा कम नापने वाले, सड़े हुए फल टिकाने वाले, यहाँ तक कि धर्म और जनसेवा के माध्यम से जेब भरने वाले और चिकित्सा के नाम पर गुर्दा बेचने वाले भी होते हैं। यानी इंसान की फितरत है… हर धंधे ने सुराख ढूंढ लेता है।

एक बिल्डर की आलोचना करने से वोट का गणित नेता के लिए लाभ का सौदा साबित होता है। अगर देश में बिल्डर दस हज़ार हैं तो उपभोक्ता करोड़ों है।

खैर, बिल्डिंग बनाने वालों ने देश और समाज को क्या दिया इसपर बात करते हैं…

आज से चंद सालों पहले उत्तर प्रदेश आवास विकास के मकान की वेटिंग लिस्ट 20 साल या उससे भी अधिक थी। आज शून्य है।

उस समय दिल्ली विकास प्राधिकरण या अन्य जब मकानों के फॉर्म निकालते तो करोड़ों रुपये केवल कागज़ की एक छोटी सी बुकलेट बेचकर कमा लेते थे. मकान होते 600 तो फार्म बिकते थे 60,000।

एक नया धंधा भी था। प्रार्थना पत्र राशि भी बैंक फाइनेंस करते थे और ब्याज शुरू में ही काटकर प्राधिकरण को पैसे चुका देते। मोटा मुनाफा था।

60,000 एप्लीकेशन में जिन 600 लोगों को मकान मिल जाते उनमें से अधिकतर ब्लैक में दोगुनी कीमत पर बेच देते। मैंने विकास प्राधिकरण की अलॉटमेंट लॉटरी में नाम आने पर लोगों को खुशी से रोते हुए और नाचते हुए देखा है।

आज आओ न बिल्डर के साथ कम्पीटीशन में। कोई सरकारी मकान का फॉर्म भरने तक को तैयार नहीं है। न सिक्योरिटी, न स्वीमिंग पूल, न मेंटेनेंस, न बिजली बैकअप और न ही क्लब। प्राधिकरण जनता को मूर्ख बनाकर चांदी काट रहे थे तो ठीक है, आज बिल्डर के साथ स्पर्धा में फेल हो गए हैं।

बात को संक्षिप्त करता हूँ। आज रीयल इस्टेट भारत में रोज़गार देने वाला सबसे बड़ा उपक्रम है। कील बनाने से लकड़ी के तख्ते बनाने वाले तक करीब 3000 रोज़गार बिल्डिंग उद्योग से जुड़े हुए हैं। सरकारों को बड़ी मात्रा में राजस्व इस क्षेत्र से प्राप्त होता है। और अंतिम बात… देश में करोड़ों लोगों को आवास देने का काम बिल्डर ने किया है।

दूसरा पक्ष। कभी हास्यास्पद सरकारी बाधाओं और प्रतिबंधों के बारे में सुनेंगे तो आश्चर्य होगा। प्राधिकरण या निगम एक भूमि बिल्डिंग बनाने के लिए देता है किन्तु उस से होने वाले प्रदूषण की उसे जानकारी नहीं है क्या? अब आप प्रदूषण, खनन, भूमि उपयोग, पर्यावरण, अग्नि शमन (नक्शा आप ने पास किया है) तहसील, नगर निगम, सिंचाई विभाग, राजस्व, बिजली और एयरफोर्स के दफ्तरों में धक्के खाइये, भेंट चढ़ाइये तब एक ईंट लगाइये।

अखबार वाले को, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले को विज्ञापन न दो तो वो लिफ्ट के 15 मिनट लेट होने को हत्या का प्रयास बता देगा। एक बात जो एक मित्र ने याद दिलाई… हमारे प्रोजेक्ट से 5 किलोमीटर दूर मेट्रो निर्माण हो या एलिवेटिड रोड, आँख मीचकर बिल्डर पर सेस लगा दिया जाता है जो मोटी रकम होती है। ये सेस सरकार के डेवलपमेंट चार्ज, लेबर सेस और तमाम टैक्सों के अलावा होता है।

खैर, सब चलता रहेगा। मेरे मित्र और प्रदेश में मंत्री श्री अतुल गर्ग मुझसे कहते हैं कि महोदय, अगर आप खुद बिल्डर न होते तो आप भी किसी बिल्डर के खिलाफ नारे लगा रहे होते।

अंतिम बात महत्वपूर्ण है। एक आदमी पूरी ज़िंदगी की पूंजी लगाकर, बैंकों से कर्ज लेकर अपने सर पर एक छत के लिए जी जान से सपने देखता है। उसके सपनों को संजोकर रखना बहुत नाज़ुक और ज़िम्मेदारी का काम है और उसके सपनों को तोड़ने से बड़ा गुनाह कोई हो नहीं सकता।

‘बेटा थक गया क्या… आज तेरी पसंद का ढोकला बना दूं!’

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY