ताड़पत्र – 4 : अस्तित्व की योजना और अचम्भित होता संसार

पिछले दो महीने से पेट में स्टोन होने के कारण किडनी में स्वेलिंग हो गई है. अभी उसका होम्योपैथी इलाज करवा रहा हूँ. इसी में, इधर दुर्गा पूजा की शुरुआत ही हुई थी कि तृतीया को मैं बीमार पड़ गया. जब षष्ठी के दिन तक लगातार चार दिन बित जाने पर भी बुखार नहीं उतरा तो डॉक्टर ने डेंगू होने की आशंका जताई. दिल्ली में अकेले रहता हूँ, इसलिए परेशानी बढ़ गई. सोचा फ्लाइट पकड़ कर कोलकाता माँ के पास चला जाऊँ, लेकिन फिर माँ मुझे इस हालत में देखकर घबरा न जाये ये सोंचकर वहाँ भी नहीं जा सका.

तभी दिल्ली में ही रहने वाली मेरी एक मित्र रेखा भार्गव का फोन आ गया. वो वसंत कुंज में रहती है. उसका काम मेडिकल टूरिज्म से सम्बंधित है. संघ परिवार से है और अनेकों प्रचारकों के अस्वस्थता की स्थिति में मन से उनकी सेवा करती रही है. वो मुझे भी उपचार के लिए अपने पास पिछले चार दिन से बुला रही थी पर मुझे किसी के घर पर ठहरना असहज करता है, इसलिए मना कर दे रहा था, पर चौथा दिन डेंगू की बात सुनकर मैं थोड़ा डर गया और उसके पास चला गया.

उसने मेरा परिचय एक केरल मूल के डॉक्टर विमल से करवाया जो जेएनयू में डेंगू, चिकनगुनिया आदि पर ही शोध कर रहे हैं कि किस प्रकार केरलीय आयुर्वेद के की दवाओं से आराम से डेंगू को कंट्रोल किया जा सकता है. षष्ठी रात तक जब मेरा बुखार एलोपैथी दवाओं से नहीं उतर तो मैं सप्तमी से आयुर्वेदिक दवा लेने को तैयार हो गया.

जेएनयू में उन्हीं डॉक्टर साहब के लैब में डेंगू के टेस्ट के लिए ब्लड देने गया. वहाँ भी सीनियर डॉक्टर मेरे बीमारी के लक्षण देखकर डेंगू ही मानकर चल रहे थें. वहाँ से जब ब्लड देकर बाहर निकल रहा था तो पार्क में काम करने वाले एक कर्मचारी के हाथ में सात-आठ लम्बे मोर पंख देखा. रेखा ने उनसे वो पैसा देकर खरीदना चाहा. वो बिना मूल्य लिए मोर पंख दे गयें. भले वो लोगों के लिए मोर पंख हो, हमारे लिए तो कान्हा की निशानी थी. मेरा दिल कह रहा था कि कान्हा कह रहा है कुछ भी बीमारी हो पर डेंगू तो नहीं है.

उस दिन मैंने वो केरलीय आयुर्वेदिक दवा ली जो डेंगू सहित किसी भी बुखार को खत्म कर देता है. दूसरे दिन तक बुखार 104° से 96° पर पहुँच गया. तब तक लैब से डेंगू नहीं होने की रिपोर्ट आ गई. आयुर्वेदिक दवा दिन भर में बहुत नियम के साथ पिलाना था. रेखा ने घर में दुर्गा सप्तशती का पाठ बिठा रखा था, उसके बावजूद दिनभर मेरे लिए एक पाँव पड़ खड़ी थी. खैर वो तो मेरी फ्रेंड है, मेरे प्रति वात्सल्य भाव स्वाभाविक है, पर मल्लेश्वर राव जो रेखा का सहयोगी है. जिससे मैं पहले कभी नहीं मिला, वो आंध्रप्रदेश का तेलुगू भाषी लड़का है. उसने भी बहुत दिल से मेरी सेवा की. बाद में पता चला कि ये मात्र पच्चीस साल की उम्र में ही एनजीओ बनाकर बहुत सेवा कार्य कर चुका है. उत्तर भारत के बड़े-बड़े वकील, नेता, समाज सेवी इसके सेवा कार्यों के कारण खुद से इसको एप्रोच कर इससे मिलना चाहते हैं.

ईश्वर इस परदेश में भी मेरे लिए ऐसे लोगों का सहयोग दिलवा दिया. जिस दिन डेंगू नहीं होने की रिपोर्ट मिली, उस दिन अष्टमी थी. रेखा के नाना जी बड़े ज्योतिषी थें, उनका एक ज्योतिषी के रूप में लोगों में बहुत प्रभाव था. वो रेखा को अकेले में समझातें कि ज्योतिष, हस्तरेखा आदि केवल मनोवैज्ञानिक है और लॉ ऑफ अट्रैक्शन के नियम से चलता है. अपने नाना की बातों का उसके बालमन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा. यही कारण था कि ये ज्योतिष पर मन से विश्वास नहीं करती थी और मेरी आध्यात्मिक या ज्योतिषिय पोस्ट को भीतर से बकवास ही मानती थी. ये कभी मेरे सामने जाहिर नहीं करती थी, पर मैं इसके मनोभाव को बहुत पहले ही समझ चुका था.

मेरी आदत है कि मैं किसी भी विषय में तभी बात करता हूँ जब सामने वाले की उसमें श्रद्धा हो. सामने वाले की रूचि के विपरीत मैं कभी ज्ञान नहीं देता. अगर हम ही ज्ञान का सम्मान नहीं करेंगे तो सामने वाला क्या करेगा? अगर कोई मुझसे कहता है कि मैं ज्योतिष को बकवास मानता हूँ तो मैं उसे तर्क देता हूँ कि आप बिलकुल सही कह रहे हैं श्रीमान जी, उतने दूर निर्जीव आकाशीय पींड भला हम जीवधारियों के जीवन को कैसे प्रभावित कर सकता है? मन में सोचता हूँ कि ये कितना अभागा है कि ईश्वरीय दिव्य लीला को कुछ-कुछ समझने का एक सशक्त आधार से ये वंचित रह गया.

रेखा ने ऐसी विपरीत परिस्थितियों में मेरी इतनी सहायता की कि मन में भाव आया कि मेरी दोस्त होकर भी बेचारी खाली ही रह गई. नियति द्वारा इसका मुझसे टकराना निष्फल ही रह गया. अष्टमी के दिन जब सुबह ग्यारह बजे मेरे डेंगू नहीं होने का रिपोर्ट आया तो मैं खुश था और खुशी से बोला कि ईश्वर करे कि तुम्हारा ऋषि अगस्त्य का ताड़पत्र मिले जिसमें हजारों साल पहले ही तुम्हारे बारे में की गई भविष्यवाणी तुम देख पाओ तो तुम्हारी पूरी दुनिया देखने की दृष्टि ही बदल जायेगी. मैं जानता था कि मिलना बहुत मुश्किल है, इसलिए बोला कि पहले उसे खोजना तो आरम्भ करो, भगवान ने चाहा तो इस जन्म में मिल जायेगा.

मैं उससे बोला कि एक ताड़पत्र का केन्द्र हौज खास में भी है जो तुम्हारे घर के नजदीक है, आज वहाँ चलकर कोशिश करते हैं. ये बोलकर मैंने केन्द्र में फोन किया. वो बोले कि अब वो लोग कटवरिया सराय में शिफ्ट कर गये हैं. कटवरिया सराय हमलोगों के आवास से बहुत पास में था. रेखा और हम स्कुटी से दस मिनट में वहाँ पहुँच गयें. रेखा ने अपने अँगूठे का निशान दिया, उसके दस मिनट बाद उसको बुलाया गया. अन्दर जाने के दस मिनट बाद वो भागते हुए बाहर मेरे पास आयी और बोली कि अन्दर चलो. अन्दर गया तो पता चला उसका ताड़पत्र मिल चुका था. उसमें उसका नाम, माता-पिता का नाम, पति का नाम, जन्मदिन, जन्म समय, व्यवसाय, इसके दो जुड़वां बच्चे हैं और दोनों ताड़पत्र मिलने के समय कक्षा आठवीं के छात्र हैं. ऐसी सटीक बातें सुनकर उसके होश उड़ गयें.

इतना जल्दी मेरी जिन्दगी में किसी को ताड़पत्र नहीं मिला था. दिन के ग्यारह बजे मैंने जिक्र छेड़ा और बारह बजे तक ताड़पत्र मिल चुका था. वो खुशी से पागल हो गई. रास्ते में चार बार स्कुटी लड़ाई, जिससे मेरे पाँव में चोट लग गयी. कहने लगी कि अभी तक कि जीवन की सारी सोंच ही गलत साबित हो गई. अब वो खुद समझने लगी कि ताड़पत्र जब मेरे घर के पास वाले केन्द्र में आया हुआ था, उसी समय राहुल का दिल्ली में तेरह साल में पहली बार इतना ज्यादा बीमार पड़ना कि वो डर गया और मेरे घर आने को तैयार हो जाना, फिर डेंगू का रिपोर्ट निगेटिव आना, ये सब पूर्वनिर्धारित था. ये बिलकुल सच भी है कि अगर मैं इतना मजबूर न होता तो कभी इस तरह पाँच दिन से दूसरे के घर में न रह रहा होता.

मुझे वहाँ से रिटर्न आते समय मेहरौली में भगवान श्री कृष्ण की बहन योगमाया के मन्दिर में वो देवी का और पाँचों पाण्डवों का दर्शन करवायी. जब माँ यशोदा के पास वासुदेव जी ने कान्हा को छोड़ा तो नन्द बाबा ने अपनी बेटी को मित्र वासुदेव को दे दिया. जब कंस ने उस देवी को पटककर मारना चाहा तो वो देवी आकाश में उड़ गयीं और दो स्थानों पर स्थापित हो गयीं. उन योगमाया का एक भाग विन्ध्याचल में स्थापित हो गया और दूसरा मेहरौली में.

मुझे पहली बार उसी मेहरौली मन्दिर में दर्शन का अवसर मिला. ये सब अष्टमी के दिन हो रहा था. अगले दिन नवमी को रेखा मुझे फरीदाबाद अपने गुरु जी के सामुहिक यज्ञ में बैठने के लिए ले गई. मैं हर त्यौहार घर में बैठे-बैठे बिता देता हूँ. कर्मकाण्ड के मामले में थोड़ा आलसी हो गया हूँ. हमेशा अपने बिस्तर पर ही अघोरियों की तरह ध्यान में बैठे रहना ही मेरा पसंदीदा काम है. माँ ने दुर्गा पूजा में इतना स्वास्थ्य बिगाड़ कर दो काम करवा दियें, रेखा का ताड़पत्र मिलवा दिया और अष्टमी तथा नवमी को मुझ आलसी से भी देवी दर्शन और हवन करवा दिया.

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