अमृतसर हादसा : रेल प्रशासन नहीं, ज़िला प्रशासन है ज़िम्मेदार

आज से कोई 7 – 8 साल पुरानी बात है… जालंधर मुकेरियां रेल सेक्शन की। मुकेरियां एक स्टेशन है जालंधर-पठानकोट के बीच।

हुआ ये कि रेल का एक कनिष्ठ अधिकारी PWI (Path Way Inspector) अपने दो gangmen के साथ on duty रेलवे ट्रैक का मुआयना करते हुए ट्रैक के बीचों बीच चले जा रहे थे।

ऐसे रेल कर्मी जो ट्रैक्स पर काम करते हैं वो अनिवार्यतः लाल कपड़े पहनते हैं… लाल निशान मने खतरा… Stop…

तीनों कर्मचारी बातों में मशगूल… दीन दुनिया से बेखबर… ट्रैक के बीचों बीच चले जा रहे थे। पीछे से मालवा एक्सप्रेस आ गयी।

दिन में आमतौर पर ट्रैक पर विज़िबिलिटी आधा पौना किलोमीटर तो होती ही है… ड्राईवर ने देख लिया कि सामने रेलकर्मी चले जा रहे हैं। उसने हॉर्न दिया।

ड्राईवर ये मान के चलता है कि हॉर्न की आवाज़ सुन के या गाड़ी देख के व्यक्ति सामने से हट जाएगा… उसने हॉर्न बजाया, तब तक गाड़ी अगले 5 – 10 सेकंड्स में नज़दीक आ गयी… अब रेल कर्मी सिर्फ आधा Km दूर थे…

ड्राईवर लगातार हॉर्न बजाता रहा पर रेलकर्मी बातचीत में इतने मशगूल कि सुनें ही न… अंत में ड्राईवर ने ब्रेक लगाए… पर अब उसके पास safe distance बचा ही न था…

उसका हॉर्न लगातार चीखता रहा… पर रेल कर्मी न हटे। अंततः उनको होश तब आया जब कि रेल इंजन एकदम ऊपर चढ़ आया।

उस दर्दनाक हादसे में 3 या शायद 4 रेल कर्मी मारे गए… जहां वो रेल से कटे, रेल उसके लगभग 200 मीटर आगे जा के रुकी…

इस हादसे की चर्चा बहुत दिन रही अखबारों में, समाज में…

गलती सरासर ट्रैक पर चल रहे रेलकर्मियों की थी… ड्राईवर ने तो बचाने की बहुत कोशिश की… हॉर्न से हाथ हटाया ही नहीं… पर मरने वालों बातों में इतने मशगूल कि उनको पीछे से आती मौत का शोर ही न सुनाई सिया…

कोई ड्राईवर नहीं चाहता कि उसकी ट्रेन के नीचे आदमी तो क्या, चींटी भी मरे… मैंने कुल दो बार रेल के इंजन में सफर किया है। एक बार मेरे सामने एक पाड़ा कटा… ड्राईवर ने दो सौ मीटर पहले ही उसे देख लिया…

उसके मुंह से निकला… पाड़ा कट रहा है… उसने खूब हॉर्न बजाया… मौत देख पाड़ा भगा भी… पर इंजन के एक कोने से टकरा के दूर गिरा… सहायक ने पूछा, बचा क्या? ड्राईवर ने दुखी मन से कहा, नहीं बच पाया… ये सत्य घटना है , मेरी आंखों देखी…

दो स्टेशन बाद गाड़ी रुकी। हम तीनो उतर के इंजन देखने गए… एक कोने पर उसके बाल और चमड़ी के कुछ अवशेष लगे थे… बच नहीं पाया…

अपने केबिन में बैठा ड्राईवर पूरी तरह असहाय होता है। ब्रेक मारता है, हॉर्न बजाता है और बदहवास चिल्लाता है… बचो… ज़्यादातर ड्राईवर अंतिम क्षण में आंख बंद कर लेते होंगे… मौत की दहशत भरी वो आंखें भूलती होंगी क्या तमाम उम्र? पागल न हो जाते होंगे?

ड्राइवर बचाने की आखिरी कोशिश करता है पर उतनी ही न करेगा जितनी बस में होगी…

मुकेरियां हादसे में भी रेलवे की जांच हुई थी। ड्राईवर की कोई गलती नहीं पाई गयी।

उसी सेक्शन पर एक बार रेलें भी टकराई थीं। सोमनाथ एक्सप्रेस और डीएमयू… ट्रैक के घुमाव (curve) के कारण विज़िबिलिटी सिर्फ 350 मीटर थी। ब्रेक की गुंजाइश ही न थी। बहुत लोग मारे गए थे उस हादसे में भी।

दशहरे पर हुए रेल हादसे में ड्राईवर की कोई गलती नहीं।

हाँ, यदि उसको caution order मिलता कि आगे भीड़ है, और 15 KmPH की स्पीड से चलो… तो फिर वो इस स्पीड से चलते हुए 100 मीटर पहले ही गाड़ी रोक लेता…

गलती सिर्फ ज़िला प्रशासन की है, रेल की नहीं…

मैं आपको पहचानता नहीं, क्या ये मेरी गलती है?

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