समानता पर बात निकलेगी तो बहुत दूर तक चली जाएगी

सुन-पढ़ रहे हैं कि सबरीमाला में प्रवेश करने के लिए कुछ एक महिला पत्रकार ने नदी व जंगल मार्ग से जाने का असफल प्रयास किया।

क्यों, क्या वे किसी किले में प्रवेश के लिए युद्धरत हैं? कोई उन्हें यह क्यों नहीं बतलाता कि यह मंदिर है, आस्था का केंद्र।

क्या आप वहां पूजा के लिए जा रही थीं? नहीं, यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि उन पत्रकारों ने स्वयं कहा कि वे अपनी ड्यूटी (पेशे) के निर्वहन के लिए जाने का प्रयास कर रही हैं।

यह सब कितना हास्यास्पद है। जिनके लिए यह सब किया जा रहा है वे श्रद्धालु महिलाएं स्वयं आंदोलन करके विरोध दर्ज़ कर रही हैं और ना स्वयं दर्शन के लिए जाना चाहती हैं बल्कि अन्य को भी नहीं जाने दे रही हैं। तो फिर यह सब किसके लिए?

यह सवाल संदेह के साथ साथ पूरी व्यवस्था पर शक के बीज बोता है। और यह शक गहरा तब हो जाता है जब ऐसे अथक प्रयास किसी और मज़हब के पूजा स्थल के लिए कभी नहीं किये गए। हर तरह की स्वतंत्रता देने वाला हिन्दू समाज अगर आज आंदोलित है तो वो अकारण नहीं।

ऊपर से बुद्धिजीवियों के कुतर्क! वो इसलिए कि कोई सबरीमाला को तीन तलाक से तुलना कर रहा है। यह सब सुन-पढ़ कर इनकी बौद्धिकता पर भी शक होता है। अरे अगर तीन तलाक से तुलना ही करना है तो बाल-विवाह और दहेज प्रथा से करो, बुर्के की तुलना तो घूँघट प्रथा से ही हो सकती है, यह सब सामाजिक कुरीतियां हैं जिसे हिन्दू समाज स्वयं आगे बढ़ कर तेजी से छोड़ रहा है।

क्या हम सच में प्रजातंत्र हैं? लगता तो नहीं। अगर ऐसा होता तो प्रजा की आस्था व भावना का ज़रूर ध्यान रखा जाता। ना कि प्रजा पर जबरन निर्णय थोपे जाते।

और जहां तक रही बात समानता की, कैसी समानता? कोई पिता अगर यह कहे कि परिवार में माँ को बच्चे ज्यादा प्यार करते हैं इसलिए उसे भी माँ बनना है, तो क्या यह समानता उसे दी जा सकती है?

और माँ पर याद आया कि यह सब देख कर कहीं स्वर्ग लोक से देवता भी कोई याचिका ना लगा दें कि जगत जननी माता दुर्गा की पूजा नौ दिन और मेरी सिर्फ एक दिन क्यों होती है?

यह सब कितना हास्यास्पद लगता है, मगर हॅसने की जगह कभी किसी ने पूछा कि सनातन को छोड़ कर अन्य सभी मज़हब पंथ सम्प्रदाय में ईश्वर सिर्फ पुरुष ही क्यों?

समानता पर बात निकलेगी तो बहुत दूर तक चली जाएगी, वहां तक जहां तक जवाब के लिए कोई जाने को तैयार नहीं होगा।

फ़र्ज़ी भक्तों और फ़र्ज़ी सेक्युलर्स के गाल पर करारा तमाचा है केरलवासियों की एकता

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