वर्तमान में ही है अतीत का रहस्य और भविष्य की कुंजी

वामपंथी बहुत ‘क्यूट’ होते हैं। वे अक्सर पूछते हैं कि अगर मुगल आक्रमणकारी थे, बर्बर थे, धर्मांतरण करवाते थे, तो भारत में इतने हिंदू बच कैसे गए?

डालडा-हिंदू और भोले-भोले हिंदू भी उन धूर्तराटों के जाल में फंसकर यही सवाल पूछते हैं। हालांकि, प्रश्न का उत्तर आज के दिन में है, चहुंओर बिखरा है… बस, आंखें खोलने की देर है।

केरल के शबरीमला चलें। वहां जो संघर्ष कर रही दादी अम्मा, मां-बहन, चाचा-भाई आदि इत्यादि हैं, वे उन हिंदुओं के प्रतीक हैं, जिन्होंने जान दे दी, धर्म नहीं त्यागा। वे गुरु गोविंदसिंह के वंशज है, बंदा बैरागी की वीर संतानें हैं।

जो पुलिस वाले या नेता की खाल में छिपे नामधारी हिंदू हैं, उनकी नसों में मानसिंह या जयचंद वाला रक्त उबाल मार रहा है। अपनी मनसबदारी के लिए वे देश, धर्म और समाज सब कुछ दांव पर लगा चुके हैं।

जो क्रिप्टो-क्रिश्चियन या मुसलमान सीधे हमलावर हैं, वे उस काला पहाड़ की संतानें हैं, उस बाबर, तैमूर, खिलजी की औलादें हैं, जिन्होंने हर चंद कोशिश की, इस देश से सनातन का नाम मिटाने की। पिछले 1200 वर्षों से उनका प्रयास अनवरत जारी है। आगे भी रहेगा। वे चूकेंगे नहीं, रुकेंगे नहीं, थकेंगे नहीं।

आप देखिए न। शबरीमला में किसी तरह जाने की चुल किसे मची है… फातिमा नाम की मुस्लिम को, एक ईसाई को। जिनकी वो जगह भी नहीं है, उनका अधिकार ही नहीं है। शबरीमला जाने के पहले भी 41 दिनों की तैयारी होती है। इनकी तैयारी में क्या था? सैनिटरी पैड्स…

वक्ष-बंधिनी-दाह गिरोह (ब्रा-बर्नर गून्स) की तथाकथित नारीवादियों को पता भी नहीं है कि शबरीमला की ऊंचाई क्या है, वह जंगलों से घिरा है, लेकिन उसे संघर्ष का अड्डा बना दिया गया है।

कोई नदी तैर रही है, कोई हेलमेट लगाकर जंगल फांद रही है, ऊपर से इनका वामपंथी आका येचुरी या विजयन भड़काऊ बयानबाजी कर रहा है। (वैसे येचुरी, काश कि यह आंदोलन बाबरी ढांचे के समय वाला हो जाए और तुम लोगों की एकाध और देन इस भारत-भूमि से उठ जाए…)।

सत्ता और राजनीति निर्वीर्य है, होती है, रहेगी। समाज को आगे आना होगा। हो क्या रहा है? उत्तर के रीढ़विहीन हिंदू फेसबुक तक पर इसको लिखने से बच रहे हैं, कोई मियां भाई बुरा न मान जाए… बिरयानी कैसे खाएंगे, कहीं जॉन दु:खी हो गया, तो केक कैसे खाएंगे… कोई ब्रा-बर्नर ब्रिगेड वाली गुस्सा गयी, तो अगली लड़की से कौन मिलवाएगा… दारू कौन पिएगा साथ में… आदि-इत्यादि।

प्रधान सेवक आज शिरडी घूम रहे हैं। गोरक्षकों के वक्त डॉजियर बनाने वाले 56 इंच को आज बोलने में दिक्कत हो रही है, एससी-एसटी एक्ट के वक्त अधिसूचना आने में देर नहीं लगी, शबरीमला में हाथ बंध गए हैं, क्योंकि मीलॉर्ड ने मना कर दिया है। अद्भुत डरपोक सरकार है, भाई (खैर, इस डरपोक सरकार पर अलग से लिखूंगा)…।

हिंदू क्यों विदा होते गए, यह रहस्य नहीं है। हिंदुत्व क्यों बचा रहा, यह भी रहस्य नहीं है… हिंदुत्व आगे बचेगा या नहीं, यह बस अनुपात का खेल है। हमारे प्रधानसेवक जैसे अधिक होंगे जो दशहरा के दिन शस्त्रपूजन या मां शक्तिपूजन के बदले एक विवादित लाश को पूज रहे हैं, या लाठी टेकती वह 70 साल की बूढ़ी अम्मा जो अपने अयप्पा के लिए सड़क पर आ गयी है…

….बस, इसी पर भारत और हिंदुओं का भविष्य टिका है… छिपा है।

(अपने अंदर के रावण को मारिए, क्योंकि बाहर तो वह आपको मारने के लिए खड़ा है ही। नमो बुद्धाय)

फ़र्ज़ी भक्तों और फ़र्ज़ी सेक्युलर्स के गाल पर करारा तमाचा है केरलवासियों की एकता

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