मोदी जी, हमारी आगामी पीढ़ी के अस्तित्व का प्रश्न है 2019

भारत का 2014 का लोकसभा का चुनाव इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वतंत्र भारत का यह पहला चुनाव था जिसमें भारत की अस्मिता पहली बार विजित हुई थी। इस विजय से सत्ता पर राष्ट्रवादिता व हिंदुत्व के अंकुर पहली बार फूटे थे।

मेरे अनुसार इस विजय का अनुभव यह रहा कि पहली बार एक भारतीय को अपने शत्रुओं का पूर्ण परिचय मिला है और उसके साथ ही उनकी वास्तविक शक्ति की पहचान ने हमको अपनी ही कमज़ोरियों का आंकलन करने का अवसर दिया है।

मैं समझता हूँ कि जो अंकुर 2014 में फूटे थे, उनके पल्लवित होकर, सुदृढ़ होने का काल आ गया है। इसी लिये भारत में 2019 के लोकसभा के चुनाव और भी महत्वपूर्ण है।

इसी महत्व को समझते हुये हर वह व्यक्ति, जो नरेंद्र मोदी को फिर से भारत का प्रधानमंत्री बना रहा है, उसके पास उनको फिर से प्रधानमंत्री बनाने के कारण है।

ऐसा मेरे साथ भी है।

वैसे तो कई कारण है, जैसे भारत का विकास, भारत का वह वर्ग जो 1947 से पहले ही नेपथ्य में था, उसका उत्थान, 21वीं शताब्दी में वर्तमान की दिग्भ्रमिता में हिंदुत्व का पुनर्वास और केंद्र में भ्रष्टाचार रहित शासन।

लेकिन मेरे लिये, मोदी को फिर से भारत की बागडोर देने के पीछे जो सबसे महत्वपूर्ण कारण है, वह है पराभव और खंडन की ओर तेज़ी से बढ़ते हुये भारत की गति को रोक कर, भविष्य की पीढ़ी के लिये एक सुरक्षित भारत प्रदान करने के लिये, नरेंद्र मोदी द्वारा द्रुतगति से रक्षा व सुरक्षा का चक्रव्यूह बनाना है।

मेरा अनुभव है कि भारत की रक्षा व सुरक्षा ही दोनों ऐसे विषय हैं जिसकी एक सामान्य भारतीय के लिये प्राथमिकता या तो दाल, टमाटर, पेट्रोल के आगे नहीं होती है और यदि होती है तो वो नारेबाज़ी और भावनात्मक आवश्यकता से ज्यादा नहीं होती है।

जब भी राष्ट्रभक्ति व संप्रभुता की बात होती है तो एक आम भारतीय सब कुछ पाना चाहता है और कर्महीन हो, विश्व के शीर्ष पर होना चाहता है।

वो कश्मीर की घाटी से आतंकवाद खत्म करके वहां मकान बनवाना चाहता है, वो पाकिस्तान को रौंद कर उसको खंडित करना चाहता है, वो लद्दाख से लेकर अरुणाचल की सीमा पर चीन को मुंहतोड़ जवाब देना चाहता है, अमेरिका, रूस, चीन को ठेंगा दिखाते हुये बंगाल की खाड़ी से लेकर हिन्द महासागर, अरब सागर तक एक छत्र दबदबा भी बनाना चाहता है।

लेकिन साथ में खुद के जीवनयापन पर कोई निषेध नहीं चाहता है, वो यह भी नहीं जानना चाहता है कि अब तक यह सब ऐसा क्यों नहीं हो पाया है, साथ में यह भी नहीं जानना चाहता है कि जो हो रहा है वो कहाँ, कैसे हो रहा और इस सबकी कीमत क्या है?

इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि मोदी स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री है जिन्होंने भारत की रक्षा व सुरक्षा को न सिर्फ प्राथमिकता बनाया है बल्कि उसको गम्भीरता से लेते हुये अल्पकालीन व दीर्घकालीन योजनाओं पर द्रुतगति से काम भी किया है।

मेरा यह दृढ़तापूर्वक मानना है कि मोदी जहां भावनात्मक रूप से अपने राष्ट्र, भारत से जुड़े है वहीं पर उसके भविष्य के लिये, भारत व भारतीयों की मूलभूत कमज़ोरियों को लेकर, बड़े व्यवहारिक रूप से केंद्रित है।

यह उनकी व्यवहारिकता ही है कि भविष्य में होने वाली विप्लवकारी घटनाओं की निश्चयात्मकता को स्वीकार करते हुये उन्होंने 1947 से चली आ रही भारत की पाकिस्तान केंद्रित रक्षा व विदेश नीति को 2014 के बाद बदल कर, चीन केंद्रित कर दिया है।

भारत का प्रधानमंत्री बनने के पहले ही दिन से, मोदी ने विदेश, रक्षा व आंतरिक नीतियों को इसी पर केंद्रित कर विकसित किया है। उन्होंने अगले दशक को लक्षित करते हुये इस दिशा में जो भी किया है, वह भारत की स्वतंत्रता के बाद से ही चीन को लेकर नीतिगत कमजोरियों व असामान्य संतुलन को दूर करने के लिये किया है।

मोदी ने अन्य देशों से जो भी मित्रता, उनसे आर्थिक व सामरिक अनुबंध व सन्धियाँ, उनसे आधुनिक सैन्य सामग्री का क्रय करना व आत्मनिर्भर बनने के लिये प्रौद्योगिकी हस्तांतरण करा उत्पादन करना, जो भी किया है, वह, कम से कम समय में, उन कमियों को, ज्यादा से ज्यादा दूर कर के, भारत को प्रतिघात योग्य बनाने के लिये किया है।

मैं पूर्व में मोदी सरकार की विदेश नीति, सामरिक गठबंधनों और उसके हिंद महासागर में नौसेना को प्रभावी बनाये जाने के प्रयास पर लिखता रहा हूँ लेकिन आज जब मोदी सरकार अपने प्रथम कार्यकाल के अंतिम वर्ष में है, मैं यह निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि भले ही भारत के बहुत बड़े वर्ग को इन सब बातों से मतलब नहीं है लेकिन इन चार वर्षो में मोदी ने भारत की संप्रभुता व उसके खंडित होने के खतरे को चिह्नित कर के काफी हद तक दूर कर दिया है।

मेरा स्पष्ट मानना है कि भारत की संप्रभुता व अखंडता के लिये बने यह खतरे, जो बाह्य के साथ आंतरिक भी हैं, उनके पूर्णरूप से निवारण व विध्वंस की प्रक्रिया की जो धारा मोदी सरकार की नीतियों से निकली है, उसको अविरल बहने के लिये नरेंद्र मोदी को 2019 में फिर से आना है। यह हमारे अस्तित्व का नहीं है बल्कि हमारी आगामी पीढ़ियों के अस्तित्व का प्रश्न है।

चाणक्य नीति के छत्र में मोदी सरकार की विदेश व रक्षा नीति

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