क्या इंदिरा के इशारे पर तोड़े-मरोड़े गए थे फिल्म ‘गांधी’ के दृश्य!

रिचर्ड एटनबरौ की फिल्म में गांधी की भूमिका में बेन किंग्सले

1982 में एक फिल्म आयी थी ‘गांधी’। मूल रुप से महात्मा गांधी के जीवन पर आधारित इस फिल्म को इंग्लैंड में रहने वाले रिचर्ड एटनबरौ (Richard Attenborough) ने अपने दूसरे प्रयास में बनाया था।

सबसे पहले गैब्रियल पास्कल ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के साथ गांधी के जीवन पर आधारित एक फिल्म बनाने का समझौता किया। लेकिन फिल्म का निर्माण अभी शुरू हो पाता तब तक 1954 में ही पास्कल की मौत हो गयी और यह फिल्म अधर में रह गयी।

इसके बाद गांधी के जीवन पर फिल्म बनाने का सपना लिये एटनबरौ लंदन उच्चायोग में कार्यरत मोतीलाल कोठारी से मिले।

कोठारी, गांधी जी के परम भक्त थे और उनकी सलाह पर ही एटनबरौ लार्ड माउंटबेटन और नेहरु से भी मिले। इसके बाद फिल्म बनाने का मसौदा तय हुआ। लेकिन अभी यह फिल्म शुरू हो पाती तब तक कोठारी का देहान्त हो गया और यह फिल्म दोबारा बनने से रह गयी।

अपने दूसरे प्रयास में एटनबरौ 1976 में लंदन के वारनर ब्रदर्स की सहायता से फिर से इस प्रोजेक्ट पर लगे और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलकर इस फिल्म के निर्माण का मसौदा दोबारा तैयार हुआ।

लेकिन उन दिनों भारत में आपातकाल के कारण इस फिल्म की शूटिंग नहीं शुरू हो पायी। लेकिन रानी दुबे के प्रयास से एनएफडीसी ने इस फिल्म के लिये दस मिलियन अमेरिकी डॉलर के बजट की स्वीकृति दे दी।

इसके बाद 1980 में इस फिल्म की शूटिंग शुरू हुई और 1982 में नवंबर के अंत में इसका प्रदर्शन हुआ। कुल 28 मिलियन डॉलर के बजट वाली इस फिल्म ने विश्वव्यापी बॉक्स आफिस के माध्यम से लगभग 128 मिलियन डॉलर की कमाई का रिकॉर्ड बनाया तथा साथ ही उस साल के आठ ऑस्कर पुरस्कारों के साथ अन्य अनेक पुरस्कार भी जीतने में कामयाब रही।

वैसे तो एटनबरौ ने इस फिल्म को बनाने से पहले आवश्यक रिसर्च ज़रूर की थी, लेकिन उनकी अधिकांश पटकथा मोतीलाल कोठारी, माउंटबेटन, नेहरू और इंदिरा गांधी द्वारा बताये घटनाक्रमों पर ही आधारित थी। पूरी फिल्म को उन्होंने गांधी के जीवन के इर्दगिर्द ही रखने का प्रयास किया जिसमें वह बहुत हद तक सफल भी रहे।

चूंकि यह फिल्म ही गांधी के जीवन पर आधारित थी लिहाजा उन्होंने इसमें उनके जीवन के सिर्फ सकारात्मक पहलुओं को ही दिखाने का प्रयास किया। फिर भी इंदिरा गांधी की इस फिल्म में विशेष रुचि के कारण उनके कहने पर कुछ गैर ऐतिहासिक तथ्यों को थोड़ी चाशनी के तौर पर शामिल कर लिया गया।

चूंकि आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी के लिये यह फिल्म एक संजीवनी साबित होने वाली थी और उस दौर के राजनीतिक परिदृश्यों के हिसाब से गांधी को फिर से आम जनमानस के पटल पर दोबारा स्थापित किया जाना जरुरी था, लिहाज़ा इंदिरा ने बहुत सारे दृश्यों को अपने मन मुताबिक फिल्माये जाने के लिये इस फिल्म की टीम में अपने कुछ खास आदमियों को पहले ही शामिल करवा दिया था। रानी दुबे उनमें से एक थीं।

वह राजनीतिक दौर ऐसा था जिसमें जनता पार्टी अपनी शक्ति बढ़ाकर कांग्रेस को चुनौती देने की स्थिति में आ चुकी थी। ऊपर से जनसंघ का साथ पाकर वह इंदिरा को सत्ता से बेदखल भी कर चुकी थी। लिहाजा लोगों में जनता पार्टी और विशेषकर जनसंघ के प्रति घृणा पैदा करना इंदिरा की राजनीतिक मजबूरी थी और गांधी पर बन रही फिल्म एक लंबे अरसे के लिये इसमें सहायक सिद्ध हो सकती थी।

लिहाज़ा जानबूझ कर उसमें कुछ ऐसे तथ्य रखे गये जो जनता को सीधे तौर पर सिर्फ कांग्रेस से जोड़ सकते थे। मसलन जालियांवाला बाग हत्याकांड तो दिखाया गया लेकिन भगत सिंह और बाकी क्रांतिकारियों का कहीं भी इस फिल्म में ज़िक्र नहीं हुआ।

आजादी के पूरे आन्दोलन में सुभाष चन्द्र बोस और अनेक ऐसे व्यक्तियों को फिल्म में तनिक भी जगह नहीं मिली जो भले ही गांधी के जीवन से जुड़े रहे हों लेकिन इंदिरा गांधी की राजनीति में फिट नहीं बैठते थे।

अगर आपने यह फिल्म देखी है तो आपको याद होगा कि इसमें नाथूराम द्वारा गांधी को गोली मारते हुये दो बार दिखाया गया है। फिल्म की शुरुआत इसी दृश्य से होती है और फिल्म का अंत भी इसी को दिखाकर हुआ है।

वैसे तो गांधी की शवयात्रा को फिल्माने के लिये तीन लाख लोगों की भीड़ इकट्ठा करना अपने आप में अब तक का विश्व रिकार्ड है। लेकिन गोली मारने वाले सीन को अगर याद किया जाय तो नाथूराम को सभा में जाते समय आंखों के इशारे से जिस व्यक्ति को संकेत करते दिखाया गया वह व्यक्ति एक दाढ़ी वाला व्यक्ति है।

गांधी की हत्या के बाद जिन सात लोगों को आरोपी बनाया गया था उनमें दिगंबर बड़गे ही एकमात्र दाढ़ी रखने वाला था जोकि बाद में सरकारी गवाह बन गया और सज़ा से बच गया।

चूंकि वह सरकारी गवाह बन चुका था और उसकी गवाही के आधार पर ही अन्य अभियुक्तों को सज़ा हुई लिहाज़ा उसकी गवाही एक ऐतिहासिक तथ्य के तौर पर ली जानी चाहिये जिसमें उसने बताया था कि वह घटनास्थल पर मौजूद नहीं था।

इस प्रकार घटनास्थल पर किसी दाढ़ी वाले व्यक्ति की मौजूदगी ऐतिहासिक तथ्य नहीं है। लेकिन फिल्म में घटनास्थल पर मौजूद इस व्यक्ति की वेशभूषा और चेहरा तत्कालीन संघ प्रमुख माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर के जैसा दिखाया गया।

यह कोई ऐसा कार्य नहीं था जो हड़बड़ी में या भूलवश या कम जानकारी की वजह से हो गया हो। बल्कि यह इंदिरा गांधी की पूरी सोची समझी रणनीति का हिस्सा था।

ऐतिहासिक तथ्य है कि गुरु गोलवलकर या संघ का गांधी की हत्या से कोई वास्ता नहीं था। नेहरु ने गांधी की हत्या के बाद भले ही संघ पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही गुरु जी को गिरफ्तार किया था लेकिन प्रारंम्भिक जांच में ही सबकुछ स्पष्ट हो जाने के बाद उन्हे रिहा करने के साथ ही संघ से प्रतिबंध भी हटा लिया गया था। लेकिन इस ऐतिहासिक तथ्य को नकारकर फिल्म में गुरु जी जैसे व्यक्ति को नाथूराम की सहायता करते दिखाना इंदिरा गांधी के इशारे पर हुआ था।

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