विजयादशमी : सत्य को प्रमाण की क्या आवश्यकता

विश्वभर में रामकथा और कृष्ण कथा हजारों रूपों में कही-लिखी गयी है, जिसमें यह तय करना असंभव ही है कि कौन सी कथा अधिक तथ्यात्मक है। राम या कृष्ण का कौन सा चरित्र अधिक प्रामाणिक है।

जहां जनसामान्य ने कृष्ण के बाल स्वरुप और प्रेमी स्वरूप को कृष्ण के कर्मयोगी स्वरूप से कहीं ज्यादा तवज्जो दी है, वहीं राम को बारम्बार एक पति, पुत्र और भाई की कसौटी पर ही परखा गया है।

लेकिन मायने सिर्फ यही रखता है कि जनसामान्य जो श्रीराम या कृष्ण को अपना आराध्य मानता है, क्या उसके मन भी अपने आराध्य के प्रति वैसी कोई शंका या भ्रम है जैसा अक्सर प्रचारित किया जाता है?

कृष्ण पर बारम्बार आरोप लगता है कि वो गोपियों को छेड़ते थे, जबकि हम यह भूल जाते है कि कौरवों द्वारा द्रौपदी के चीरहरण की मंशा पर कृष्ण ने ही पानी फेर दिया था।

राम पर बार-बार आरोप लगते है कि राम ने सामाजिक दबाव में आकर गर्भवती पत्नी सीता को अपवित्र मानते हुए उनका त्याग कर दिया। किन्तु हम यह भूल जाते हैं कि यदि जनसामान्य के बीच सीता के चरित्र को लेकर शंकाएं थी तो क्यों त्रेता युग के सैकड़ों-हज़ारों वर्ष बाद भी सीता को राम के साथ बराबरी से पूजा जाता है? क्यों नहीं हिन्दू समाज ने सीता को अपवित्र और पतिता मानकर सदा के लिए भुला दिया?

अत: जनसामान्य का हवाला देकर, लोककथाओं में क्या कहा गया है यह मायने ही नहीं रखता, क्योंकि जनसामान्य कभी भी सीता और राम को अलग करके देख ही नही सकता। जो राम को पूजता है वो सीता को भी पूजता है।

बुद्धिजीवियों द्वारा राम पर लगाए गए तमाम लांछनों के बावजूद सैकड़ों वर्षों से राम और सीता को साथ ही देखा और पूजा जाता है। भारतीय जनमानस की ओट लेकर सीता की पवित्रता पर बात वही लोग करते हैं जो राम को मानते ही नहीं। माता सीता और भगवान राम के प्रति हिन्दू समाज की आस्था का सबसे बडा प्रमाण यह है कि आज भी किसी सुंदर नवविवाहित जोड़ी की तुलना लोग ‘राम-सीता’ की जोड़ी से करते हैं।

स्त्री की पवित्रता – अपवित्रता, आज़ादी – पाबंदी पर जितना बखेड़ा आज खड़ा किया जाता है, ऐसा कभी त्रेता युग या द्वापर युग में नहीं था। स्त्री को जो स्वतंत्रता उस काल में थी वैसी आज भी नहीं है… जिसका प्रमाण है सीता से लेकर द्रौपदी तक सबने बकायदा राष्ट्रीय – वैश्विक स्तर पर आयोजित ‘स्वयंवर’ के तहत अपनी शर्तों से अपना जीवनसाथी चुना था।

अपना साथी चुनने की यह ‘आज़ादी’ सिर्फ कुछएक उच्च वर्गों में ही नहीं थी बल्कि सभी वर्गों में थी, तभी मत्स्य कन्या सत्यवती ने विवाह पूर्व ही अपनी मर्ज़ी से ऋषि पराशर के साथ सम्बंध बनाये और बकायदा एक पुत्र को जन्म दिया।

लेकिन ‘रावण’ और ‘महिषासुर’ को पूजने वाले बुद्धिजीवियों को केवल कुंती द्वारा त्यागे गये ‘कर्ण’ का प्रसंग याद रहेगा जो अपनी कुबुद्धि और हीनभावना के चलते दुर्गति को प्राप्त हुआ, और सत्यवती द्वारा त्याग दिये गये ‘वेदव्यास’ को भुला दिया जायेगा जो किसी कुंठा, किसी हीनभावना से कोसों दूर अपना ऋषि धर्म निभाते रहे… और समय – समय पर राजधर्म भी निभाते रहे।

बहरहाल आज न वो राजव्यवस्था है, न वो समाज व्यवस्था, न ही वैसे नियम या परम्पराएं, फिर भी यदि हम आज के परिप्रेक्ष्य में उस दौर पर शोध करने को आतुर रहें तो निराशा ही हाथ लगेगी।

इसलिए राम या कृष्ण के विषय में कही और लिखी गयी बातों से ज्यादा महत्व, राम और कृष्ण को आराध्य मानने वालों का हो जाता है, उनके मन मे कोई भ्रम नहीं, कोई शंका नहीं… उन्हें कोई प्रमाण नहीं चाहिए, न सीता की पवित्रता का, न राम के चरित्र का।

विजयदशमी की शुभकामनायें

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