“अच्छे हिन्दू” का असली अर्थ समझ गए हैं आप?

फ्लैशबैक ज़रूरी है बाबरी पर, कम से कम मेरे लिए। जब बाबरी का कलंक मिटाया गया था तो हिंसा के उठे बवंडर से भले भले विश्वामित्र स्टाइल से कन्नी काट गए थे और अकेले बालासाहेब ठाकरे ने ही कहा था कि मैं उन्हें शिवसैनिक मानता हूँ।

लेकिन उस समय भी कई लोग दुबक गए थे कि जो हुआ अच्छा नहीं हुआ, मंदिर बनाने की क्या ज़रूरत है, यह तो सौहार्द्र, सद्भाव को धक्का पहुंचाया गया है इत्यादि इत्यादि।

चूंकि सब ने कन्नी काटी थी और केंद्र में काँग्रेस ही सत्ता में थी, अक्सर लोग मंदिर का पक्ष लेने में कतराते थे और मंदिर विरोधी त्योरियाँ चढ़ाकर बात करते थे।

ज़रा कुरेदने पर पता चलता था कि उनका क्रोध वास्तव में उनकी कायरता ढँक रहा होता था, इसलिए मंदिर उनके लिए अनावश्यक था। कहीं हिंसा में वे मारे जाते तो? नहीं चाहिए मंदिर! इतने साल मंदिर बगैर रहे, आगे भी रहेंगे, हमें नहीं चाहिए कोई मंदिर, और उसके लिए कोई हिंसा तो बिलकुल गवारा नहीं, यही उनका कहना हुआ करता था।

जहां भी उनकी कायरता को एक्सपोज़ करो तो वे तैश मैं आया करते थे। कायर कहने की आवश्यकता नहीं थी, वे ही आप को क्या क्या कह देते थे। कुल मिलाकर कहानी ये थी कि सामनेवाला अगर आप से प्यार करता था (मतलब रिश्तेदार, दोस्त, किसी बड़े रिश्तेदार के दोस्त, दोस्त के पिता, माँ, आदि) तो डांट समझाइश के अंदाज़ में पड़ती थी और आप के घर हिदायत पहुँच जाती आप पर नज़र रखने की।

धीरे धीरे माहौल बदलता गया लेकिन फिर भी सरकारी अमले में खुद को हिन्दू घोषित करना एक अघोषित गुनाह सा ही रहा। आप व्यक्तिगत तौर पर बहुत ही कर्मकांडी हो सकते थे, किसी को उससे एतराज़ नहीं होता था। लेकिन हिन्दू अस्मिता से परहेज़ करना लाज़मी था। यह था वाम प्रभाव।

प्राइवेट सेक्टर में भी वाम ने एचआर में अपनी पैठ बनाई है। इसलिए वहाँ भी किसी धार्मिक गतिविधि की मनाही है। हाँ, पूजा आदि हो सकती है, लेकिन राम मंदिर, या किसी से जय श्री राम कह देना वगैरह भौंहें ऊंची कर सकता है, तब तक जबतक आपकी नजरें न झुकें। और हार्मनी और अनुशासन के नाम पर इस तेवर का खुला समर्थन भी होता है।

2014 में मैं एक जगह कंसल्टंट था। वहाँ के एक जीएम साहब से अच्छी पटती थी। बड़े धार्मिक व्यक्ति थे, और आयुर्वेद में बड़ा नाम था। संस्कृत के भी अच्छे जानकार थे, केवल पास होने के लिए रट्टामार संस्कृत नहीं थी। वैसे कंपनी लगभग अधिकतर मराठी बहुल थी और मालिक एक भाजपा समर्थक मराठी ब्राह्मण थे।

एक दिन लंच पर चर्चा हुई उसमें मंदिर का विषय निकला। अधिकतर लोग खुलकर पक्ष में बोले तो ये चुप रहे क्योंकि वे लोग उनके विभाग के नहीं थे और जिस विभाग के थे उसके हेड भी खुलकर मंदिर के पक्ष में थे।

लंच के बाद मैं उनके साथ बैठा था तो उन्होने बात छेड़ी। बहुत तमतमाये थे। लेकिन बात वही थी कि हिंदुओं को यह मंदिर का आग्रह शोभा नहीं देता, उसे नकार देना चाहिए। उससे टकराव होता है और सब जानते हैं मुसलमान कैसे होते हैं, वे तो झट से हिंसा पर उतारू हो जाएँगे, हिंदुओं को इसलिए शांत रहना चाहिए, मंदिर न बनने से क्या बिगड़ा इतने सैकड़ों साल, जो आज न बनने से बिगड़ेगा?

सीनियर थे, उनसे झगड़ा करना नुकसान की बात थी लेकिन मेरे लिए बैठा रहना मुश्किल था। बाथरूम जाने का बहाना बनाकर उठ आया।

अगर इस लेख का तीसरा और चौथा परिच्छेद फिर से पढ़ियेगा तो समझ जाएँगे कि “अच्छे हिन्दू” का जुमला इनके जैसे लोगों को हरकत में आने का इशारा है कि अपने अपने स्टाफ से अच्छे हिन्दू बनने को कहे और यह भी बताएं कि जो भी भाजपा या मंदिर समर्थक होगा वो बुरा हिन्दू माना जाएगा और यहाँ बुरे लोगों के लिए कोई जगह नहीं, यहाँ सभी अच्छे लोग हैं।

और आप को पता ही है, मॉनिटरिंग किस तरह होती है आप अंदाज़ नहीं लगा सकते।

संभल कर चलिये और 2019 में क्या करना है इसपर स्पष्ट रहिए। 2019 इनके लिए तिलिस्म टूटने की लड़ाई है, फिलहाल ये अपने निजी स्वार्थ के लिए देश के लिए काम करती सरकार को हटाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाए हैं। वो नाकाम हो जाए तो फिर पाला बदलते इन्हें देर नहीं लगेगी। लेकिन उसके पहले ये पूरा सिस्टम का ज़ोर झोंक देंगे।

बाकी अच्छे हिन्दू क्या होते हैं इसकी व्याख्या थरूर जैसे व्यक्ति करें इतने तो बुरे दिन नहीं आए हिंदुओं के। मैं अच्छा ही हिन्दू हूँ, श्रीमान थरूर जैसे व्यक्तियों से मतभेद हों तो उससे वे मुझे बुरा कहने का कोई अधिकार नहीं रखते। बाकी चरित्र की बात वे न ही करें तो बेहतर।

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