अपनी उत्सवप्रियता के साथ कर लेते हैं दु:खों का सामना, हमें हमारे हाल पर छोड़ दो

यह देश बीमारों का है। मनोरोगियों का। हिंदू बहुसंख्यक हैं। सबसे बड़े मनोरोगी इसी जमात के हैं। इतने बीमार हैं ये कि राह चलतों को बीमार कर दें। खड़े-खड़े। अपनी बीमारी में ये खुद ही सर्वज्ञाता बन बैठे हैं।

इनको बिच्छू का मंत्र नहीं आता, ये सांप के बिल में हाथ देते हैं। फेसबुक ने इन मनोरोगियों को Lethal बना दिया है। अब ये महामारी फैला रहे हैं। आप उदाहरण मांग रहे हैं। सुनिए…

शबरीमला के बारे मे कोई कुछ नहीं जानता। आज की बिंदी-ब्रिगेड तो कतई नहीं, जो ब्रा के रंग और डिजाइन मात्र में उलझा है। बोलना सबको है। उल्टी सबको करनी है। कई डिज़ाइनर नारीवादी तो इसको कन्या-पूजन से जोड़ रही हैं। हद है।

देवियों! यह हलाला और तीन तलाक या पर्दा और बुर्का जैसी सामाजिक बात नहीं है, यह पूजन-पद्धति की बात है, आस्था की बात है।

क्या बिहार में अब पुरुषों को डोमकछ (बारात जब जाती है, तो लड़के की मां और औरतें नाच-गाना करती हैं) का विरोध करना चाहिए, क्योंकि उसमें पुरुषों को जगह नहीं। पुरुष तो पूरी दुनिया के मालिक हैं, भई बिंदी-ब्रिगेड। तो… यलगार हो!

ब्रा-बर्नर और बिंदी ब्रिगेड से खतरनाक है, भैया बनकर असल में सैयां बनने की कुंठा और कुत्सा पालने वाले तथाकथित नारीवादी हरामखोर। ये इतने ढीठ, कुतर्की, मनोरोगी और जुगुप्साजनक होते हैं कि इनसे सामना होते ही आपका हाथ जूते पर और मस्तिष्क गालियों के आविष्कार में व्यस्त हो जाए।

ये दुर्गापूजा या दीवाली जैसे त्योहारों का इंतजार करते हैं, फिर इनकी डीपी या वॉल रंग जाएगी – “देश में इतनी छेड़खानी होती है, बच्चियों के साथ अत्याचार होता है, बलात्कार होते हैं, फिर भी हम देवी-पूजा करते हैं, हम दोगले समाज के हैं, वगैरह-वगैरह—-” भइये, रहन दो यार। आंसू निकल आएंगे।

अबे, पूजा के बावजूद इतने अपराध हैं, यह सोच। उन अपराधियों को बनाने में, सहने में तेरा कितना योगदान है, यह सोच। तूने कितनी बार किस लड़की को ‘मस्त माल’ नहीं कहा है, फिरके नहीं कसे हैं, किसी सहकर्मी को लेकर यौन-कुंठित नहीं हुआ है, यह सोच मेरे शोना बाबू। पूजा जिस देवी की होती है, वह तुझे बलात्कारी बनने को नहीं कहती, घामड़….।

फेसबुक पर हाल-फिलहाल कई बार परेशानी हुई, इसलिए अब हल्की गाली या कड़े शब्दों का भी इस्तेमाल नहीं करता, वरना इन लोगों को देख कर तो भाई साब…. इच्छा होती है कि…।

इन मनोरोगियों ने अपने आसपास का माहौल भी खराब कर दिया है। आप अवसाद में आ जाएंगे… कि, ये कैसा समाज है हमारा। ये वामपंथी खुद तो बलात्कार करेंगे, उसके बाद इनके गोलवाले इनको बचाएंगे भी, बाकी पूरे समाज को ये गाली जरूर देंगे…।

भाईजी, बहनजी, जीवन में बहुत दुःख है (साभार, गौतमबुद्ध)… हम भारतीय उत्सवप्रियता के साथ इसका सामना करते हैं। हमें हमारे हाल पर छोड़ दो यार… मत घोलो इतना ज़हर कि साला मैं ज़हर ही जाकर पी लूं…

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