नि:संदेह यौनकर्म विवाह का आधार है, किंतु केवल यही सर्वस्व नहीं

सामूहिक सामाजिक भोज एक सांस्थानिक ‘चरना महोत्सव’ है!

कृषि एक सांस्थानिक ‘बीज प्रकीर्णन’ मात्र है!

युद्ध एक सांस्थानिक ‘पाशविक द्वंद्व’ है!

शिक्षा एक सांस्थानिक ‘अनुभव स्थानान्तरण प्रक्रिया’ है!

उत्सवादि एक सांस्थानिक ‘मनोरंजन’ है!

सभाएं सांस्थानिक ‘झुंड संवाद’ है!

वस्तुतः मानवता ही ‘सांस्थानिक पशुता’ है!

मनुष्य एक सामाजिक पशु है, वह अपनी चेतना, बुद्धि एवं स्मृति से उपरोक्त सभी प्राकृतिक पाशविक कृत्यों को व्यवस्थित तरीके से उत्तरोत्तर सुधारों के साथ विकसित करता आया है।

इसी तथ्य के आलोक में देखे तो विवाह भी ‘सांस्थानिक यौनकर्म’ ‘भी’ है!

पशुओं की भाँति पेट की भूख की तरह ही देह की क्षुधा को कहीं भी, कभी भी, किसी के भी साथ शमन नहीं करके मनुष्य ने उसे संयम, नियम और समन्वय के साथ विवाह संस्कार के रूप में विकसित किया।

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि,

“युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु|
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा||१७||

जो खाने, सोने, आमोद-प्रमोद तथा काम करने की आदतों में नियमित रहता है, वह योगाभ्यास द्वारा समस्त भौतिक क्लेशों को नष्ट कर सकता है।

इसी आधार पर विवाह नामक व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ ‘युक्त विहार’, मनुष्य को इस महत्वपूर्ण पुरुषार्थ के साथ साथ ही कई अन्य आवश्यक पुरुषार्थ भी सम्पन्न करने होते हैं और यह व्यवस्था उसकी सहायता करती है, सर्वांगीण रूप से।

आचार्य चाणक्य के अनुसार ‘पत्नी को शैय्या पर गणिका (वेश्या का उचित शाब्दिक स्वरूप)’ के समान होना चाहिए यथा निर्लज्ज, दक्ष, तुष्टिप्रद एवं उत्साही!

सांस्थानिक यौनकर्म कहिये, वेश्यावृति नहीं!

कारण यह नहीं हैं कि वेश्या शब्द से रोष, अपमान अथवा आहत होने के भाव उत्पन्न होते हैं वरन इसलिए कि वस्तुतः यह तार्किक रूप से भी त्रुटिपूर्ण है, अतिशयोक्ति है और दुराग्रह है।

‘गणिका का कार्य कोई पापपूर्ण कार्य नहीं है’।

जी हाँ! आप ठीक पढ़ रहे है, अनुचित लगे तो वाल्मीकि रामायण पढ़ें और समझें कि कैसे दशरथ जी ने स्वयं ससम्मान तात्कालिक गणिकाओं के एक दल को भेजा था श्रृंगी ऋषि के पास, ताकि वे दशरथ जी के लिए अश्वमेध एवं पुत्रकामेष्टि यज्ञ करें।

इस कार्य के लिए श्रृंग ऋषि जो कि जन्म से ही स्त्रियों से सर्वथा अपरिचित थे, उन्हें उन गणिकाओं द्वारा अंगदेश लाया गया जहाँ उनका विवाह शांता नामक राजकुमारी से करवाया गया। (कथा पढ़िए विस्तार से बालकांड में)

आप वहाँ पढ़ेंगे कि तत्कालीन दशरथ राज्य में जो कि लगभग रामराज्य की ही तरह सर्वगुण सम्पन्न था, वहाँ गणिकाएं पूर्णतः सम्मान की पात्र थी और राज्य के कार्यो तक में उनका यथायोग्य शुचितापूर्ण उपयोग होता था।

कामसूत्र के रचयिता वात्स्यायन के विषय में भी जब पढ़ेंगे तो जानेंगे कि मानव मात्र के कल्याण के लिए रचित इस ज्ञान के विकास, शोध एवं क्रियान्वयन के लिए गणिकाओं ने गरिमापूर्ण सहयोग किया था और इसे एक शैक्षणिक अनुसंधानात्मक कार्यभार के रूप में वात्स्यायन के निर्देश में संपादित किया गया था।

वसंतसेना के विषय मे आप मृच्छकटिकम में पढ़ सकते हैं कि तब भी गणिकाओं को लेकर कोई हेयपूर्ण अथवा भेदभावपूर्ण व्यवहार का उल्लेख नहीं है अपितु सम्मानित संस्था के रूप में वर्णन है।

यह समझ लीजिए कि हमारी संस्कृति इसे एक कला के रूप में मान्यता देती थी और इसी साहसिक बोध के चलते हम कुंठाहीन संस्कृति के वाहक थे।

अतः इस शब्द को सुनकर घृणा के मारे अपने चित्त को इतना मलिन ना करें कि विवेक त्याग कर आवेशित हो जाये किसी से विमर्श करने की बजाय!

आप को यह अंतर समझना चाहिए! यदि उद्देश्य केवल विमर्श है तो यह मेरा मत है कि आपके द्वारा शब्द गलत प्रयुक्त हुआ है भाव नहीं! आपने लिखा कि “विवाह एक सांस्थानिक वेश्यावृत्ति है। वेश्यावृत्ति का संस्थानीकरण है।”

साथ ही यह भी ध्यातव्य है कि नि:संदेह यौनकर्म विवाह का आधार है किंतु केवल यही सर्वस्व है, ऐसा भी नहीं है।

व्यवस्थाएं स्वभाव से जड़ होती है, उनकी पालना करने वाले चैतन्य पर निर्भर है कि वह व्यवस्था को कैसे क्रियान्वित करता है, वहीं से उस व्यवस्था के गुण दोष एवं भविष्य का निर्धारण होता है।

भारतीय हिन्दू विवाह अब तक सर्वाधिक सफल, दीर्घकालिक एवं सुखमय रहने के रिकॉर्ड कालक्रम को धारण किये हुए हैं। ऐसे में उसकी आलोचना कर देने से बेहतर है कि उसकी पालना में हो रही चूक, विकृति एवं दोषपूर्ण क्रियान्वन पर शोध किये जायें, ना कि विकल्प पर। क्योंकि विकल्प के अन्य सभी संभावित अवसर जो अब तक उपलब्ध है वे मानवता को त्रस्त कर चुके है।

ज्यादा सरल, शांत और सुव्यवस्थित न बनाए तो गलत है वो विवाह

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