युद्ध दिलो दिमाग में जीते जाते हैं, ज़मीन पर तो लगी रहती है हार जीत

1947 में जब देश आज़ाद हुआ तो भयंकर मार काट मची। लाखों करोड़ों लोग बेघरबार हुए, सड़कों के किनारे टेंट लगा कर जीवनयापन को मजबूर हुए।

उस माहौल में भी भारत ने ये जिम्मेवारी ली कि वो प्रथम एशियाई खेल (Asian Games) दिल्ली में आयोजित करेगा।

देश के हालात ठीक न थे, आयोजन की तैयारी न हो सकी और जो आयोजन 1950 में होना था वो किसी तरह 1951 में हो पाया।

नई दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में इन गेम्स का आयोजन हुआ जिसमें सिर्फ 8 देशों ने भाग लिया। भारत ने 15 गोल्ड, 16 सिल्वर और 20 ब्रोंज़ मैडल जीते थे। इन खेलों में पाकिस्तान ने भाग नहीं लिया था।

अगले एशियन गेम्स 1954 में हुए जिसमें भारत और पाकिस्तान दोनों ने 5 – 5 गोल्ड मैडल जीते।

1958 में तो भारत ने सिर्फ 5 गोल्ड जीते जबकि पाकिस्तान 6 ले गया। 1962 के एशियन गेम्स में भारत ने 10 गोल्ड जीते और पाकिस्तान ने आठ।

इसके बाद 1962 में पहला भारत-चीन युद्ध हुआ और चीन ने हमको बुरी तरह मारा और हमारी 33,000 वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा भूभाग पर कब्जा कर लिया।

1965 में हम फिर लड़े… पाकिस्तान से, 1971 में फिर लड़े… और इस बार पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए और एक नए देश का जन्म हुआ… बांग्लादेश।

इस दौरान 3 बार एशियन गेम्स हुए जिनमें भारत ने 1966 में 7 गोल्ड, 1970 में 6 गोल्ड और 1974 में 4 गोल्ड जीते… पर पाकिस्तान 1962 के बाद से ही परिदृश्य से गायब हो गया… आज तक गायब ही है…

अभी हाल ही में सम्पन्न हुए 2018 एशियन गेम्स में जहां भारत ने 15 गोल्ड, 24 सिल्वर और 30 ब्रोंज़ जीते, वहीं पाकिस्तान के हिस्से शून्य रहा… Big Zero.

आखिर क्या कारण था कि जो मुल्क 1962 तक हमसे कंधे से कंधा मिला के चल रहा था, अचानक पीछे छूट गया… आखिर क्यों?

1960, 70 और 80 के दशक तक भारत में जितने मैडल पंजाबी अकेले जीत जाते थे उतने पूरे देश के खिलाड़ी मिल के नहीं जीत पाते थे… मने अगर देश में विभिन्न National Championships में अगर 100 मैडल थे तो 50 पंजाब के खिलाड़ी ले जाते थे और बाकी 50 शेष भारत में बंटते थे।

आज 2018 में ये दशा हो गयी है कि पंजाब से sports पूरी तरह खत्म हो चुकी है… हाल ही में सम्पन्न हुए एशियन गेम्स का आंकड़ा अगर आप उठा के देखें तो एक तरफ जहां हरियाणा के खिलाड़ियों ने टोकरा भर के मैडल जीते वहीं पंजाब के हिस्से गिने चुने 1 – 2 मैडल आये।

आखिर क्यों? वो पंजाब जो कल तक देश में Sports का Power House था, आज वहां अंधेरा क्यों है? पंजाब के स्टेडियम सुनसान पड़े हैं? आखिर क्यों?

1962 के बाद पाकिस्तान एक हारी हुई कौम बन गयी थी… उसका आत्मविश्वास चला गया था… उसने एक के बाद एक युद्ध लड़े और उनमें हारे, उनके देश में गृह युद्ध हुआ जिससे देश टूट गया… और 1962 के बाद से ही पाकिस्तान एक हारा हुआ मुल्क बन गया… मानसिक रूप से टूटा हुआ, हारा हुआ, हताश मुल्क…

आज के पंजाब की भी यही दशा है… वो पंजाब जो आज भी भारत का सबसे सम्पन्न राज्य है, यहां के शहर तो छोड़िए, गांवों की संपन्नता देख के आपकी आंखें चुंधियां जाएंगी… पंजाब के हर गांव में आपको एक-दो नही बल्कि सैकड़ों ऐसे घर मिलेंगे जैसे दिल्ली में नहीं, महलों जैसे घर… इसके बावजूद आज पंजाब और पंजाबी एक हारी हुई कौम है… दिलो दिमाग से हारी हुई कौम…

आज आप देश के किसी भी पंजाबी से बात कर लीजिये… उसका बस एक ही सपना है… उसके जीवन का बस एक ही उद्देश्य है… उसे बाहर जाना है… मने भारत में नहीं रहना… उसे अमरीका, कनाडा, इंग्लैंड या यूरोप के किसी भी देश में भेज दो, पर बाहर भेज दो… उसे यहां भारत में पंजाब में नहीं रहना…

क्यों भाई? यहां क्यों नहीं रहना?

अजी ये भी कोई मुल्क है? ये भी कोई रहने लायक जगह है? नर्क है ये…

फिर स्वर्ग कहां है?

स्वर्ग अमरीका, कनाडा और यूरोप में है…

मज़े की बात कि ये बात यहां का गरीब पंजाबी नहीं बल्कि अमीर करोड़ोंपति अरबपति पंजाबी कहता है।

करोड़पतियों के बेटे बहू भी पंजाब छोड़ अमरीका, कनाडा जा रहे हैं और वहां शरणार्थी बन के Ghettos में रह रहे हैं, शरणार्थी बन के, गोरे इनके साथ सी ग्रेड नागरिक सा व्यवहार करते हैं… इनके साथ वहां ठीक वही व्यवहार होता है जो यहां बिहारी मजदूरों के साथ होता है मुम्बई, गुजरात, लुधियाना में…

ये एक पराजित, हारी हुई, मानसिक रूप से गुलाम कौम के लक्षण हैं। आर्थिक रूप से बेहद सम्पन्न होते हुए भी मानसिक रूप से गरीब, दरिद्र, पराजित कौम… वो जिसके पास सब कुछ है, इसके बाद भी वो हताश निराश यहां हाथ पर हाथ धरे बैठी है… ये सोचती कि वो बेहद गरीब है और कोई किसी तरह उसे यूरोप के स्वर्ग तक पहुंचा दे…

आज पंजाब में कहीं कुछ नहीं हो रहा… न कोई नया व्यापार, न उद्योग धंधे, न कोई Startup, न कोई Make In India… न कोई Games n Sports…

आज का पंजाबी, रेलवे के वेटिंग रूम में बैठे उस मुसाफिर की तरह है जो जानता है कि उसे यहां नहीं रहना है… उसे तो बस घंटे-दो घंटे में चले जाना है… ऐसा आदमी तो अपने जूते तक नहीं उतारता…

आज हर पंजाबी ये जानता है कि उसे यहां नहीं रहना, उसे आज नहीं तो कल चले जाना है… इसलिए वो कोई स्थायी काम धंधा, नौकरी या व्यापार बिज़नस, उद्योग नहीं लगाता… वो सिर्फ टाइम पास कर रहा है…

आज पंजाब में सिर्फ एक धंधा सफल है… IELTS (International English Language Testing System) सेंटर… ये अंग्रेजी भाषा की बेसिक योग्यता का एक टेस्ट है जो विदेशी सरकारें ये जानने के लिए करती हैं कि जो भारतीय मज़दूर हमारे यहां आना चाहता है उसे बेसिक अंग्रेजी आती है या नहीं… यहां आ के पानी तो न मांगता प्यासा मर जाएगा जबकि Water उसके चारों ओर होगा…

आज हर पंजाबी युवा IELTS सेंटर की ओर भागा जा रहा है… क्योंकि उसे किसी तरह विदेश जाना है। अवैध तरीकों से आज अमरीका या कनाडा पहुंचने का खर्च लगभग 35 लाख रुपये है। इसके बावजूद हर साल हज़ारों पंजाबी ये 35 लाख रु खर्च कर मेक्सिको और पनामा के जंगलों से पैदल चलते अमरीका में घुसने की कोशिश करते हैं और उनमें से 90% पकड़ के वापस भारत डिपोर्ट कर दिए जाते हैं, जंगलों में मर जाते हैं या वहां जेलों में सड़ते रहते हैं।

इसके बावजूद जाते हैं।

उसी 35 लाख से यहां अपने देश में कोई काम धंधा, बिज़नस नहीं करते।

यही है एक हारी हुई गुलाम कौम की निशानी… जो आर्थिक रूप से बेहद सम्पन्न होने के बावजूद मानसिक, मनोवैज्ञानिक रूप से दरिद्र होती है…

इसीलिए मैं हमेशा कहता हूँ… Poverty is a state of mind. It has got nothing to do with your pocket or your bank balance.

उसी तरह सफलता, कामयाबी, Success भी एक मानसिक अवस्था है… Success is also a state of mind… आज आप कहां हैं, कैसे हैं, किस दशा में हैं, आज आपने फटे कपड़े पहने हैं, आपके पांव में जूते नहीं हैं, आपने कुछ खाया नहीं है… इससे कोई फर्क नही पड़ता… मानसिक रूप से आप एक विजेता हैं या पराजित… आप योद्धा हैं या हथियार जमीन पर रख के आत्मसमर्पण किए हुए युद्धबंदी… फर्क इससे पड़ता है…

युद्ध दिलो दिमाग में जीते जाते हैं, ज़मीन पर नहीं, ज़मीन पर तो हार जीत लगी रहती है… Be A Winner…

सफलता का एक सूत्र : खुद सीखो… खुद करो

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