सबरीमला-आंदोलन : सनातन के स्वत्व का उद्घोष

कुछ मित्रों ने पूछा, आप भाल सबरीमला-आंदोलन को कैसे समर्थन करते हैं? आप तो नारी-विरोधी नहीं हैं, आप तो कानून का राज सर्वोच्च मानते हैं, फिर आप कैसे? यह आंदोलन क्या मस्जिद में महिलाओं को रोकने से मना करने जैसा नहीं है?

ये प्रश्न पूछने वाले दो तरह के हैं। एक तो भोले-भाले हिंदू, दूसरे चालाक और बेहद शातिर वामपंथी। यह आंदोलन तो दरअसल, सनातन के अब्राहमीकरण के खिलाफ है, भाई.. यह आंदोलन एक निश्चित विधान से सबको हांकने के विरोध में है, सांस्कृतिक उपनिवेशवाद के खिलाफ है।

सनातन का मूल क्या है, ‘एकं सत्, विप्रा बहुधा वदन्ति’.. तो, जब सत्य सैकड़ों तरीके से बोला जा सकता है, तो सत्य को चाहने के, पूजने के तो 1000 तरीके हो सकते हैं न। सबरीमला-आंदोलन सांस्कृतिक-उपनिवेशवाद के खिलाफ सनातन का स्वत्व-उद्घोष है, जो ईसाई और मुसलमान परंपरा से पालित वामपंथियों को समझ नहीं आ रहा है….

यह सती की तरह कोई सामाजिक कुप्रथा नहीं है, यह पूजन का एक तरीका है, क्योंकि अयप्पा की तरह ही कई पूजाएं औऱ कई मंदिर उसी केरल में ऐसे भी हैं, जहां पुरुषों को प्रवेश नहीं है।

मेरे बिहार में लड़के की शादी वाली रात उसकी मां ओर सारी महिलाएं ‘डोमकछ’ करती हैं, जिसमें किसी पुरुष तो क्या, किशोर औऱ बालक तक को प्रवेश नहीं मिलता….। वह कोई धार्मिक प्रथा नहीं है, तो क्या हम उसमें पुरुषों को प्रवेश के लिए आंदोलन शुरू कर दें…. हे कृपा निधानों, पूतना और कालिका की वंशजों, सनातन को बख्श दो…..

सनातन में हम अपनी देवी मां को डेढ़ लाख नाम से पुकारते हैं, मेरे पिताजी पांच तरह से धोती पहनते हैं, साड़ी पहनने के दर्जनों तरीके हैं, मेरे घर में पांच आदमी हैं, पांच पद्धतियां हैं, पूजन की। पिताश्री ब्रह्मवादी हैं, भैया शैव, भौजी वैष्णव, मैं तो मुझे ही नहीं पता, मेरी पत्नी और माताजी 33 कोटि का पूजन करती हैं, तो क्या इन सबको एक ही लीक पर चलना चाहिए…? सबके लिए अब्राहमिक तरीके इस्तेमाल हों… सबको पांच बार माथा घिसना या नियत समय मोमबत्ती जलानी ही हो, यह तय कर दिया जाए?

हे नारीवादियों, हे ईसाइयों! ये जो अयप्पा स्वामी को लेकर तुमने वितंडा किया है, उसकी कथा पता है तुम्हें। मंदिर की ऊंचाई कितनी है? एक खास समय ही वहां जाना संभव है, इसका पता है…. वहां जाने के लिए बाकायदा ऑक्सीजन तक देती है, सरकारें। 41 दिनों का खास व्रत होता है, जो सभी व्रती करते हैं… .(मार्ग दुर्गम है, कंटकाकीर्ण है, 41 दिनों का है, इसलिए शायद महिलाओं की मनाही हो)। अयप्पा के अलावा दुनिया में लाखों मंदिर हैं, तुम्हें यहीं जाने की चूल क्यों…. क्योंकि तुमको सनातन के प्रतीकों को हिलाना जो है….।

अयप्पा स्वामी का मंदिर फुटबॉल का मैदान नहीं है, न ही पिकनिक स्पॉट, न ही नारीवादी आंदोलन का मकबरा। वह मंदिर है और मंदिर के विधान होते हैं, नियम होते हैं। वैसे, तो वह पारसी राहुल भी मंदिर-मंदिर जाने का नाटक कर रहा है, परंतु कितने नियमों का पालन हो रहा है, यह देखने की बात है।

आप मंदिर जाना चाहते हैं, तो पहले श्रद्धान्वित तो होइए। वह आस्था का द्वार है, आपके तर्कों का रणस्थल नहीं। आप शीश झुकाना जानिए, प्रभु आशीर्वाद से शीश को झुका देंगे ही….। खड्गह्स्त होकर मंदिर में नहीं जाते, रिक्तहस्त होकर जाते हैं…..

बाक़ी, जाकी रही भावना जैसी…..
जय स्वामी अयप्पा की……।

सबरीमला मंदिर : अब तो हाकिम साब ही हमारे भगवान हैं!

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