समझ में नहीं आती इन मुद्दों पर विपक्ष और भारतीय मीडिया की चुप्पी

भारत के समाचार पत्रों और टेलीविज़न न्यूज़ की गुणवत्ता हमेशा से संदेह के घेरे में रही है।

कहने को तो भारतीय संपादक और पत्रकार अपने आप को बहुत बड़े तोप का गोला मानते हैं, लेकिन आईडियोलॉजी के चक्कर में महत्वपूर्ण घटनाओं को जानबूझकर अनदेखा कर देते हैं।

कुछ समय से विश्व में दो घटनाओं को लेकर काफी चर्चा है जो भारतीय समाचार माध्यमों से गायब है।

पहली घटना यह है कि 2 अक्टूबर को तुर्की में स्थित सऊदी काउंसलेट (एम्बेसी) में सऊदी अरेबिया के नागरिक जमाल खशोगी किसी डॉक्यूमेंट को बनवाने के लिए आए थे और उसके बाद वे फिर कभी नहीं दिखे।

तुर्की के अधिकारियों ने यह आरोप लगाया है कि काउंसलेट में प्रवेश करने के 2 घंटे के भीतर उनकी हत्या कर दी गई। और हत्या भी ऐसी वैसी नहीं बल्कि उनके शरीर को आरी से काटा गया और तंदूर में उसको जला दिया गया। इस कार्य को अंजाम देने के लिए 15 लोग सऊदी अरेबिया से एक निजी विमान में उसी दिन इस्तांबुल आए थे और कार्य को अंजाम देने के बाद वापस चले गए।

तुर्की के अखबारों ने उन 15 लोगों के नाम और फोटो छापे हैं। उनमें से एक फोरेंसिक ऑटोप्सी का प्रमुख था. फॉरेंसिक ऑटोप्सी से जुड़े लोग ही मृत शरीर की काट छांट करते हैं। यह सारे के सारे समाचार तुर्की और विश्व के प्रमुख समाचार पत्रों में वहां की सरकार और ख़ुफ़िया सेवा के हवाले से छपे है।

खशोगी का अपराध यह था कि वे सऊदी शासकों के खिलाफ अमेरिका के समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट में लिखा करते थे। विश्व के प्रमुख समाचार पत्रों में अक्टूबर में यही खबर लगातार मुख पृष्ठ पर चल रही है।

ऐसा कहा जाता है कि खशोगी एप्पल की घड़ी पहने हुए थे जो काउंसलेट के बाहर प्रतीक्षा कर रही उनकी गर्लफ्रेंड के पास रखे सेल फोन से कनेक्ट थी और उनको मारने के समय की सारी आवाज उस फोन में रिकॉर्ड हो गई है।

इस घटना के कारण यूरोप और अमेरिका के कई समाचार पत्रों, नेताओ और बैंकों ने सऊदी अरेबिया में इस हफ्ते होने वाले एक समारोह का बहिष्कार कर दिया है।

ऐसा कहा जा रहा है कि सऊदी सरकार इसको एक दुर्घटना बता कर कुछ लोगों को दंडित कर दे, यद्यपि सऊदी सरकार ने इस घटना से इनकार किया है।

दूसरा समाचार पड़ोस के लाल देश में मुस्लिम समुदाय के साथ किए जा रहे व्यवहार को लेकर है।

संयुक्त राष्ट्र ने एक रिपोर्ट में कहा कि लगभग दस लाख मुसलमानों को वहां की सरकार ने एक कैंप में रखा है और उनको प्रताड़ित किया जा रहा है। साथ ही उनको उस देश के ‘मूल्य’ सिखाए जा रहे हैं; पोर्क या सूअर का मांस जबरदस्ती खिलाया जा रहा है।

इसके अलावा इस समुदाय के लोग उस देश में ना तो रोजे रख सकते हैं, ना ही सड़क पर नमाज पढ़ सकते हैं, ना ही दाढ़ी बढ़ा सकते हैं, और ना ही बुर्का पहन सकते हैं।

इसी रविवार को न्यू यॉर्क टाइम्स ने मुख पृष्ठ पर एक समाचार छापा था जिसकी हैडलाइन थी कि उस देश के राष्ट्रपति ने अपने राष्ट्र में इस्लाम का नामोनिशान मिटा देने का अभियान शुरू कर दिया है। (President “Began Drive To All but Erase Islam” in XYZ Country).

पता नहीं भारत के पड़ोस में स्थित आतंकी देश – जिसके उस देश के साथ हिमालय से ऊंचे, समुद्र से गहरे और शहद से मीठे रिश्ते हैं – क्यों चुप बैठा है? या फिर भारत के समाचार माध्यम, कम्युनिस्ट और क्लाउन प्रिंस क्यों चुप बैठे हैं?

मेरा मानना है कि विपक्ष को इन मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए और भारत सरकार को चुप्पी के लिए घेरना चाहिए। सरकार की निंदा करने और लगे हाथ वोट बटोरने के ऐसे अवसर बार-बार नहीं मिलेंगे।

सोचिये अगर ऐसा कुछ भारत में होता तो?

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