अप्रिय शशि थरूर, मदद के लिए शुक्रिया

चुनावों के समय कुछ कॉन्ग्रेसी नेताओं के बयानों का पैटर्न देखेंगे तो लगता है कि ये लोग अमित शाह को यह बोलकर आए हैं, “अरे ब्रो, उस गधे को हम ही प्रधानमंत्री बनने नहीं देंगे, आप तो बाकी बातें संभालिए।”

इसी क्रम में ऐन मौक़े पर शशि थरूर ने अच्छे आतंकी और बुरे आतंकी की तर्ज पर ‘अच्छे हिन्दू’ की परिकल्पना कर दी है। हालाँकि, थरूर को मैंने हमेशा इतिहास के करीब देखा है जब वो देश-दुनिया की बात बाहर करते हैं तो आँकड़ों की आक्रामकता के साथ वार करते हैं।

लेकिन उन्हीं महानुभाव के बयान जब देश के परिदृश्य में होते हैं तो लगता है कि ये आदमी तो विदेशों में किताब बेचने के लिए इतना ज़्यादा बोल जाता है। क्योंकि, भारतीय इतिहास को लेकर उनकी जानकारी या तो बहुत कम है, या पार्टी पॉलिटिक्स के कारण बहकी-बहकी बातें करने लगते हैं।

जैसे कि अभी का बयान आया है कि कोई भी अच्छा हिन्दू किसी दूसरे के पूजाघर को तोड़कर अपना मंदिर नहीं बनाएगा। यह बात शशि जी ने नहीं बताई कि जिन मुसलमानों ने इस देश के चार हज़ार मंदिर तोड़े थे वो ‘अच्छे’ थे या नहीं?

थरूर ने यह बात नहीं बताई हिन्दुओं के किस दर्शन शाखा में अच्छे और बुरे हिन्दू की परिभाषा तय की गई है। कहीं वो इलेक्शन पॉलिटिक्स ऑफ़ कॉन्ग्रेस स्कूल ऑफ़ फिलॉसफी से तो नहीं आते?

क्या हर हिन्दू ये भूल जाए कि उसके सारे मंदिर तबाह कर दिए गए? हमने बदला तो नहीं लिया, लेकिन अब हम भूल भी जाएँ कि जिस ख़िलजी ने नालंदा में आग लगा दी थी उसी के नाम का शहर वहीं पास में बना दिया गया? क्या हिन्दू ये भूल जाए कि उसकी प्राण-प्रतिष्ठित मूर्तियों को मस्जिदों की सीढ़ियों में दफ़्न कर दिया गया है?

क्या हम भूल जाएँ कि काशी विश्वनाथ मंदिर के कुएँ में फेंक दिए गए थे और पास में मस्जिद बना दी गई? ये किस तहज़ीब का हिस्सा था? मैं बताता हूँ : ये एक चोरों के नस्ल की तहज़ीब है जिसमें लूट हत्या और बलात्कार जेनेटिक स्तर पर गुँथा हुआ है।

मतलब, बदले की भावना से हिंसा न करने वाले हिन्दू समाज को ये किस तरह की नैतिकता और सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया जा रहा है कि हम एक राजनीतिक परिभाषा के नाम पर अपने इतिहास के बलात्कार, लूट, नरसंहारों और उजाड़ों को भूल जाएँ?

नहीं, किसी भी हिन्दू को कुछ भी नहीं भूलना चाहिए। हम हर मस्जिद तो नहीं तोड़ेंगे, क्योंकि हमारी रगों में किसी आतंकी, बलात्कारी, हत्यारे या लुटेरे का ख़ून नहीं बहता। हमने वह काम कभी नहीं किया है। लेकिन हाँ, जो हमारा है, वो चार सौ साल बाद भी कोई, आज के परिदृश्य में हमसे अलग करना चाहेगा तो वो भूल कर रहा है।

अयोध्या आधुनिक और मध्ययुगीन भारत के इतिहास से परे है जब चार सौ बलात्कारियों की फ़ौज आकर उससे छेड़-छाड़ करती है। इसलिए, इसे उस चश्मे से देखना तो बंद होना ही चाहिए। अयोध्या ही नहीं, पूरा भारत सनातनी था और उस सच को चार हज़ार मंदिर गिराने के बाद, हज़ारों धर्म परिवर्तन के बाद भी मिटाया नहीं जा सकता।

ये हमारी सहिष्णुता है कि हमने पारसियों से लेकर ईसाईयों और मुसलमानों को यहाँ रहने दिया क्योंकि हमें किसी के धर्म से समस्या नहीं है। समस्या तब है कि तुम अपनी नाक हर जगह मत घुसाओ। प्रयागराज फिर से प्रयागराज कहलाएगा क्योंकि वो इलाहाबाद कभी नहीं था। उसी तर्ज पर जितने भी बड़े और धार्मिक जगहों के नाम राजनीतिक कारणों से, और द्वेषपूर्ण नीतियों से बदले गए, वो सब बदले जाने चाहिए।

इससे क्या होगा? इससे ‘कुछ नहीं’ होगा। और वो ‘कुछ नहीं’ वही अनुभव है जो प्रयागराज के इलाहाबाद होने पर हुआ था। जब ‘कुछ नहीं’ ही होता है, तो सदियों पुराने नाम को वापस बदलने में क्या समस्या है? अगर इलाहाबाद का नाम बदलने से अचानक से मुसलमानों की बस्तियों में आग लगने लगती, लोग किसी शैतानी समस्या के कारण मरने लगते, कुछ नुकसान हो रहा होता, तो मैं इसके पक्ष में नहीं रहता।

लेकिन जब नाम बदलने से ‘कुछ नहीं’ ही हो रहा है, तो क्या फ़र्क़ पड़ता है! वैसे कोई सर्वे करा लीजिए इलाहाबाद के लोगों के बीच, परिणाम देखकर समझ में आ जाएगा कि ‘कुछ नहीं’ से भी बहुत बड़ी जनसंख्या बहुत खुश है।

नाम तो सारे बदले जाने चाहिए। बख्तियारपुर भी, औरंगज़ेब रोड भी, बाबरी मस्जिद भी और तमाम वो जगहें वो आतंकी मुसलमानों के नाम पर है जो कभी अपने आतंकी शासन से इस धरती को दहला रहे थे। सारे मुसलमान आतंकी नहीं हैं, लेकिन जिन्होंने यहाँ बिना बुलाए आकर लूटा, बलात्कार किया, नरसंहार किए, बस्तियाँ जलाईं, उनके वंश के नाम पर मुझे सड़कें और शहर नहीं चाहिए।

और इसके लिए किसी भी हिन्दू को बुरा हिन्दू कहलाने में कोई समस्या नहीं होगी। मैं चाहता हूँ कि हर वो मस्जिद गिराई जाए जो किसी मंदिर को गिराकर बनी थी। मैं चाहता हूँ कि हर वो मस्जिद मुसलमान खुद गिरा दें जो किसी मंदिर का अपमान करने के बाद बनी ताकि पूरे देश को यह संदेश जाए कि यहाँ का मुसलमान भाईचारा, सद्भावना और शांति के लिए हर प्रयास करने को तैयार है।

मुझे गंगा-जमुना तहज़ीब में यमुना हमेशा ले मृतप्राय ही मिली है। उसे ज़िंदा करने का ज़िम्मा भी उन्हीं लोगों का है जो सच में मानते हैं कि ऐसी कोई तहज़ीब अस्तित्व में है।

ख़ैर, लगातार नकारे जाने के बाद, एक तरफ राहुल गाँधी कहीं रामभक्त तो कहीं शिवभक्त बने फिर रहे हैं, और दूसरी तरफ़ ये कॉन्ग्रेसी सुसाइड बॉम्बर्स उनकी जनेऊ काटने पर तुले हुए हैं। और ये एक तरह से सही हो रहा है। हमें ऐसे लोग कॉन्ग्रेस से ही चाहिए जो राहुल गाँधी की कैलाश यात्रा को कसौल यात्रा बनाते रहें। हमारे लिए दिग्विजय, कमलनाथ, मणिशंकर, थरूर आदि बहुत ज़रूरी हैं। ये लोग भारत के बेहतर भविष्य के लिए ठीक-ठाक योगदान दे रहे हैं।

न रहेगा हिन्दू, न जलेगी लाश

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