गोपाल राम के नामों पर कब मैंने अत्याचार किया, दुनिया को हिन्दू करने कब मैंने नरसंहार किया!

इस साल होली के अगले दिन मथुरा वृंदावन जाना हुआ। कुछ बहुत ही करीबी संबंध में शोक होने के वजह से होली खेलने जैसा तो कुछ नहीं पर दर्शन की अभिलाषा से सपरिवार वहाँ जाना हुआ।

सुबह सुबह वृन्दावन और गोकुल के दर्शन करने के बाद शाम को मथुरा जाना हुआ।

मथुरा में श्री कृष्ण जन्मस्थान मंदिर। जबरदस्त सिक्योरिटी वाला मंदिर, जिसमें 2 बार चेकिंग होती हैं और फ़ोन, पर्स सब रखवा दिया जाता हैं। अंदर भी आपको पुलिस और पैरामिलिट्री फ़ोर्स मिल जाएगी।

अंदर एक विशाल और भव्य केशवदेव मंदिर है जिसमें प्रतिमाओं की सुंदरता अद्भुत, अवर्णनीय है। हमने सोचा इतना ही है क्या मुख्य मंदिर। फिर पता चला कि नीचे कारागार है जहां कृष्ण का जन्म माना गया है। तो फिर वहां दर्शन किये।

एक क़ाबिल-ए-गौर बात जो आपको वहां जाने पर ही अच्छे से पता चले, वो है कारागार की दीवार से एकदम सटा के खड़ी एक भव्य मस्जिद। जी हां, मंदिर से एकदम जुड़ी मस्जिद है जो औरंगजेब ने पूरे मंदिर को तोड़ कर बनाई थी। मस्जिद की विशालता, केशवदेव मंदिर में सीढियां चढ़ कर साइड के बरामदे से आपको बराबर दिखेगी। वहां अभी वैसे सिर्फ ईद पर ही नमाज़ होती है, रोज़ नहीं।

ऐसा नहीं है कि ये तोड़फोड़ 17वीं शताब्दी में औरंगजेब ने ही की हो। इससे पहले भी एक भव्य मंदिर था जो 11वीं शताब्दी में महमूद ग़जनी ने पूरा लूट कर तोड़ फोड़ कर अंत में जला डाला था।

‘Heroes of Islam Series’ नामक किताबों की श्रृंखला में ‘Mehmood of Ghazni’ में फ़ज़्ल अहमद ने बकौल ग़ज़नी लिखा है, ‘शहर के मध्य में एक भव्य और विशाल मंदिर था, जिसके बारे में नगरवासियों का मानना था कि ये तो साक्षात देवताओं ने बनाया हो । अगर आज ऐसा कोई मंदिर वापस बनाना चाहे, तो शायद करोड़ों दीनारों में ना बन सके। अगर सबसे कुशल और हुनरमंद कारीगर भी बनाने लगे तो भी ऐसा बनने में दो सौ साल से ज्यादा लगेंगे।’

ऐसा लिखने वाले ग़जनी ने वो मंदिर तुड़वा कर सब कुछ जलवा दिया, और मंदिर से लूटे सोने, चांदी और रत्नों को सैकड़ों ऊँटों पर लादकर वापस ले गया। इस भयानक त्रासदी के बाद भी स्थानीय हिन्दू राजाओं ने फिर से मंदिर बनवाया।

औरंगज़ेब के तोड़ने और वहां ईदगाह बनवाने से पहले सिकंदर लोदी ने भी एक बार फिर पूरे मंदिर को तुड़वाया। केशवदेव मंदिर का नया मंदिर बनने से पहले हुई खुदाई में हज़ारों वर्षों पुराने संस्कृत में लिखे शिलालेख मिले हैं।

केशवदेव मंदिर में राधाकृष्ण की वो सुंदर मूरत देखने के बाद हृदय को जो शांति मिलती है, वो मंदिर प्रांगण में बाहर आते ही उस ईदगाह की ऊंची गुम्बद को देखते ही गायब सी हो जाती है। खून खौलने लगता है, और इतिहास की कुछ भी समझ हो तो 1200 साल का खूनी इतिहास, आपके मंदिरों को लूटा जाना, जल दिया जाना और हमारी औरतों को अफ़ग़ानिस्तान के बाजारों में कुछ दीनारों में नंगी बिकना, बस ये ही सब याद आता है।

और ये सिर्फ मथुरा की ही बात नहीं, अयोध्या में राम जन्मभूमि और वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर की भूमि पर बनी बाबरी मस्जिद और ज्ञानवापी मस्जिद में भी कुछ ऐसा ही है। कुल 40,000 से ज्यादा मंदिर माने गए हैं पूरे भारत में जहां मंदिरों को तोड़कर दूसरे ‘धर्मस्थल’ बनाये गए हैं।

आये दिन लोगों से ज्ञान मिलता रहता है कि मंदिर मस्जिद के बजाय वहां अस्पताल बनना चाहिए। कुछ अति सेक्युलर हिन्दू तो वहां शौचालय तक बनाने की सलाह देते हैं। मेरे पुराने ऑफिस में एक सह-कर्मचारी की भी सलाह थी कि वहां अस्पताल बने।

मैंने उनसे सिर्फ इतना ही पूछा कि आपके घर पर कल JCB चलाकर पूरा तोड़ और वहां अपनी गाड़ियां पार्क कर दूं या खुद ही रहने लगे जाऊं, क्या तब भी आपकी यही अस्पताल, क्लिनिक, शौचालय वाली सलाह होगी। कहने की ज़रूरत नहीं कि वो पूरी बात से कन्नी काट गए।

जब 9वीं क्लास में था, तो पाथेय कण में अटलजी की ‘हिन्दू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय’ पढ़ी थी, यकीन मानिए पहली बार पता चला कि अटलजी इतने ओजस्वी कवि हैं। दिनकर के बाद पहली कोई कविता थी जिसके कारण आपके रूहें खड़े हो जाये।

‘गोपाल राम के नामों पर कब मैंने अत्याचार किया,
दुनिया को हिन्दू करने कब मैंने नरसंहार किया,
कोई बतला दे, काबुल में जाकर कितनी मस्ज़िद तोड़ी,
भूभाग नहीं, शत शत मानव का हृदय जीतने का निश्चय,
हिन्दू तन मन, हिन्दू जीवन, रग रग हिन्दू मेरा परिचय’

और अगर आप सोचें भी तो क्या अपने हज़ारों सालों के इतिहास में किसी भी हिंदू ने दूसरे किसी धर्म के व्यक्ति को सनातन धर्म में लाने के लिए मारकाट की होगी, नरसंहार किये होंगे, औरतों का बलात्कार किया होगा, उन्हें बाज़ारों में नीलाम किया होगा, या नगर के नगर, धर्मस्थल, पूजास्थल जमींदोज कर दिए होंगे…?

‘Why I am a Hindu’ नामक किताब के लेखक शशि थरूर सबको ये ज्ञान दे रहे है कि कोई भी अच्छा हिंदू नहीं चाहेगा कि किसी और के धर्मस्थल को तोड़कर वहां राममंदिर बने।

बड़े कमाल की बात हैं! जहां सदियों पुराना राम जन्मभूमि का मंदिर था, पुरातात्त्विक खुदाई में भी जिसकी पुष्टि हो चुकी है, करोड़ों हिन्दूओं की आस्था से जिसका सदियों से संबंध रहा है, और जिसे तोड़कर एक आतताई ने हिंदुओं को नीचा दिखाने के लिए, ‘देखो, तुम्हारे भगवान की सबसे पावन भूमि को गिराकर मैं यहां मस्जिद बना रहा हूँ’, ऐसा आह्वान किया हो, उसकी जगह अगर हम मंदिर की कामना करते हैं तो हम बुरे हिन्दू हो गए…?

अति ‘सेक्युलर’ हिंदुओं से एक ज्ञान ये भी मिल रहा है कि 21वीं सदी में आकर भी हम मंदिर मंदिर चिल्ला रहे है। 21वीं सदी का मंदिर की मांग का क्या संबंध है, समझ से परे हैं। एक स्थल जिससे आपकी आस्था, आपकी भावनाएं जुड़ी हैं, जिसपर कोई उद्दंडतापूर्वक अतिक्रमण कर बैठा हो, उस पर अपना अधिकार सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाए क्योंकि आप 21वीं सदी में आ गए हैं?

घर वाले उदाहरण को ही दोहराऊं तो घर की ज़मीन सिर्फ इसलिए छोड़ दी जाए क्योंकि कब्ज़ा करने वाले ने बहुत सालों से दबा रखा है, और अब एहसास हुआ कि 21वीं सदी आ गयी है…? 22वीं सदी आएंगी, तब क्या करेंगे…? अपना सब कुछ छोड़ किसी और को दे देंगे जिससे उनकी भावनाएं आहत ना हो…?

बहुत गर्दन झुका ली, अब नतमस्तक होने का समय खत्म हो गया है। हिन्दू किसी और देश में जाकर किसी धर्म को या किसी सभ्यता को नुकसान नहीं पहुंचा रहे। हमने ना कल काबुल में मस्जिद तोड़ी थी, ना आज तोड़ रहे हैं। पर जो अपना है, वो अपना है। उसे लेने में अगर हम ‘अच्छे हिन्दू’ ना भी कहलाये तो बुरा कहलाने में हमें कोई गुरेज़ नहीं।

ऐसे ही रौंदे जाएंगे, अपने अस्तित्व और आस्था की रक्षा के लिए उठ खड़े नहीं होने वाले

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