इलाहाबाद का प्रयागराज हो जाना : को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ…

‘प्रयागराज’ का नाम बदला नहीं गया है. कुछ सौ वर्षों से लोगों में जो भ्रम था बस वही दूर किया गया है. पुराणों में प्रयाग नगरी के नामकरण और माहात्म्य के वर्णन तो हैं ही, तीर्थराज प्रयाग की महिमा गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में भी बताई है.

जब भगवान् राम सीताजी और लक्ष्मण जी सहित वनवास के लिए निकले तो सुमंत्र को विदा करने के पश्चात् उन्होंने नाव से गंगा पार की, केवट को भक्ति का वरदान दिया, गंगा जी से आशीर्वाद लिया और प्रयाग पहुँचे.

गोस्वामी जी कहते हैं: “तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू, लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू, प्रात प्रातकृत करि रघुराई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई” अर्थात्- उस दिन वृक्ष के नीचे विश्राम हुआ जिसकी पूरी व्यवस्था लक्ष्मण जी और सखा गुह ने कर दी.

प्रातःकाल नित्यक्रिया से निवृत्त होने के पश्चात् प्रभु ने ‘तीर्थराज’ के दर्शन किये. सम्भवतः अभी वे नगर के भीतर नहीं गये हैं, बाहर से ही वर्णन किया जा रहा है. प्रयाग का वर्णन करते हुए गोस्वामी जी लिखते हैं: “सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी, माधव सरिस मीतु हितकारी।“

अर्थात्- यह जो तीर्थों का राजा है इसके सचिव (मंत्री आदि) सत्य हैं. यहाँ नगर को ही राजा मान लिया गया है जिसके मंत्रीगण सत्यनिष्ठा से सुशोभित हैं. ऐसी उपमा देकर गोस्वामी जी यह बता रहे हैं कि मृत्यु और मोक्ष ही परम सत्य नहीं है (जो काशी में आकर सिद्ध होता है), अपितु तीर्थों के दर्शन से पापों का निवारण होता है यह भी अटल सत्य है. इसीलिए तो ‘तीर्थों के राजा’ के मंत्री ‘सत्य’ हैं.

यहाँ गोस्वामी जी कर्म करने की प्रेरणा देते हैं. व्यक्ति पापों का नाश तभी करना चाहेगा जब उसे पुनर्जन्म लेगा होगा अथवा इसी जन्म में सत्कर्म करने होंगे. इस प्रकार तीर्थराज प्रयाग कर्मों का वह मार्ग प्रशस्त करते हैं जिसका अनुगमन कर व्यक्ति काशी पहुँचता है और यहाँ देहत्याग कर मोक्ष की प्राप्ति करता है.

आज भी देखिये तो प्रयाग और काशी को जोड़ने वाला राजमार्ग एकदम सीधा है. यही नहीं गोस्वामी जी के अनुसार तीर्थराज की अर्धांगिनी ‘श्रद्धा’ हैं क्योंकि श्रद्धा के बिना किसी भी तीर्थ के दर्शन का फल नहीं मिलता. तीर्थ तो छोड़िये दैनिक पूजा भी यदि आप बिना श्रद्धा के करते हैं तो वह व्यर्थ ही है.

आजकल लोग श्रद्धाविहीन होकर तीर्थस्थलों पर पिकनिक मनाने, एडवेंचर करने चले जाते हैं फिर जब प्राकृतिक आपदा के शिकार होते हैं तब भगवान् से रोष प्रकट करते हैं. यह बड़ी विचित्र बात है. जब यात्रा प्रारंभ करने से पूर्व मन में श्रद्धा नहीं थी तो गिरने पड़ने पर रोष कैसा?

इसीलिए गोस्वामी जी ने सैकड़ों वर्ष पूर्व ही बता दिया था कि तीर्थ यात्रा पर जाओ तो मन में श्रद्धा अवश्य होनी चाहिए. इसके आगे गोस्वामी जी कहते हैं कि तीर्थराज प्रयाग का हित चाहने वाले मित्र साक्षात् श्रीवेणीमाधव जी (श्रीकृष्ण जी) हैं. यहाँ भी श्रद्धा का भाव परिलक्षित होता है.

गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है- “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः.” अर्थात् जो कोई भी मुझे श्रद्धापूर्वक (यहाँ भक्ति का अर्थ श्रद्धा है) फल, फूल, पत्र आदि अर्पित करता है, मैं उसे (प्रीतिसहित) प्रेमपूर्वक ग्रहण करता हूँ. सृष्टि के कण-कण में विराजे ऐसे श्रीकृष्ण तीर्थराज प्रयाग के मित्र हैं.

यह तो बात हुई कि राजा के मंत्री, रानी और मित्र सलाहकार आदि कैसे हैं. आगे गोस्वामी जी तीर्थराज की संपन्नता के बारे में बताते हैं: “चारि पदारथ भरा भँडारू। पुन्य प्रदेस देस अति चारू।।“ अर्थात्- यह ऐसा पुण्य प्रदेश है जो चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) से परिपूर्ण है. यहाँ पदारथ का अर्थ पुरुषार्थ है. ये चारों पुरुषार्थ मनुष्य के जीवन का लक्ष्य निर्धारित करते हैं.

धर्म का अनुसरण हमें किसी भी काल परिस्थिति में कर्तव्यनिष्ठ बनाता है. आर्थिक संपन्नता हमें दैहिक सौष्ठव, पारिवारिक स्थिरता तथा सामाजिक स्वीकार्यता प्रदान करती है. काम हमें जीवन में आगे बढ़ने को प्रेरित करता है. इन तीनों की सिद्धि के पश्चात् मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं.

तीर्थराज प्रयाग ऐसे राजा हैं जिनके दर्शन से इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है. सूक्ष्म दृष्टि डाली जाये तो देश की उन्नति में भी ये चारों पुरुषार्थ सहायक हैं क्योंकि व्यक्ति का मन यदि इन पुरुषार्थों को साध ले तो अच्छा नागरिक बन सकता है. मन से मानव बनता है, मानव से समाज और देश का उत्कर्ष समाज के उत्कर्ष में निहित है.

तीर्थराज की संपन्नता का बखान करने के पश्चात् गोस्वामी जी यह बताते हैं कि प्रयागराज कितना सुरक्षित था: “छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा, सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा।।“ अर्थात्- यह किले जैसा क्षेत्र अतीव दुर्गम है. यह ऐसा गढ़ (दुर्ग) है जिसे स्वप्न में भी शत्रु जीत नहीं सकते. यहाँ शत्रु का अभिप्राय पाप से है.

प्रयाग के भीतर जितने भी तीर्थ हैं वे इसके वीर सैनिक हैं जो बड़े रणधीर हैं और पाप की सेना को पराजित करने में सक्षम हैं. यह ऐसा तीर्थ है जहाँ पाप घुस ही नहीं सकता. इसका प्रमाण तो उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी जी ने ही दे दिया. चार सौ वर्षों से अधिक समय तक अकबर ने प्रयागराज की आभा पर ‘इलाही’ पर्दा डाल रखा था. आज वह भ्रम दूर हुआ और स्वयं गोरक्षपीठाधीश्वर ने आधिकारिक रूप से प्रयागराज का नामकरण कर जगत को आलोकित किया. गोस्वामी जी की उक्ति सत्य सिद्ध हुई कि प्रयागराज को कोई विधर्मी पापी दीर्घकाल तक जीत कर नहीं रख सकता.

आगे गोस्वामी जी बताते हैं कि गंगा जमुना सरस्वती का संगम ही तीर्थराज का सिंहासन है, अक्षयवट वृक्ष उनका छत्र है, गंगा जी और जमुना जी की तरंगे (लहरें) चँवर हैं जिन्हें देखकर ही दुःख दरिद्रता का नाश हो जात है: “संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।। चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा।।“

इसके आगे है: “सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम। बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम।।“ अर्थात् पुण्यात्मा साधू प्रयागराज की महिमा गाते हैं और वेद पुराण सब मिलकर उसके निर्मल गुणों का बखान करते हैं.

अंत में गोस्वामी जी कहते हैं: “को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।। अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा।।“ अर्थात्- प्रयागराज की महिमा कौन कह सकता है भला? यदि पाप रूपी मदमस्त हाथियों का समूह सब कुछ नष्ट करने पर तुला हो तो सिंह रूपी तीर्थराज प्रयाग उनका वध कर सकता है. ऐसे तीर्थराज का दर्शन कर स्वयं प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने भी सुख पाया.

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