ME TOO : ताली एक हाथ से नहीं बजती…

कई वर्ष पहले इंग्लैंड के एक कॉरपोरेट दफ्तर में भारतीय महिला को साड़ी पहनकर आने के लिए बैरंग लौटा दिया गया था। अहा..!! साड़ी तो पवित्र परिधान है!.. हमारी देवियां पहनती हैं! परंतु धक-धक करने लगा में भी साड़ी ही पहनी गई है.. पहनने का शऊर तो हो। आप चाहें तो साड़ी में अपने स्त्रीत्व को सर्वोत्कृष्ट रूप से उभार सकती हैं चाहें तो सबकुछ उघाड़ सकती हैं। तय आपको करना है कि आप कपड़े कैसे पहन रही हैं।

अब मैं दूसरे पहले की और मुड़ रहा हूं। आज मेरी दिली चाहत है कि मैं छींटदार लुंगी और जाली वाला बनियान पहन कर दफ्तर जाऊं। विशुद्ध भारतीय कपड़े हैं.. भाई! ऊपर से लुंगी में तो गंगा जमनी का धागा भी विन्यस्त है! क्या संपादक महोदय इसकी इजाज़त देंगे..?

अरे संपादक की बात कौन करे.. मुख्यद्वार पर खड़ा सुरक्षा कर्मी कनेठी देकर वापस कर देगा। लेकिन ईंश्वर की सौगंध.. मैंने ऐसे ही कपड़ों में बहुतेरी लड़कियों को मीडिया में काम करते हुए देखा है.. लुंगी को अंग्रेजी में रैपरोन कह लीजिए और गंजी को टॉप।

साड़ी पहनिये तो ऐसी कि पूरा पृष्ठ ही अनावृत हो जाय या सामने से बेहद भड़कीला नजर आए! मैं फिर कहता हूं कि कपड़ों का चुनाव निजी है। यह स्वातंत्र्य है परंतु कार्यस्थल की एक गरिमा होती है। अन्यथा एक भोगवादी देश में देहदर्शना साड़ी पहनने वाली भारतीय महिला को वापस नहीं लौटाया जाता।

एक प्रश्न और। क्या मैं अपनी शर्ट खोल कर चकले जैसा सीना दिखलाते हुए दफ्तर में काम कर सकता हूं, मेरी छाती पर दस तोले का एक स्वर्णाभूषण भी हिलता रहे तो सोने पर सुहागा! एकदम सल्लू भाई के माफिक… लगेगा। क्यों चलेगा .. नहीं चलेगा ना। देवी.. आप फौरन कह देंगी कि कैसा टपोरी है तो ऐसे ही कपड़ों के लिए किसी लड़की या स्त्री के प्रति सम्मान का भाव क्यों जगे..?

मैंने एक छोटी उम्र की लड़की.. मुझे लगता है बीस बाईस वर्ष की होगी,..उसे जिन कपड़ों में दफ्तर आते हुए देखा है, वो हैरतअंगेज था। लगभग असंभव सा.. अविश्वसनीय सा। एक बार तो आप यह यकीन ही न कर पाएं कि यह सत्य है। वे इंटर्नशिप करने आई थीं अंग्रेजी चैनल में परंतु रूप लावण्य की धधकती रमणी ने बहुतों की नींद भस्म कर दी। पंद्रह दिनों के बाद ही उन्हें जय सियाराम कह दिया गया। जिस दिन उर्वशी विलीन हुई उस दिन से न जाने कितने ही पुरुरुवाओं के हृदयकमल म्लान हो गए। हाय रे… कहां चली गई वासवदत्ता…! न जाने क्या -क्या स्वप्न देखे थे… अगे मईया….!!

एक बात साफ तौर पर समझना ज़रूरी है कि काम करने का स्थल कोई रमण करने का पड़ाव नहीं है। दफ्तर के कार्य करते हुए आप भिन्न धरती पर होते हैं… वहां आपको अपनी ऊर्जा खपानी होती है, ध्यान केन्द्रित करना होता है लेकिन जब आप उसे गंधमादन पर्वत समझ कर अप्सराओं के साथ विहारस्थल बना देंगे तो मी टू भी होगा और ही टू भी होगा ही।

मैंने तनुश्री दत्ता की कोई फिल्म नहीं देखी है। वैसे भी उस बनरचूहे.. इमरान हाशमी की फिल्म देखने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है.. लेकिन इस विवाद के बाद फेसबुक के कुछ कृपालुओं की वजह से श्रीमती दत्ता जी का एक गाना देखना पड़ा। मेरी तो बोलती ही बंद हो गई कि इन्हें नाना पाटेकर ने छेड़ दिया! हो सकता है छेड़ा हो.. उनके अंगों को सहमति से छूने की इजाज़त तो लेनी ही होगी! परंतु करोड़ों नग्न आंखों के सामने किसी अंतरंग दृश्य को पेश करते हुए उन्हें रत्ती भर परेशानी नहीं हुई और नाना के कथित तौर पर घूरने से वे दग्ध हो गईं..!

मैं बारंबार कहता हूं कि स्त्री को भोग की वस्तु समझने वालों और अनावश्यक लाभ उठाने की फिराक में जुटे लोमड़ियों को कंटाप पड़ना चाहिए। बल्कि स्त्रियां ही इसका शुभारंभ करें तो श्रेष्ठ परंतु उन्हें भी दफ्तर की गरिमा का भान होना चाहिए। वहां वैसे ही वस्त्र पहनें जो शोभनीय हों।

शशि थरूर शायद भूल गए हैं तो याद दिलाना ज़रूरी है कि…

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  1. अभी ही कोई नर-रक्त-पिपासु पिशाचनी प्रकट होगी और अपने अनावृत धड़ के ऊपर धरे लिपे-पुते चेहरे के रदनपट हिला दंतपंक्ति को भी अनावृत कर कहेगी – लेखक महोदय, अब आप बताएंगे कि मेरे लिए क्या शोभनीय है! How dare you

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