अर्थव्यवस्था की राजनीतिक बेड़ियां

1990 के दशक में जब भारत समाजवाद की जकड़न से स्वतंत्र हुआ और समाज को धन के निर्माण की स्वतंत्रता प्राप्त हुई तब से हमने अर्थव्यवस्था में एक लंबी छलांग देखी है।

किन्तु हमें इस पहलू पर गौर करना होगा कि इस उछाल का लाभ भारत के सभी नागरिकों को समान रूप से नहीं मिल सका है। इसके मूल में भारतीय सत्ता तंत्र का राजनैतिक रूप से संकेंद्रित होना रहा है।

उदारीकरण से पूर्व धन निर्माण की व्यवस्था पर सरकारी तंत्र का एकाधिकार था। यह एकाधिकार, व्यावसायिक गतिविधियों को प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करता था एवं उद्यम करने के रास्ते सिर्फ़ उन्हीं के लिए खोलता था जो उसके हितों को बनाये रखने के लिए तैयार रहते थे। इसी प्रक्रिया को लाइसेन्स-परमिट राज या इंस्पेक्टर राज की संज्ञा दी जाती थी, और भ्रष्टाचार की जड़ यहीं से आरम्भ होती थी।

उदारीकरण के बाद स्थिति में कुछ बदलाव आया। नरसिंह राव जी ने समाजवादी बेड़ियों से भारत को मुक्त कराया और उद्यमियों को धन निर्माण और औद्योगीकरण करने की स्वतंत्रता देने वाली नीतियों को लागू किया ताकि हम परफेक्ट कॉम्पिटिशन एवं फ्री मार्केट इकॉनमी की तरफ़ बढ़ सकें।

किन्तु राजनीतिक फैसले लेने की शक्ति अब भी सत्ता तंत्र के पास सुरक्षित रही। ऐसे में तंत्र ने उदारीकरण के बाद सीधे वैसे कॉर्पोरेट्स से हाथ मिलाकर काम करना सुनिश्चित कर दिया जिससे उनके हितों का संरक्षण बना रहे और वह धन निर्माण की प्रक्रिया को संचालित करने वाली नीतियों मनमर्ज़ी से बनाते – बिगाड़ते रहें।

ऐसे में उदारीकरण का पूरा लाभ चंद औद्योगिक घरानों एवं उनको प्रश्रय देती राजनैतिक पार्टियों तक सीमित हो गया। इसी को क्रोनी कैपिटलिज़्म या छद्म किस्म के पूँजीवाद की संज्ञा दी जाती है।

इस पूरे कॉकस को तोड़ने के लिए हमें आर्थिक नीतियों में सरकारी दखल को नियंत्रित करने का प्रयास करना होगा, अर्थात राज्य और राजनीतिक सत्ता को आर्थिक नीतियों के प्रत्यक्ष नियंत्रण से अलग रखना होगा, राजनीतिक विकेंद्रीकरण का मॉडल बनाना होगा जिसमें संविधान नियंत्रित स्वतन्त्र अर्थपालिका का एक अस्तित्व होना चाहिए।

राजनीतिक पार्टियों को जनहित के नाम पर अर्थव्यवस्था चलाने की छूट अंततः असमानता को जन्म देती रही है जिसकी परिणीति भ्रष्टाचार और कालेधन के रूप में दिखती है। हमें जड़ों पर प्रहार करने की बात करनी होगी ताकि पत्ते अपने आप टूट जायें।

इस पूरे विमर्श को पश्चिमी लोकतंत्र और पूँजीवादी सुशासन के संकीर्ण दायरे से आगे निकालकर ले जाने की आवश्यकता है.

अगर संख्याबल में हार जाओगे तो कुछ भी न बच सकेगा

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY