बिन सत्ता सब सून

सितम्बर माह की आख़िरी तारीख़, ईस्वी 2010 भला किसे नहीं याद होगी।

पूरे 484 वर्षों के संघर्ष और दलीलों के बाद आधुनिक राज्य व्यवस्था ने यह फैसला सुना दिया कि मुग़ल आक्रमणकारी जहीरुद्दीन बाबर के आदेश पर तोड़कर बनाई गई मस्जिद-ए-जन्मस्थान मूलतः इस देश के अभागे हिंदुओं की मिल्कियत है।

अद्भुत विजय थी यह क्योंकि इसकी पटकथा सेक्युलर संविधान के तहत उस न्यायपालिका ने लिखी थी जिसकी पूरी समझ ही हिंदुओं की मान्यताओं और सामाजिक/ धार्मिक व्यवस्था के विपरीत खड़ी की हुई है।

फ़ैसला आया किन्तु न्याय पूर्ण न हुआ और पंचायत तक सीमित होकर रह गया. दोनों पक्षों में असंतोष का भाव बना ही रहा क्योंकि पटीदारों का यही इतिहास ही रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय की चौखट पर दोनों पक्षों के ज्ञात-अज्ञात लड़ाकू जाने ही थे और वह गए भी पर वहाँ अब हिन्दू आस्था पर प्रश्न का झगड़ा नहीं है।

30 सितम्बर 2010 के फैसले से तीन मुख्य बातें स्पष्ट हुईं :

पहली, श्री रामजन्मभूमि वही है जहाँ मस्जिद-ए-जन्मस्थान जबरन बनाई गई थी।

दूसरी, हिंदुओं का दावा किसी कपोल कल्पना पर आधारित नहीं था बल्कि आस्था को इतिहास का भी तथ्य आधारित समर्थन उपलब्ध रहा है।

तीसरी कि हिंदुओं को न्याय भारतीय राष्ट्र राज्य के गुलामी काल में कभी न मिल सकता था अगर मिल सकता तो मुगलों के काल में मिल जाता, या फिर अवध के कथित सेक्युलर नवाबों के काल में मिल जाता नहीं तो हुकूमत-ए-बरतानिया के समय ही मिल चुका होता।

जो न्याय (भले ही आधा-अधूरा हो) मिल सका वह भी उसी सेक्युलर शासन व्यवस्था में मिल सका जिसे स्वयं हिंदुओं ने खुद ही रचा था।

फ़िर भी यह कहना होगा कि इतिहास की सांस्कृतिक चेतना में यह अभूतपूर्व विजय थी।

दीपावली मननी चाहिए थी उस दिन…

पर हाय रे हिंदुओं का दुर्भाग्य…

केंद्र में इस्लामपरस्त काँग्रेस और राज्य में बसपा का शासन देखकर ही आम हिंदुओं की रीढ़ में भरा पानी समुद्र के ज्वार की तर्ज पर उफ़ान मारने लगा था।

मुसलमान काली पट्टी बांधकर मोहर्रम मना रहा था, पर उत्तर प्रदेश और भारतवर्ष के हिन्दू जीतकर भी लज्जित हुए जा रहे थे।

सामाजिक तौर पर ग्लानि और डर से भरे हुए इन हिंदुओं में किसी ने घी के दिये नहीं जलाये…

डर से चूहे बिल में दुबके हुए थे क्योंकि सत्ता न थी किसी मोदी की, किसी योगी की।

विजय अधूरी ही सही पर पूर्णाहुति की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाती हुई दिख रही थी।

किन्तु हिन्दू में जीत की घोषणा का साहस रंचमात्र भी न था, वह साहस चुपचाप भीगी बिल्ली बना हुआ एक मोदी की प्रतीक्षा कर रहा था.

ऐसे हिंदुओं ने जन्मभूमि पर कब्ज़ा पा भी लिया तो क्या?

आज भी श्री रामजन्मभूमि पर एकाधिकार नहीं है, विवाद चल रहा है, पर अयोध्या जी समेत सरयू के घाटों पर घी के दीये हरवर्ष जलने लगे हैं, क्योंकि मोदी हैं… योगी हैं।

सत्य यही है कि राज्याश्रय के बिना हिन्दू अस्मिता, हिंदुत्व और हिन्दू प्रजा का भविष्य आज के दौर में एक दिन भी सुरक्षित नहीं है। फ़िर भी, वह हिन्दू ही हैं जो हरपल इस प्रयास में लगे रहते हैं कि मोदी को निपटा दें, योगी को हटा दें।

हिंदुत्व समर्थक सत्ता बनी रहे तो शासकीय दोष अपने आप दूर किये जा सकते हैं, हिन्दू विरोधी सत्ता आ गयी तो न समाज बचेगा, न जन्मभूमि।

सोचें और विचारें…

हमने निर्णय लिया ढांचा टूट गया, हमने निर्णय किया होता तो मंदिर बन गया होता

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