आँखें झूठ नहीं बोलती…!

प्रोफेसर डानिएल कानमान (Daniel Kahneman) को 2002 में अर्थशास्त्र में नोबेल प्राइज मिला था। मज़े की बात यह है वह एक मनोवैज्ञानिक है, ना कि अर्थशास्त्री।

उनकी 2011 में प्रकाशित पुस्तक – Thinking Fast and Slow – हम सभी को एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए।

इस पुस्तक की बेसिक थीम यह है कि मानव एक अतार्किक एवं विवेकरहित जीव है। ना केवल हम परिस्थितियों का गलत आंकलन करते हैं, बल्कि हमारे इस गलत आंकलन का स्वरूप भी पूर्वनिश्चित तरीके से होता है।

हमारी गलतियां, सोचने का तरीका, यह सब अनजाने में, बिना सोचे समझे होता है। इसी का लाभ राजनीतिज्ञ, व्यवसायी, धर्मगुरु, विज्ञापन एजेंसी, पत्रकार और ठग उठाते हैं।

कानमान का मानना है कि हम अपने आस-पास के वातावरण को समझने में दो मानसिक प्रणालियों का प्रयोग करते हैं : तेज़ और धीमी।

तेज़ प्रणाली (सिस्टम 1) ज्यादातर बिना सोचे समझे कार्य करता है और हमारे पिछले अनुभवों और भावनाओं के आधार पर तुरंत फैसले लेता है। जब हम इस प्रणाली का उपयोग करते हैं तो हमारे गलत होने की संभावना है।

इसके विपरीत, धीमी प्रणाली (सिस्टम 2) तर्कसंगत और जागरूक होती है। इसके संचालन में ध्यान केंद्रित करना पड़ता है, जिससे हम थक जाते है।

उदहारण के लिए, हाईवे में कार चलाने में सिस्टम 1 प्रयोग होता है। कब हमने ब्रेक लगाया, कब ओवरटेक करा, यह हमारा मस्तिष्क ऑटोमाटिक तरीके से करता है। लेकिन उसी कार को अगर हमें तंग पार्किंग की जगह में फिट करना हो, तो हमारा सिस्टम 2 संलग्न हो जाता है। बिना सिस्टम 2 के आप कार पार्क नहीं कर सकते।

कानमान ने एक प्रयोग किया। उन्होंने कुछ व्यक्तियों को एक eye टेस्टिंग मशीन में देखते हुए कुछ प्रश्नों का उत्तर देने को कहा। इस दौरान वे एक दूसरे कमरे में बैठे थे और उन व्यक्तियों की पुतली की लाइव इमेज उस कमरे में प्रसारित कर रहे थे।

उन्होंने उन व्यक्तियों कुछ तीन अंको वाले नंबर जैसे कि 127 दिया और उसमें एक जोड़ने को बोला, यह उनके लिए आसान था। लेकिन जब सात अंको वाले नंबर जैसे कि 4254789 में 3 जोड़ने को बोला तो उनका सिस्टम 2 चालू हो गया और उनकी पुतली एकदम से 50 प्रतिशत फैल गयी। लेकिन जब आसान प्रश्न दिया तो पुतली फिर से छोटी हो गयी। प्रश्न के अनुसार पुतली फैलती, सिकुड़ती जाती थी।

कानमान लिखते है कि जब हम किसी व्यक्ति की तरफ आकर्षित होते हैं या फिर किसी वस्तु को बाज़ार में पसंद करते हैं तो हमारी पुतलियां उसी क्षण बड़ी हो जाती हैं।

आज कल तो हर वस्तु का फिक्स्ड प्राइस है, लेकिन मध्य युग में जब महिलाएं बाज़ार में शॉपिंग करने जाती ठें, तो दुकानदार उनकी पुतली देखकर किसी उत्पाद में उनकी रूचि को भांप लेता था और मोलभाव करने से मना कर देता था। इसी प्रकार नौजवान भी परख लेते थे कि कौन सी महिला उनमे इंटेरेस्टेड है।

इसकी काट महिलाओं ने बड़ा सा काला चश्मा पहन कर निकाला. उस काले चश्मे की उत्पत्ति वहां से हुई जो अब फैशन बन गया है।

चिले का चित्र दर्शन : आकाशगंगा, लगता है जैसे आसमान में बह रही गंगा नदी

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