आत्महंता हिंदू ही कर सकते हैं प्रयागराज की पुनर्स्थापना मात्र पर इतना बवाल

‘दुर्घटनावश हिंदू’ जवाहरलाल ने इस देश की प्रज्ञा के साथ जो बलात्कार किया है, उसे जान लेने के बाद किसी भी भले भारतीय को उनसे उत्कट स्तर की चिढ़ होनी ही चाहिए।

अपने अज्ञान, भ्रम, अहंकार, दंभ औऱ बंदर की तरह नकल में उन्होंने इस देश की आत्मा और अस्मिता को ही रौंद कर रख दिया। बाक़ी कसर, उनकी बिटिया और उनके वामपंथी साथियों ने पूरी कर दी।

कमाल है। प्रयागराज की पुनर्स्थापना मात्र पर इतना बवाल! यह आत्महंता हिंदू ही कर सकते हैं। इसमें ‘मिलेनियल किड्स’ और ‘डालडा जेनरेशन’ को तो मैं दोष ही नहीं देता, लेकिन उनका क्या, जो अकबर को जबरन सेकुलर सिद्ध करते हैं, बख्तियार खिलजी के नालंदा को जलाने तक को गलत सिद्ध करना चाहते हैं और चिश्ती की कब्र को पूजते हुए बड़े गर्व से अपनी फोटो लगाते हैं।

आप कहते हैं, नाम में क्या रखा है? सब कुछ रखा है, साब। अपने बेटे का नाम गोबर रख दीजिए, गू रखिए, बेटी का नाम विष्ठा रखिए न… अगर नाम में कुछ नहीं है, तो। (सैफ अली ने तैमूर रखकर राह दिखा ही दी है).

प्रयागराज नाम तो था ही। उसे इस्लामिक हमलावरों ने बदला, उसी की पुनर्स्थापना हुई है… तब आपको इतना दर्द। कमाल है। अच्छा, नाम में कुछ नहीं, तो ज़रा मध्यकालीन इतिहास उठाइए।

इस्लामी लुटेरों, बर्बर आक्रांताओं ने अयोध्या को ही क्यों तोड़ा, सोमनाथ को क्यों बर्बाद किया, काशी विश्वनाथ, मथुरा के मंदिरों को क्यों भूमिसात किया, क्योंकि वे आपके संपूज्य आराध्यों के थे। उन्हें आपका आत्मसम्मान तोड़ना था, मंदिर तो उसके माध्यम थे, जैसे मांस तो बकरे का भी खा सकते हैं वे, लेकिन गाय आपके लिए पूज्या है, अवध्या है, तो वे गाय को ही काटेंगे, उसी का मांस खाएंगे।

वामपंथ की सड़ी शिक्षा से नष्ट आपका मस्तक पूछता है, नाम बदलने से रोज़गार मिल जाएगा, पेट भर जाएगा, उद्योग लग जाएगा?

इसके दो उत्तर हैं… अल्लाह-आबाद जब तक नाम था, पेट भर गया था, रोजगार मिल गया था?

दूसरा उत्तर है, हां मिलेगा। भारत जब भारत बन जाएगा, तो स्व-निर्भर होगा, यहां कोई भूखा नहीं रहेगा। उसे यह पश्चिम के रास्ते नहीं मिलेगा। पश्चिम ने पूंजीवाद और साम्यवाद का चरम देख लिया है, वहां लोग अब भी रास्ता खोज रहे हैं… रास्ता भारत में ही है।

इसलिए, मीम बनाना बंद कीजिए। हरेक चीज पर दांत मत चियारिए। अपने चाचा-ताऊ (पप्पा, झप्पा और अंकल-आंट से उम्मीद मत रखिए) या बाबूजी की पीढ़ी के किसी से पूछिए, अपनी ऐतिहासिक विरासतों को… वरना, सर्वनाश तो छा ही रहा है।

अंतिम बात। ईद में जब इफ्तार करने जाते हो चुगदों, तो वह संस्कृति होती है, लेकिन दुर्गापूजा में कोई व्रत रहे तो वह बैड हिंदू हो जाएगा। नहीं?

बाकी, मॉल में जाओ, फोन पर देखो कि अमेज़न में बढ़िया माल सस्ते दामों पर कहां मिल रहा है, वीकेंड को दारू पीने का ठिकाना खोजो… और हां, उस मॉ़डल के बारे में भी पढ़कर मुंह बिचका देना, जिसे उसके मुसलमान आशिक ने टुकडे़ कर के बैग में भर दिया… क्योंकि, लव जिहाद तो होता नहीं है न, बेटे…।

मॉब लिंचिंग चिंता की बात, इसे सीधे मुस्लिम लिंचिंग कहें क्या?

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