न भूतो न भविष्यति : महाप्राण, अलबेला, मतवाला, निराला

यह कवि अपराजेय निराला,
जिसको मिला गरल का प्याला,
ढहा और तन टूट चुका है
पर जिसका माथा न झुका है,

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शिथिल त्वचा, ढल-ढल है छाती,
लेकिन अभी संभाले थाती,
और उठाए विजय पताका
यह कवि है अपनी जनता का !

(रामविलास शर्मा)
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महाप्राण। अलबेला। मतवाला। निराला।
सचमुच अकेला।
न भूतो न भविष्यति।

हिंदी कविता को छायावाद और रहस्यवाद की अंधेरी गलियों तक सीमित नहीं रखा, वहां से निकालकर जिसने जीवन की गति और उच्छ्वास दिया।

जो इतना बड़ा था कि किसी एक वाद में समा नहीं पाया। जो इतना दीर्घ था कि उसने बाकी सब को लघुतम बना दिया।

इनता विशाल, इतना गौरवशाली, इतना विभ्राट, इतना मौलिक, इतना प्रतिभाशाली, इतना अनोखा कि हिंदी की काव्यधारा को ही मोड़ दिया–अकेले अपने दम पर।

इतनी बड़ी रेख कि वामपंथी गिरोह अपने तमाम षडयंत्र के बावजूद जिसे खारिज नहीं कर सके, जो इतना महान हो गया कि वामपंथी बौने बाद में उससे अपनी संलग्नता दिखाने को, अपना बताने को लंतरानी फैलाने लगे।

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आज की कविता जो बर्दाश्त नहीं होती, उसका कारण निराला भी हैं। मेरे प्रियतम कवि, जिनकी कविताएं निराशा की घनीभूत कंदराओं में मेरे लिए आशा का कंदील जलाती रहीं।

पिता की लाइब्रेरी में जिनकी रचनावली के जरिए महाभारत से परिचय हुआ, फिर पूरा महाभारत पढ़ा। जिन्होंने बचपन में ही कुल्ली भाट और बिल्लेसुर बकरिहा के जरिए भारत के समाज को समझाया….।

जो महाप्राण सचमुच भारत का था, यहां के जन-जन का था।
आधुनिक युग का तुलसी कहें या कबीर….
वह भारत मां का लाल था……।
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प्रणाम कविवर, प्रणाम।

जो करोड़ों दिलों में बसता हो, वो कम से कम अपने दिल से धोखा न खाए

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