बहुरूपिये : भाग-1

बहुत संभव है कि ये व्यक्ति मरा नहीं, मारा गया हो, इसको फ़ंडिंग करने वाले ने ही इसको मारा है। इसकी प्रबल सम्भावना है। ताकि जन सहानुभूति लेकर बांध व जल यातायात परियोजनाओं को बंद कराया जा सके!

क्या कारण है कि अमेरिका व यूरोप आदि विकसित देशों में नदियों का जल एकदम स्वच्छ है? क्या इन देशों में नदी पर बाँध नहीं हैं? क्या इन देशों में जल मार्ग से यातायात नहीं होता?

इन देशों में उद्योग धंधे भारत से कहीं ज़्यादा हैं, फिर भी ये देश ऐसा क्या करते हैं कि इनकी नदियों का जल एकदम स्वच्छ है?

सर्वविदित है कि समुद्र से वाष्पीकरण के बाद भारी मात्रा में वर्षा का जल पर्वतों पर गिरकर बर्फ़ या मौसमी झरनों में बदलता है जिससे गंगा यमुना जैसी परमानेंट नदियां और अनेक छोटी छोटी नदियों का निर्माण होता है।

ये जल अपने स्त्रोत से जब निकलता है तो पूर्ण स्वच्छ होता है, लेकिन ये जल जब नदी रूप में समुद्र में जा मिलता है तो लम्बे रास्ते में सीवर, कल-कारख़ाने, उद्योग-धंधों से निकलने वाले अपशिष्टों से प्रदूषित हो जाता है। जल न केवल काला बल्कि विषाक्त भी हो जाता है।

ये सीवर मुख्यतः नगरों वाले हैं जो नगर पालिका/ निगम के अधीन आते हैं। नियमतः ये नगर निगम की ज़िम्मेदारी है कि सीवर वाटर को STP यानी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में साफ़ करके उस पानी को अन्यत्र इस्तेमाल में ले और सीवेज स्लज से खाद आदि बनाए। लेकिन नगर निगम में बैठे निठल्लों ने वर्षों तक करोड़ों रुपया हज़म किया लेकिन उसके बावजूद ये काम नहीं किया।

वहीं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ज़िम्मेदारी थी कि कल-कारख़ानों से निकलने वाले अपशिष्ट को नदी में न मिलने दे और तकनीकी के माध्यम से अपशिष्ट का ट्रीटमेंट और ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज सुनिश्चित करे। लेकिन यहाँ भी जेब गरम करके आँखें मूँद लेने की भ्रष्टाचारी अदा ने ये होने न दिया।

अमेरिका व यूरोप के देशों में सीवर और कल कारख़ानों का गंदगी व प्रदूषण नदी में किसी भी अवस्था में नहीं मिलता। अतः अपने उद्गम स्थल से लेकर समुद्र में वापस मिलने तक जल की क्वालिटी लगभग एक जैसी साफ़ सुथरी रहती है।

इन देशों में नदियों में सीवर व कल कारख़ानों की गंदगी छोड़ना बड़ा अपराध है। तकनीकी के माध्यम से ऑनलाइन मॉनिटरिंग सुनिश्चित होती है। यही कारण है कि वहाँ भारत से अधिक मात्रा में बाँधों व जल यातायात के बावजूद नदियों का जल साफ़ है।

मीडिया में तो ये भी भ्रम फैलाया जाता है कि नदी को माँ मानने वाले धार्मिक लोगों के कर्मकांड से गंगा समेत तमाम नदियाँ प्रदूषित हुई। कुछ विदेशी वित्तपोषित एक्टिविस्ट जलबाँध व जल यातायात को नदी प्रदूषण का कारण बताते है और परियोजनाओं का विरोध करते हैं।

समस्या ये है कि लोग बड़े आसानी से इनकी बातों में आ जाते हैं और सच समझ नहीं पाते और बाँधों व जल यातायात की परियोजनाओं का विरोध शुरू कर देते हैं।

ज़रा सोचिए कि क्या गंगा पर बाँध बनने से उसका वेग नष्ट हो गया? या उसमें नौका चलने से वो प्रदूषित हो गया? जलमार्ग तो प्राचीन काल से प्रचलन में था। जब सड़कें नहीं थीं तो जलमार्ग से ही यातायात होता था। इससे नदी प्रदूषित नहीं होती! न बाँध बनाने से होती है! गंगा में अभी भी पर्याप्त से कही ज़्यादा वेग है, वो अभी भी समुद्र में मिल रही है।

वरन नदियाँ स्वच्छ रहे इसके लिए ज़रूरत तो ये थी कि सभी नगरों महानगरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट व सभी उद्योगों में ज़ीरो डिस्चार्ज सुनिश्चित किया जाए। और इसीलिए तीन वर्ष पहले नमामि गंगे के तहत पब्लिक प्राइवेट पार्टनर शिप में ये कार्य शुरू हुआ और तेज़ी से जगह जगह STP बनने शुरू हुए।

इस दिशा में निजी क्षेत्रों के प्रयास से अभी तक बहुत से STP चल चुके हैं, गंगा का पानी पहले से साफ़ हुआ है। आगे और साफ़ होगा। कल-कारख़ानों के ऑनलाइन मॉनिटरिंग पर भी काम शुरू है। लेकिन यहाँ तो नौकरशाही ही है, धारा 311 वाले लोग हैं, इतनी जल्दी सुधरेंगे क्या?

कहने का मतलब, नदियों का प्रदूषण न धर्म की समस्या है और न ही परियोजनाओं की समस्या। बल्कि ये समस्या भ्रष्टाचार की है, जिसमें जितनी कमी आती जाएगी, नदियाँ उतनी साफ़ होती जाएँगी!

फिर ‘बूँद बूँद जल बचाओ’ का पाखंडपूर्ण नारा नहीं देना पड़ेगा। इसे पाखंड न कहें तो क्या कहें कि आप बूँद बूँद जल बचाने की बात करते हो, दूसरी तरफ़ नदी का न जाने कितना पानी बिना इस्तेमाल हुए गंदा होकर सागर में मिल जाता है!

ये नदियों का देश है, यहाँ पानी की कमी नहीं है! सूर्य का ताप व समुद्र से वाष्पीकरण का चक्र नदियों के जल को बारंबार उत्पन्न करता रहेगा! जितना पीना है पियो, नहाओ-धोओ! इससे बिजली बनाओ, यातायात में इस्तेमाल करो। इससे प्रदूषण नहीं होता! जो इन चीज़ों का विरोध कर पाखंड करे, वो तकनीकी बात नहीं कर रहा, वो सौ टका कोई बहुरूपिया है!

अभी हाल में दिवंगत हुए श्री जी डी अग्रवाल उर्फ़ स्वामी सानंद को आपने गंगा प्रदूषण की असल समस्या पर बात करते नहीं सुना होगा। इस व्यक्ति की पूरी ज़िंदगी केवल परियोजनाओं के विरोध में गुज़री है।

IIT का एक प्रोफ़ेसर जब तकनीकी से जनसामान्य की समस्याओं को हल करने और तकनीकी बातें करने की जगह, एक्टिविस्ट बनकर असल कारणों का पटाक्षेप करे और भगवा वस्त्र धारण कर परियोजनाओं का विरोध करे, तो सावधान हो जाइए। यही वो एक्टिविस्ट हैं जो देश के बड़े दुश्मन हैं! विदेशी फ़ंडिंग पर इनका जीवन चलता है! यही काम है इनका! बहुत संभव है कि ये व्यक्ति मरा नहीं है, इसे मारा गया है, इसको फ़ंडिंग करने वाले ने ही इसको मारा है। इसकी प्रबल सम्भावना है। ताकि जन सहानुभूति लेकर बांध व जल यातायात परियोजनाओं को बंद कराया जा सके!

ये बहुरूपिए हैं, यदि ऐसा न होता तो स्वयं केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में उच्च पद पर रह चुके स्वामी सानंद संरचनात्मक सुधार करते, न कि एक्टिविज़्म।

धारा 311 यानी भारत दुर्दशा

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