महाकवि निराला को प्रणाम : क्या यह मनुष्य की मेधा है!

छठी कक्षा का छात्र था, उन दिनों समसामयिक विषयों पर हिन्दी में एक पन्ने का लेख लिखना होता था । बिहार में वचनदेव कुमार की किताब लोकप्रिय थी ।अचानक बाढ़ पर लिखे उनके लेख को पढ़ते हुए पहली दो पंक्तियों में मेरी आंखें फंस कर रह गईं:

शत घूर्णावत तरंग भंग उठते पहाड़
जल-राशि राशि-जल पर चढ़ता खाता पछाड़

हमारे पाठ्य पुस्तक में कई कवियों की कविताएं थीं लेकिन तब तक मेरे जीवन पर किसी भी कविता का इन दो पंक्तियों सा प्रभाव नहीं पड़ा था । मैं उन पंक्तियों पर देर तक, दिनों तक सोचता रहा और इस बात को आज स्वीकार करता हूं कि कविता के प्रति मेरा अनुराग इन्हीं दो पंक्तियों से जागा, जो बाद में प्रसाद, पंत, भवानी प्रसाद मिश्र, अज्ञेय जैसे महारथियों का काव्य पढ़ने के बाद गाढ़ा हुआ ।

उपरोक्त पंक्तियां, राम की शक्तिपूजा से ली गई हैं और प्रसंग राम के आंसू देखकर हनुमान के प्रचंड वेग का है जबकि वचनदेव कुमार ने उसे बाढ़ के दृश्य को बयां करने के लिए सुविधानुसार उठा लिया था ।

छठी में हिंदी का ककहरा सीख रहा था, आज भी हिन्दी नहीं आती लेकिन तब भी उस शब्द-योजना, भाव-गांभीर्य और ध्वनि-सौन्दर्य से स्तंभित रह गया था आज भी हूं ।

कॉलेज आने के बाद ही मैंने निराला को पढ़ा । उनकी बड़ी कविता और गीतों ने मेरे शब्द-संस्कार को धोया, नहलाया है । मैं गिनती नहीं कर सकता कि कितनी बार उनकी कविताओं से भाव और बिंब लेकर मैंने टीवी में भावनात्मक स्क्रिप्ट लिख डाली है । मेरे अवचेतन में वो धंसे हुए हैं । अपनी पचासों पंक्तियों के साथ चमकते हैं चपला की तरह जो अचानक मेघमय आसमान को दीप्त कर विलीन हो जाती है अनंत लोक में । पर तब तक मुझ जैसे मूढ़ों को बहुत कुछ दे जाती है । जैसे तुलसी राम से कहलवाते हैं- भरत भाई कपि से उरिन हम नाहीं वैसे ही मै कह सकता हूं कि महाकवि मैं तुमसे उरिन नहीं हो सकता ।

साल 2011 में बुंदेलखंड पर आधा घंटा का एक प्रोग्राम मैंने बनाया था । उस प्रोग्राम का पूरा संस्कार निराला के एक छंद की छटा से गढ़ दिया गया था । तुलसीदास कविता में उन्होंने लिखा है:
रिपु के समक्ष जो था प्रचण्ड
आतप ज्यों तम पर करोद्दंड
निश्चल अब वही बुंदेलखंड, आभा गत
नि:शेष सुरभि कुरबक समान
संलग्न वृन्त पर चिन्त्य प्राण,
बीता उत्सव ज्यों चिह्न म्लान, छाया श्लथ

2001 में एक शूट के सिलसिले मैं मेरा इलाहाबाद जाना हुआ । कार्यक्रम बहुत कसा हुआ था लेकिन मुझे दारागंज जाना था । सुबह-सुबह वहां हाजिर हो गया । तभी मैंने वो देहरी देखी जहां उन्होंने जीवन के अंतिम वर्ष काटे थे । और जहां से हमेशा के लिए जाते-जाते लिख गए थे:

पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है
आशा का प्रदीप जलता है हृदयकुंज में
अंधकार पथ एक रश्मि से सुझा हुआ है
दिग्निर्णय ध्रुव से जैसे नक्षत्र पुंज में

उस जर्जर कमरे को देखकर क्षोभ हुआ कि हिन्दी का समाज कितना दरिद्र और जड़ है। जिस कमरे में महाकवि ने वर्षों बिताए उसे गृहस्वामी ने केस ठोककर हथिया लिया और दीवार खड़ी कर दी । हिन्दी का पाठक, लेखक समाज मुंह ताकता रह गया । निराला के ही शब्दों में (खड़ी है दीवार जड़ की घेरकर, बोलते हैं लोग ज्यों मुंह फेर कर ) वहां से बहुत अन्यमनस्क निकला था । थोड़ा अजीब भी लग रहा था । बाहर डेविड धवन की फिल्मों जैसा दृश्य था । हर पनवाड़ी की दुकान पर निराला पान भंडार लिखा था ।

क्या मजाक बना कर रखा है! दारागंज अपने महाकवि पर दारुण अट्टहास करता हुआ दीख रहा था । सुबह कुहासे की कोख से बाहर निकली नहीं थी और आकाश से बूदें बरस रही थीं। अचानक कोई गा उठा –मधुर स्वर तुमने बुलाया, छद्म से जो मरण आया, बो गई विष वायु पच्छिम, मेघ के मद हुई रिमझिम,रागिनी में मृत्यु द्रिम-द्रिम, तान में अवसान आया..।

निराला बैसवाड़े के थे, ताउम्र बैसवाड़ी उनके व्यक्तित्व पर सवार रही लेकिन बचपन बंगाल में बीता इसलिए हिन्दी कविता को रवीन्द्र के साथ तौलते रहे। बादल राग कविता की श्रृखंला इस बात का साक्षात प्रमाण है कि वो वर्षा पर रवीन्द्र और कालिदास, तुलसीदास की टक्कर का काव्य आधुनिक हिन्दी में देखना चाहते थे । निस्संदेह बादल राग एक विलक्षण कविता है। विश्वनाथ त्रिपाठी कहते हैं कि बादल राग को पढ़ते हुए पंडित भीमसेन जोशी का आलाप याद आता है ।

झूम-झूम मृदु गरज गरज घनघोर
राग अमर अम्बर में भर निज रोर
झर झर झर निर्झर गिरि सर में
घर मरु तरु मर्मर सागर में
सरित तड़ित गति चकित पवन में
मन में विजन गहन कानन में..
आनन आनन में रव घोर कठोर

रामविलास शर्मा ने लिखा है कि निराला ने एक तरफ तुलसीदास की अवधी तो दूसरी ओर रवीन्द्र की बांग्ला से होड़ ली । प्रतिस्पर्धा के वो पक्षधर थे लेकिन हमेशा स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की बातें करते रहे । हिन्दी के कवियों में ही जब भी उनकी तुलना पंत से हुई तो उन्होंने पंत जी को यथेष्ट सम्मान दिया लेकिन उतारने में बड़े निष्ठुर भी रहे।

निराला ने पंत और रवीन्द्रनाथ की समीक्षा करते हुए एक जगह लिखा है- पंत जी पंक्तिचोर हैं, भाव भण्डार को लूटने वाले डाकू नहीं! रामविलास शर्मा एक बड़ा दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं। हिन्दी का कोई पाठक एक दिन दारागंज आया हुआ था और निराला से बार-बार पूछ रहा था कि हिन्दी का सबसे बड़ा कवि कौन है। निराला गुम थे। कई बार पूछने के बाद भी वो चुप ही रहे। कुछ देर के बाद जब महाशय वहां से चले गए तो उन्होंने रामविलास शर्मा से कहा- “देख ई चूतिया के, हमहीं से पूछत है हिन्दी का सबसे बड़ा कवि को है..”

अज्ञेय ने तीस के दशक के आखिरी वर्षों में एक बार कह दिया था कि निराला इज़ डेड! साहित्यिक जमात में इस पर बड़ी तीखी प्रतिक्रिया भी हुई थी। बाद में जब अज्ञेय खुद उनसे मिले, जिसका जिक्र उन्होंने संस्मरण में किया है तो उन्हें बड़ी ग्लानि हुई। अपने लेख, मैं ही वसंत का अग्रदूत, में वे इस बात की चर्चा करते हैं। अज्ञेय के साथ कविता पर चर्चा करते हुए निराला ने बड़ी ही सूक्ष्मता से हिन्दी कविता में आ रहे परिवर्तन को रेखांकित किया था।

अज्ञेय ने लिखा है कि कविताओं में बदलाव की जैसी समझ निराला को थी वैसी बड़े-बड़े आचार्यों की नहीं थी, वो भी ऐसे वक्त में जब लोगों ने उन्हें विक्षिप्त कह दिया था। निराला ने अज्ञेय से कहा था कि जानता हूं तुम लोग क्या लिख रहे हो, तुम्हारे लिए कविता में शब्द का स्वर प्रधान है और मेरे लिए संगीत का स्वर प्रधान रहा।

उनके जीवन से जुड़े कई किस्से हैं उनकी फक्कड़ी के, उदारता के, सनक के, करुणा के लेकिन कुछ गढ़ दिये गए हैं, कुछ जबरन के उनके भक्तों ने फैलाए हैं ये ऐसे भक्त हैं जिन्हें उनकी एक कविता भी ढंग से याद नहीं, ऐसे किस्सों से उनकी छवि खराब ही होती है बनती नहीं।

एबीपी न्यूज़ पर बने कार्यक्रम महाकवि में निराला वाला एपिसोड देखकर भी यही अनुभव हुआ था। पिलपिली भावुकता नजर आ रही थी। कुमार विश्वास जबरन का पांडित्य और प्रेम दिखाने की कोशिश में थे। इस बारे में उनके समकालीन कवि-लेखकों के संस्मरण बड़े महत्वपूर्ण और दिलचस्प हैं।

महादेवी लिखती हैं कि एक बार पंत के बारे में किसी ने खबर फैला दी कि वो नहीं रहे। निराला फौरन भागे हुए महादेवी के पास आए। रात हो गई थी तो महादेवी ने कहा कि तार करती हूं, सुबह तक पता चल जाएगा आप घर जाएं। पता चला निराला ने पूरी रात सामने पार्क में काट दी, सुबह-सुबह आर्द्र आंखों के साथ द्वार पर खड़े हो गए कि खबर बताओ।

आधुनिक हिन्दी को समर्थ बनाना और हिन्दी को उसका स्थान दिलाना ही उनके जीवन का ध्येय था। जिसके लिए उन्होंने कभी गांधी तो कभी नेहरू को रगेड़ा, प्रसाद और प्रेमचंद के प्रति उनके मन में अगाध स्नेह, सम्मान था। वो पूरे भारतवर्ष को बताना चाहते थे कि देखो, खड़ी बोली ने पिछले पचास सालों में कितनी प्रगति की है।

एक बार किसी ने गालिब और रवीन्द्र की चर्चा की फिर मुस्कराते हुए कहा कि तराजू के एक ओर गालिब और रवीन्द्र को साथ-साथ और दूसरी ओर आपको रखें तब भी पलड़ा भारी आपका ही होगा, निराला ने हंस कर कहा, तुलसीदास को क्यों भूल गए बर्खुरदार! दरअसल तुलसीदास ही उनके प्रिय कवि थे. अपनी लंबी कविता तुलसीदास में उन्होंने मुगलकालीन भारत का अद्भुत सांस्कृतिक बिंब खींचा है और तुलसीदास को कल्चरल हीरो के तौर पर प्रस्तुत किया है।

राजेश जोशी लिखते हैं कि आम तौर पर हर बड़ा कवि अपने जीवन में दो जन्म लेता है। लेकिन निराला के काव्य में जिस तरह का बदलाव और वापसी है उसे देखने के बाद लगता है जैसे उन्होंने तीन जन्म लिए। उनकी कविताओं पर कुछ लिखने या टिप्पणी करने की योग्यता मुझमे नहीं है। निराला मेरे लिए हव्वा नहीं हैं जिनका नाम लेकर मैं माहौल बनाऊं। मैंने उनकी कविताओं से बहुत कुछ सीखा है। उनके सुघड़ व्यक्तित्व ने मुझे अपनी ओर खींचा है, जिसे खुद वो ग्रीक कट कहा करते थे।

एक विकट ताप और दबाव ने हिन्दी के इस कवि को जन्म दिया था, जो कि अपनी संपूर्ण उपस्थिति के साथ हिन्दी कविता में दमकता है। वो अपने जीवन में कई बार गिरे, चोट खाई लेकिन हार नहीं मानी। जिजीविषा उनमें अपार थी इसलिए लिखा भी-जीवन चिरकालिक क्रंदन, मेरा अंतर वज्र कठोर! लंबी बीमारी से उनके उबरने के बाद केदारनाथ अग्रवाल ने कहा.था – “हिन्दी का अपराजेय कवि ठीक हो रहा है, एक बार फिर पाताल से सूरज की तरह उभर रहा है।”

भीतर नग्न रूप था घोर दमन का
बाहर अचल धैर्य था उनके उस दुखमय जीवन का
भीतर ज्वाला धधक रही थी सिन्धु अनल की
बाहर थीं दो बून्दें पर थीं पर थीं शान्त भाव में निश्चल
विकल जलधि के जर्जर मर्मस्थल की……

अंग्रेजी में अनुदित करते हुए डेविड रूबिन कहते हैं कि निराला उतने ही बड़े कवि हैं जितने बड़े कि अंग्रेजी रोमांटिसिज्म के युग प्रवर्तक कवि और लेखक। रामकृष्ण मिशन के स्वामी, नाम विस्मृत हो रहा, उन्होंने एक बार निराला से तर्क करते हुए कहा था, एमोन की मानबेर मेधा..! क्या यह मनुष्य की मेधा है…!

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