वेद और विज्ञान का विभाजन अत्यंत कठिन, और ‘साइंस’ से तुलना निरर्थक

वेद और विज्ञान की बहस, अपने मूल में ही खामियां लिए है। जिसे वेद पता है, और जिसे विज्ञान पता है, वो जानता है कि मोटे तौर पर इन दोनों का विभाजन सम्भव नहीं है। वेद शब्द ही खुद में तमाम विज्ञानों को समेटे है।

कई बार जब हम कहते हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं है जो वेदों में नहीं है, तो तलवार लेकर खड़े होने वाले बहुतेरे आ जाते हैं। लेकिन ऐसा तो नहीं है न कि जो हम नहीं जानते या जिसकी हमें समझ नहीं उसका अस्तित्व ही नहीं है।

पिछले वाक्य को आगे बढ़ाने पर हम पाते हैं कि जो वेदों में नहीं है उसे ढूंढने आपको पुराणों की ओर जाना होगा, अर्थात् पुराणों को वेदों की व्याख्या के तौर पर भी समझ सकते हैं आप।

पुराणों की रचना का श्रेय वादरायण मुनि को जाता है। जिन्हें हम वेद व्यास के नाम से भी जानते हैं। वेदों का विन्यास करने के कारण उनका नाम वेद-व्यास पड़ा। यहाँ सनातन दर्शन को एक श्लोक से समझा जा सकता है, ‘अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनं द्वयं; परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नम’। अर्थात् अट्ठारह पुराणों में व्यास जी का वचन यही है कि परोपकार सबसे बड़ा पुण्य है और दूसरों को दुख पहुंचाना सबसे बड़ा पाप।

पुराण शब्द को सामान्यतः दो रूप में समझा जाता है, एक तो इसकी पौराणिकता को लेकर, दूसरा इसकी संपूर्णता को लेकर। कहा जाता है कि इसमें सृष्टि के आदि से लेकर अंत तक की सारी बातें हैं। जो सनातन और वेदों को पांच हज़ार वर्ष पुराना मानते हैं, वो पुराणों को वैदिक काल की कहानियां मानते हैं। जबकि पुराण खुद में तमाम ज्ञान और दर्शन समेटे है। अट्ठारह पुराणों के अलावा उपपुराण और उपौपपुराण भी है।

आधुनिक शोध में पुराण वांग्मय भी काफी हद तक उपनिषदों और अन्य भारतीय विद्याओं की तरह ही उपेक्षित है। वेद के छः अंग हैं, जिन्हें षड्-वेदांग भी कहते हैं। वेदांगों में उपनिषद् आखिरी हैं। इसलिए वैदिक दर्शनों में उपनिषदों को वेदांत दर्शन कहते हैं।

उपनिषद् शब्द ‘उप’, ‘नि’ उपसर्ग तथा, ‘सद्’ धातु से बना है। इसका अर्थ गुरु के समीप बैठकर प्राप्त किए गए ज्ञान से है। अब गुरु कौन हो और कैसा हो, ये अलग विमर्श का विषय है। उपनिषद् मुख्यतः दो प्रकार के हैं, मुख्य और गौण। जिनपर आदि शंकराचार्य ने भाष्य लिखा था, वो मुख्य उपनिषद् हैं और शेष गौण।

जैन और बौद्ध जैसे बाद के दर्शन भी इन दर्शनों से काफी हद तक प्रभावित नज़र आते हैं। इसलिए भी उन्हें नास्तिक दर्शन होने के बावजूद वेद निंदक नहीं माना जाता। कथित तौर पर हिन्दू परम्परा के निंदक समाज के तौर पर जाना जाने वाला आर्य-समाज भी वेदों पर ही आधारित है।

आर्य समाज के पहले नियम का पहला वाक्य इस प्रकार है, ‘सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सबका आदिमूल परमेश्वर है’। अगले नियम में परमेश्वर की परिभाषा है। तीसरा नियम कहता है ‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना, सुनना-सुनाना सभी आर्यों (आर्य-समाजियों) का परम धर्म है।

वेद शब्द ‘विद्’ धातु से होता है जिसका अर्थ होता है जानना या जानने वाला। यहाँ जानने का आशय तत्व ज्ञान को जानने से है। जब आप विज्ञान को देखेंगे तो इसका अर्थ विशिष्ठ ज्ञान होता है। पश्चिम के ‘साइंस’ के परिभाषा में भी ‘सिस्टेमैटिक नॉलेज’ की बात है। मगर विज्ञान, ‘साइंस’ का अनुवाद नहीं है। ये उससे कहीं विस्तृत है। क्योंकि साइंस ज्ञान के मानव पक्ष को सिरे से खारिज कर देता है।

किसी ज्ञान को साइंस होने के लिए उसका ‘ऑब्जेक्टिव’ होना अत्यंत आवश्यक है। ऑब्जेक्टिव होने के लिए मानव पक्ष को भूल जाना होता है। लेकिन जीवन (ज्ञान) प्रयोगशाला के बंद प्रयोगों तक सीमित नहीं है। ये बात पश्चिम भी समझने लगा है अब। ‘इंटर-डिसिप्लिनरी नॉलेज’ उसी दिशा में बढ़ाया गया उनका कदम है। यही बात तो हम सनातन काल से और आपके अनुसार पाँच हज़ार वर्षों से समझा रहे हैं।

मैं ये बिल्कुल नहीं कह रहा कि हमारे पास सब था। आज विश्व जहां है उसमें पश्चिम का बड़ा योगदान है, हमारी सुविधाओं में भी और हमारे मुसीबतों में भी। पश्चिम ने हमारे जीवन को सुलभ बनाया है तो हमारे रिश्तों और मूल्यों का समूल नाश भी किया है। समझने योग्य बात ये कि विज्ञान मशीनों को बनाना भर नहीं है। वो कहीं विस्तृत है। एस्ट्रो-फिजिक्स के बड़े वैज्ञानिक तक खुद को वेदों से प्रेरणा लेते बताते हैं।

ये वक़्त अतीत पर गर्व करने का नहीं है, बल्कि मनन करने का है कि हम कैसे उस गौरव को पुनः प्राप्त कर सकते हैं! लेकिन इसका ये मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि हम अपने परंपरा को बेवजह ही कोसते चलें, इसे मानने वालों को बेवजह बुरा-भला कहते रहें। अपने मूलों और मूल्यों का अभिमान होना हमारे स्वाभिमान के लिए निहायत आवश्यक है, खासकर जब आप इतने गौरवशाली परंपरा के हिस्सा हों। अब सामान्य लोग तकनीकी बातों में बहुत रुचि नहीं लेते, मात्र इस कारण से उन्हें कुछ भी कहने का अधिकार किसी को नहीं मिल जाता!

सनातन परंपरा व्याख्या के अभाव में मूर्छा की शिकार है। अफसोस कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा इसकी निंदा करने को प्रोग्रेसिव होने के पैमाने के तौर पर देखता है। मगर उन्हें नहीं पता कि इस परंपरा के मूल को, दर्शन को जाने बिना, गलत व्याख्या से वो अपनी व्याख्या का मखौल उड़ा रहे होते हैं।

वेद और विज्ञान के मध्य विभाजन अत्यंत मुश्किल है, वहीं इनकी साइंस से तुलना बेमानी है। क्योंकि तत्व-ज्ञान को समझने का दोनों का मार्ग बिल्कुल अलग है। बिना महीन ज्ञान के आप ये नहीं कर सकते।

जहाँ तक बात आस्था की है तो मेरा मानना है कि निहित स्वार्थ के लिए निराधार कारणों के आधार पर कु’व्याख्या’ से वृहद् सभ्य समाज के भावनाओं को आहत करने का अधिकार तो किसी को नहीं ही है!

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