आपके कुछ जानने की शर्त आपका विनय है

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अच्छा, एक बात बताइए, आपके घर में खज़ाना गड़ा हुआ है, लेकिन आप उससे अनभिज्ञ हैं। कुछ लोग बाहर से कमा कर आते हैं और आपके ही घर में आपका मज़ाक उड़ाते हैं।

आपके परिवार में एक व्यक्ति है, जिसे उस खजाने की जानकारी है। वह बाहरी लोगों का मुंहतोड़ जवाब देता है, लेकिन आप अपने अज्ञान में क्या करते हैं? उनके साथ मिलकर अपने ही घरवाले पर हमला कर देते हैं, उसी की धुलाई करने लगते हैं। कुछ जानी हुई बात लगी? मैं सनातनियों की ही बात कर रहा हूं, हिंदुओं की ही…..

खैर, कल जो शक्तिपीठ की कहानी बतायी, उससे आगे बढ़ते हैं। देवी पुराण में शक्ति पीठों की संख्या 51 बताई गई है, जबकि तन्त्रचूडामणि में 52 शक्तिपीठ बताए गए हैं। दन्तेवाड़ा को हालांकि देवी पुराण के 51 शक्ति पीठों में शामिल नहीं किया गया है लेकिन इसे देवी का 52 वां शक्ति पीठ माना जाता है।

मान्यता है कि यहाँ पर सती का दांत गिरा था इसलिए इस जगह का नाम दंतेवाड़ा और माता क़ा नाम दंतेश्वरी देवी पड़ा। यहां शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर माता का मंदिर है और ये दोनों नदियां भी जाहिर तौर पर मां की सहायक शक्तियां ही हैं।

दंतेश्वरी में दुर्गा की पूजा काफी लंबे समय से हो रही है और इसे हमारे वामपंथी मित्र अब तक आर्यों का बहुजनों पर आक्रमण क्यों नहीं साबित कर पाए, यह शोध का विषय है…..

वैसे, दंतेश्वरी से बढ़कर आज कथा सुनिए कामाख्या की। यह तंत्र विद्या का गढ़ माना जाता है, क्योंकि मान्यता है कि यहां सती की योनि गिरी थी। तो, हम भारतीय आज जितने भी पिछड़े, असभ्य, बलात्कारी, नारी-विरोधी हो, लेकिन नारी की सर्जना शक्ति को पूजने का रिवाज पुराना है…. कामाख्या के मंदिर में भी कोई देवी प्रतिमा नहीं है, पत्थर पर बस योनि के आकार की आकृति है, जो प्राकृतिक झरने की वजह से सदा गीला रहता है।

आज जब मासिक धर्म को टैबू बना दिया गया है, हमारे आसपास इतना प्रचार तंत्र यह स्थापित करने में लगा है कि भारतवासी पैदाइशी महिला और रजस्वला विरोधी हैं, उसी भारत में यह मंदिर भी है और उसी में अंबुवाची का मेला भी होता है, जिसमें तीन दिनों तक मंदिर के पट बंद रहते हैं।

कहा जाता है कि देवी रजस्वला होती हैं, जिससे ब्रह्मपुत्र तक का पानी लाल हो जाता है और लोगबाग देवी के रक्तस्नात कपड़े को प्रसाद के तौर पर ले जाते हैं (ह्विस्पर और केयरफ्री वाले ध्यान देंगे)। वैसे, कहा तो यह भी जाता है कि यहां की औरतें मर्दों को भेड़ बना लेती थीं….

….कामाख्या का राज महाभारत काल में भगदत्त के अधीन था। उसकी मृत्यु के बाद यहां छोटे सामंतों का राज हुआ। अंबुवाची का मेला इतना प्रसिद्ध है कि इसे पूर्व भारत का महाकुंभ भी कहते हैं।

तो, हे लहुलूहान गदाधारियों, मेरे हिंदू लकड़बग्घों, शेरों, चीतों। कहने का मतलब यह है कि सनातन गाथा एक से एक गुंजलक समेटे है, ऊपर से हमारे पुरखों की प्रतीक में बात कहने की अदा…. अच्छे-अच्छों का सिर घूम जाए।

आप धरती की एकमात्र सभ्यता हैं, जो तमाम आक्रमणों – वह भी मुसलमान और ईसाई जैसे क्रूर, हत्यारी और बर्बर आक्रांता कौम द्वारा – के बावजूद बचे हैं, वह भी तब, जब आपमें आपका 1 फीसदी भी नहीं बचा है।

तो, तलवारें न भांजें। मनन कीजिए, चिंतन कीजिए और तब उगलिए….

औऱ हां, यह तो पहला नियम है कि मैंने कुछ कहा, इसलिए मान मत लीजिए….

तर्क कीजिए, कुतर्क नहीं…. वाद कीजिए, खरमंडल नहीं…

बाक़ी, देवी के पांचवें स्वरूप स्कन्दमाता की जय-जय…

प्रेम से बोलिए दुर्गामाई की जय….

#शारदीनवरात्र-5

आप जितना जानते हैं, वही ज्ञान की सीमा तो नहीं!

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