विचारिए, नहीं तो #MeToo को ही अपना सम्मान समझ कर प्रसन्न रहिए

हिंदुस्तानी नारियाँ आज सशक्त हो रही हैं या पहले सशक्त थीं? सशक्तिकरण और आज़ादी का आदर्श कौन है हमारे लिए?

पाश्चात्य जगत को ही आदर्श मानते हैं क्योंकि ये तो हम जानते ही हैं कि…

मुसलमानों में औरत को वासना-पूर्ति का एक यंत्र मात्र समझा जाता है इसलिए मुसलमान पुरुषों को चार पत्नियाँ रखने की अनुमति है।

घर की औरतों को पॉलिस्टर के काले खोल में बंद रखा जाता है जिसमे साँस लेना भी दुश्वार होता होगा।

कुछ औरतें अपने आपको सांत्वना देने के लिए काले लबादे को कढ़ाई और मोतियों से सजा भी लेती हैं।

परंतु इससे स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आ जाता है।

ईसाइयों में स्त्रियों को समान व्यवहार का लॉलीपॉप दिखाया ज़रूर जाता है पर वास्तव में विलासिता की सामग्री से ज्यादा कुछ नहीं समझा जाता है।

जितने ईसाई देश हैं उनके यहाँ के सामाजिक आंकड़ों को यदि देखें तो समझ में आ जाएगा।

वहाँ की औरतों के लिए नौकरी करना समानता का या आज़ादी का उदहारण नहीं है उनकी मज़बूरी है।

उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है।

कभी भी तलाक हो सकता है, इसलिए ना पति को पत्नी पर भरोसा है, ना पत्नी को पति पर।

दोनों अपना कमाते हैं, अपना खाते हैं, अपने कपड़े स्वयं खरीदते हैं, होटल में अपना अपना बिल देते हैं, डॉक्टर को फी भी अपने अपने इंश्योरेन्स से दिया जाता है जिसका प्रीमियम खुद ही भरते हैं।

वहाँ के समाज में पति अपनी कमाई पत्नी के हाथ में नहीं सौंपता है।

वहाँ की स्त्रियों के आभूषणहीन होने का एक कारण यह भी है कि औरतें अपनी कमाई को गहनों में नहीं, दूसरी ज़रूरतों में खर्च करना उचित समझती हैं।

वहाँ हाथ में हाथ डाल कर घूमने वाले कब आँख पलट लेंगे, कोई नहीं जानता है इसलिए उनके यहाँ 25 साल की शादीशुदा जिंदगी बहुत बड़ी उपलब्धि समझी जाती है। अब तो हमारे यहाँ भी समझी जाने लगी है जबकि यहाँ जीवन भर का नाता माना जाता है।

हिन्दू धर्म में स्त्रियों को समानता का स्थान नहीं दिया गया है, बल्कि प्रथम स्थान दिया गया है।

वेद में पहला पाठ है – “मातृदेवो भव”

भारतीय दर्शन के द्वैत, अद्वैत या विशिष्ट द्वैत किसी भी दर्शन को देखिए, सृष्टि का मूल कारण माया अर्थात् स्त्री को ही माना गया है।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव – ऋषियों ने प्रार्थना में भी माता को ही प्रथम स्थान दिया है।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः … ये उदहारण हिन्दू धर्म में स्त्री की स्थिति को दिखाने के लिए पर्याप्त है।

आर्थिक सुरक्षा के लिए स्त्री धन की व्यवस्था भी की गयी थी, जिसे आज भी पति क्या अदालत भी स्त्री से नहीं ले सकती है।

भारत के शास्त्रीय संविधान में बचपन से बुढ़ापे तक किसी भी दशा में स्त्री को आत्मरक्षा की चिंता नहीं करनी पड़ती है। पिता, पति और पुत्र को यह दायित्व दिया गया है, जिसे अब बंधन समझा जाता है।

स्त्री सम्मान की पराकाष्ठा देखनी हो तो उन घटनाओं को याद करें जिसमें जब एक सन्यासी पुत्र अपने नगर में आता है तब पिता उसे जगद्गुरु मान कर उसके चरण छूता है किंतु वही सन्यासी पुत्र जब माँ के सामने जाता है तब माँ के चरण छू कर अपना समस्त गौरव माँ के चरणों पर न्योछावर कर देता है।

ऐसा सम्मान किस धर्म में दिया जाता है?

हमारी व्यवस्था में नारी को एक की रानी बना कर रखा गया था जिसे पाश्चात्य जगत ने भ्रमित करके लाचार और परतंत्रता का रूप दे दिया।

अब हम नौकरी करने वाली नौकरानियों को आत्मनिर्भर और आज़ाद समझ कर स्वयं को सशक्त और आज़ाद कराने में प्रयासरत हैं।

इसका मूल्य चुका भी रहे हैं और अभी बहुत कुछ मूल्य चुकाना बाकी भी है… पा रहे हैं या गँवा रहे हैं विचारना तो पड़ेगा, नहीं तो #MeToo को ही अपना सम्मान समझ कर प्रसन्न रहें।

ME TOO : क्या हम इसके दीर्घकालीन प्रभावों के लिए तैयार हैं?

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