रहस्य ऑफ मनी

पैसा वस्तुतः दिखता नहीं है। पेपर के रूप में जो मौजूद होता है वो किसी न किसी कार्य का परिणाम मात्र होता है। कैश रूप में भी बहुत कम होता है। एसेट रूप जैसे घर कंपनी दुकान या कोई इन्वेस्टमेंट के रूप में ठोस खड़ा होता है। या फिर बैंक बैलेंस के रूप में।

अधिकतर को धन चाहिए होता है। ये सबसे लुभावनी वाली बात है। भिखारी से लेकर अमीर तक सब इसी जुगत में लगे होते हैं।

पर रहस्य क्या है? क्या केवल इच्छा करने मात्र से धन आ सकता है? या धन का स्वरूप क्या है इसे समझना अनिवार्य हो जाता है। धन केवल एक परिणाम है, एक फल मात्र है। जो कोई भी जितना कार्य सोचकर उसके लिए लगा है, उसे उतना तो प्राप्त हो जाता है।

रूटीन लाइफ का हिसाब भी वही है। धन कमाने को सब जीते हैं, उसे सुरक्षित रखने का हिसाब किताब लगातार करते रहते हैं। कोई कोई तो दूसरे का धन हड़पने की कोशिश में ही लगातार रहता है। इस प्रकार से धन तत्व की शिफ्टिंग इधर से उधर होती रहती है। धन निर्मोही ढंग से ही रहता है। उसे मतलब नहीं होता वो किसके हाथ में जा रहा है।

धन की अपेक्षा करनी भी चाहिए? ये एक जटिल प्रश्न है। मुझे नहीं लगता विशेष इच्छा करनी चाहिए। उससे तो दिमाग का दही निश्चित रूप से हो जाता है। धन परिणाम होता है क्रिया कलाप का। एक किये काम का फल आना ही है। कितना आएगा, उसका कोई निश्चित मानक नहीं है। पर आएगा अवश्य ही। तो चिंता उस प्रक्रिया की करनी है जो धन रूप में उपस्थित है। इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता।

रूटीन लाइफ, जैसे नौकरी, धन का स्टेबल रूप है। मासिक सैलेरी का आना उसमें निश्चित रहता है। इसीलिए कहा जाता है पढ़ लिख लो, एक्जाम इंटरव्यू निकाल लो, उसके बाद ठप्पा लग जाएगा पीठ पर कि इतना पैसा कमाने के लायक हो। ये सिस्टम की खास देन है। उपाय इसका और नहीं है। घर मकान बनाना होता है, हॉलिडे पर जाना और कार वगैराह की ईएमआई पे करते रहने का सिस्टम ही बना होता है।

क्या इससे अलग निकला जा सकता है? मुझे लगता है काफी मुश्किल काम है। इसे सिस्टम का श्राप भी कहा जा सकता है। वो तैयार ही ऐसे करता है कि जीवन निकालने लायक बन जाओ या थोड़ा अधिक, पर रहना उसी चक्र में है। इस प्रकार से धन द्वारा चलित एक सिस्टम के जनसमूह के रूप में हमारी परिणीति होती है।

अलग निकलने का मसला बहुत गंभीरता को लेकर होता है। धन अज्ञात विषय वस्तु रहती है। लीक से हटकर चलने पर अनेकानेक प्रकार की परीक्षाएं आती हैं। सामान्य जनसमूह को ये समझ भी नहीं आता कि ये बटुक करना-कहना क्या चाहता है। फिर लंबे समय के हिसाब किताब के बाद, जैसी जैसी कैपेसिटी बटुक की होती है, निम्न, मध्यम अथवा तीव्र गति, और उसकी लाईन संसार में कितने काम की है, उसी अनुपात के हिसाब से ही धनाकर्षण होता है। उसके पहले नहीं।

ये जान लेना चाहिए कि संसार के लायक कोई बात करने पर ही धन आएगा, वरना चांस कमतर होते जाते हैं। उसका भी अलग सिस्टम अपने आप विकसित हो जाता है। सेल्फ जेनरेट सिस्टम के तौर पर उसे देखा जा सकता है। केवल आगे बढ़ते रहने की नियति होती है। मृत्यु पर्यंत तक ऐसे बटुक का जीवन वैसे ही चलता है। केवल इतना होता है कि रूटीन लाइफ से अलग होने पर अन्य जनसमूह को वो आश्चर्य देता है। जो अलग निकल है उसका पैशन अपने काम को करता जाता है।

फाइनेंशियल रहस्य वाला लेख है। तुलना किसी से भी हो सकती है। मोदी जी को ध्यान में रखकर कर लीजिए, समाज सेवक को, एक आध्यात्मिक पथ के यात्री को, किसी इनोवेटिव बिजनेसमैन को। सब जगह फिट होगा। श्री तत्व का हल्का सा रूप भी इसमें है। विदेश में तो अनेकानेक रूप से इसकी बातें होती रहती हैं। एन्जॉय…

मोदी और बदलाव

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