अपने हित के मुद्दों पर अपने और दूसरों के बाल नोचने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाते हिन्दू

गंगा स्वच्छता पर मेरे लेख पर बड़ी विचित्र प्रतिक्रियाएं आई हैं। मैं हैरान हूँ क्योंकि पूरे लेख में मैंने स्वर्गीय स्वामी सानंद जी की कोई आलोचना नहीं की। आलोचना तो तब होती जब मैं उनके बारे में कुछ जानता।

वास्तव में मैं उनके कार्यों के बारे में जानना चाह रहा था इसलिए पहले ही लिख दिया था कि लोग उनसे जुड़ी जानकारी सामने लायें और बताएं। मेरी जिज्ञासा को धृष्टता समझा गया।

दूसरी बात ये कि मोदी समर्थक होने के बावजूद पूरे लेख में मैंने सरकार की किसी भी नाकामी या उपलब्धि का उल्लेख नहीं किया फिर भी कुछ लोग मुझे सरकार का पेड एजेंट बता रहे हैं। मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं।

वेदना इस बात की है कि मैंने आज दो वरिष्ठ जनों को नाराज़ कर दिया। एक तो आदरणीय डॉ प्रदीप सिंह जी का कमेंट- “निकम्मी सरकार, बेशर्म लोग”। इस पर मैं यही कहना चाहता हूँ कि सरकार तो निकम्मी है ही इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन मैं बेशर्म कैसे हो गया?

मैं तो बेशर्म तब होता जब मैं यह लिखता कि सरकार ने फलाना काम किया है ढिकाना काम किया है। मैंने तो ऐसा कुछ उल्लेख किया नहीं। तो उस लेख को लिखने से मैं निकम्मा कैसे हुआ यह समझ में नहीं आया।

दूसरी क्षति यह हुई कि परम आदरणीय वरिष्ठ पत्रकार श्री मनमोहन शर्मा जी मुझे फेसबुक से ब्लॉक कर गए। यह क्यों हुआ समझ में नहीं आया। इसके लिए मैं अपराधबोध से ग्रसित हूँ। अस्तु।

लेख पर जितनी भी प्रतिक्रियाएं आईं उनमें एक पीड़ा आवश्यक रूप से देखी गयी। वह यह कि रासायनिक कारखानों और नालों से जो गंदगी गंगा में गिरती है वह गंगा को सर्वाधिक प्रदूषित करती है। सरकार का मुख्य कार्य इसे रोकना था जो अभी तक पूरा नहीं हो पाया है।

मूल प्रश्न यही है कि इसका निवारण कैसे होगा? इस पर चिन्तन करने से पहले यह देखना है कि गंगा की गंदगी देखकर किसको सर्वाधिक पीड़ा होती है। स्पष्ट है कि हिन्दू समाज जो नदियों को माँ की भाँति पूजता है उसे ही सर्वाधिक पीड़ा है।

परन्तु इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि हिन्दू समाज अपने हित के लिए कितना मुखर है? यहाँ मुखर होने से अभिप्राय है कि जब सरकारें नहीं सुनतीं तो आप अपना कार्य करवा लेने में कितने सक्षम हैं?

इसका उत्तर हमें वामपंथियों की शैली में देखने को मिलता है। जब भी उन्हें कोई देशहित का काम ‘रुकवाना’ होता है तब उनके संगठनों की एकता देखते ही बनती है। एक ज्वलंत उदाहरण हमारे सामने है। थुथुकुडी में Sterlite Copper इंडस्ट्री बंद करवाने के लिए उनके ग़ैर-सरकारी संगठन इतने शक्तिशाली हैं कि उन्हें न्यायालय से मन मुताबिक फैसला मिल जाता है।

अब एक पुराना उदाहरण देता हूँ। नीलगिरी की पहाड़ियों पर India-based Neutrino Observatory बनने का निर्णय आज से अठारह वर्ष पहले लिया गया था। 2009 में काँग्रेस नेता व तत्कालीन मंत्री जयराम रमेश ने पर्यावरण का हवाला देते हुए रोक लगा दी।

फिर वामपंथी खेमे ने अपनी ताकत दिखानी प्रारंभ कर दी। ढेर सारे गैर सरकारी संगठन निकल आये और विरोध करना चालू कर दिया। वैज्ञानिकों को खून के आंसू रुलाये गये। प्रोजेक्ट कोर्ट कचहरी से होता हुआ अंततः इस वर्ष environmental क्लीयरेंस पा सका है। इस पूरे कारनामे को कवर करने के लिए ‘द वायर’ को पुरस्कृत भी किया गया था। इस प्रकार भारत न्युट्रीनो रिसर्च में कई दशक पीछे हो गया। ऐसे एक नहीं अनेक मामले हैं।

प्रश्न है कि ये लोग ऐसा कैसे कर पाते हैं? ये ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि इन्होंने स्वतंत्रता के पश्चात् अपना एक पृथक ‘legal apparatus’ तैयार किया है जो जजों से लेकर वकीलों और अन्य संगठनों तक को वामपंथी एजेंडे के तहत किसी भी देश विरोधी कार्य को करने में सक्षम बनाता है। वे किसी जिहादी आतंकवादी की फांसी रुकवाने के लिए आधी रात को कोर्ट खुलवा सकते हैं।

वहीं दूसरी तरफ हिन्दू अपने हित के मुद्दों पर अपने और दूसरों के बाल नोचने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाते। यदि वामपंथी, या सरल भाषा में कहें तो अर्बन नक्सली किसी कार्य को रुकवाने के लिए उस ‘legal apparatus’ का प्रयोग कर सकते हैं तो सरकार को गंगा को स्वच्छ करने के लिए बाध्य करने हेतु हमारे पास ऐसे धुरंधर वकील क्यों नहीं हैं?

गंगा स्वच्छता का अभियान कोई आज का थोड़े है, कई दशकों पुराना है और इससे जुड़े संगठन भी। इतने वर्षों में हमारे पास ऐसे वकील और प्रचार तन्त्र क्यों नहीं है जिनके प्रयासों से जन-जन को गंगा स्वच्छता के लिए प्रेरित किया जा सके और सरकारों को बाध्य किया जा सके? इस पर विचार कीजिये।

आज ज़माना अनशन नहीं अपितु ‘इन्वेंशन’ और ‘इनोवेशन’ करने का है

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