नमामि गंगे : प्रयासों पर उंगली उठाने से पहले देखिए ज़मीन पर कार्य

मोदी सरकार को दिवंगत प्रोफेसर जी डी अग्रवाल (स्वामी सानंद) की उपेक्षा के लिए जितना भी भला-बुरा कहा जाए, कम होगा।

लेकिन अविरल गंगा के लिए मोदी सरकार के प्रयासों पर उंगली उठाने से पहले आपको ज़मीन पर कार्य देखना होगा।

मैं इस फील्ड से दिल्ली मेट्रो के माध्यम से लंबे समय तक जुड़ा रहा, दिल्ली मेट्रो के ‘ज़ीरो वेस्टेज ऑफ सीवेज वॉटर’ की मुहिम में मैं एक खास नहीं तो छोटी कड़ी ज़रूर रहा।

और 2015 में जब दिल्ली के छतरपुर स्टेशन को कंटीन्यूअस रीसाइक्लिंग के द्वारा, ट्रीटेड एसटीपी वॉटर में बीओडी, सीओडी लेवेल मेंटेन करते हुए पानी की एक-एक बूंद का पुनः इस्तेमाल करने लायक बनाते हुए, ज़ीरो वेस्टेज करने वाला पहला स्टेशन बनाया गया, तब इस मुहिम को शुरू हुए 5 साल 7 महीना हुआ था। (इस प्रोजेक्ट के बारे में कभी विस्तृत लिखूंगा)

मेरे बताने का मतलब ये है कि अगर आप गंगा सफाई के लिए गंगा घाटों और बहाव पर काम होते देखने को ही गंगा सफाई का अभियान समझते हैं तो आपको पढ़ाई की ज़रूरत है।

हरिद्वार से लेकर कानपुर और पटना तक जितने भी मुख्य औद्योगिक शहर आते हैं वहां सभी गिरने वाले गंदे नालों को लिंक करके बहुत बड़ी संख्या में हज़ारों एमएलडी की कैपेसिटी वाले एसटीपी पर काम लगभग पूरा हो चुका है।

लगभग 240 सहायक नदियां जो गंगा में मिलती हैं, उनपर गिरने वाले छोटे-छोटे नालों पर हज़ारों केएलडी की कैपेसिटी के स्लग सेपरेशन और वॉटर प्यूरिफाईंग प्लांट लगाए जा रहे हैं।

ये सब मैं सरकार के कागज़ी आंकड़ों को नही लिख रहा, बस उतना ही बता रहा हूँ जितना मेरा देखा हुआ है और जितनी मैं इस फील्ड की समझ रखता हूँ।

कुछ सवाल स्व. अग्रवाल के पुण्य आंदोलन से निकलते हैं जो इंडस्ट्री बैन और प्रोजेक्ट्स के माइग्रेशन को लेकर हैं। उन पर मैं कोई टिप्पणी करने लायक खुद को ना समझते हुए आपके स्वविवेक पर ये बताते हुए छोड़ देता हूँ कि अकेले कानपुर शहर में गंदगी के मुख्य कारक उद्योग जैसे कि केवल लेदर उद्योग के लगभग खत्म हो जाने के बावजूद भी लगभग ढाई लाख परिवारों की रोटी चलती है।

हां एक चीज़ और है, शायद अब तक इन सारे प्रोजेक्ट को पूरा कर लिया जाता पर उमा भारती जैसी निष्क्रिय मंत्री के सुपुर्द ये काम होना मां गंगा और देश का दुर्भाग्य रहा।

उनको तो चाहिए कि कानपुर के किसी लेदर कंपनी से निकलते नाले में डूब के समाधि ले लेनी चाहिए। ऐसा मैं नहीं कह रहा बल्कि ये उनका कथन था गंगा में समाधि लेने का, कि अगर वो गंगा साफ ना कर पाई, पर अब उन्हें गंगा मां नसीब नहीं होनी चाहिए ऐसा मैं सोचता हूँ।

अब नितिन गडकरी ने काम में बहुत तेजी लाई है और मैं देख रहा हूँ कि गंगा को अविरल होने में बस एक बरसात का समय और लगेगा।

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