पहले लड़कियों को उकसाया, व्हाय शुड बॉय्ज़ हैव ऑल द फन?

बात स्कूटी चलाने की थी ही नहीं, लेडीज सायकल कितनी पुरानी है क्या आप को याद नहीं?

स्कूटर भी चला लेती थी महिलाएं, स्कूटी के लिए ऐसे पोजीशन की कोई आवश्यकता नहीं थी। लेकिन लाइन catchy थी, बस उतना ‘ओके’ करने के लिए पर्याप्त होता है।

वैसे वामपंथियों ने लिबरेटेड वुमन की प्रतिमा ज़ुल्फों को हीरो वाले अंदाज़ से झटका देती सिगरेटधारी की बनाई, और दूसरे हाथ में ग्लास भी थमा दिया।

पुरुषों को दोनों से मज़ा आता था, इसलिए तो इन पर इतना खर्चा करते हैं, तो व्हाय शुड बॉय्ज़ हैव ऑल द फन?

फिर अकेले ऐसी पार्टियों में जाना जहां शराब खुलकर बहती हो, कुछ ऐसी बात जिसे दादी माँ कभी होने नहीं देती – इसलिए दादा दादी को घर से बाहर या फिर अलग कर दिया गया, पहले से ही।

कोटा में पढ़ते लड़के जब दबाव असह्य हो जाने पर आत्महत्या कर लेते हैं तो माँ बाप को दोष दिया जाता है कि अपने अधूरे सपने बच्चों पर थोप रहे हैं। लेकिन अब जब भारत भर जहां देखो #MeToo विस्फोट हो रहा है, कोई यह क्यों नहीं पूछ रहा कि इस आग का ईंधन किसकी महत्वाकांक्षा थी?

विश्व में प्रगति, महत्वाकांक्षा की ही उपलब्धि रही है किन्तु विवेकहीन महत्वाकांक्षा या फिर मरीचिकाओं का पीछा करना व्यक्ति का विनाश ही कर देता है।

अगर हम समझ लें कि योगेश्वर कृष्ण ने कर्म को लेकर क्या कहा है – हमें कोई काम में उचाट नहीं लगता, कोई काम अरुचिकर नहीं प्रतीत होता, कोई भी काम अयोग्य या हल्का नहीं लगता – सब कर्तव्य है, अपने आप को अपने काम में झोंक दो और जो मुकाम ज़िंदगी देती है उसका आनंद उठाओ।

योग्यता से अधिक पाने के लिए आप दुनिया से चालाकी करोगे, दुनिया भी आप को उसी तरह मरोड़ेगी, और आप बुरी तरह आहत होकर गिर पड़ोगे। निसर्ग कभी एक पलड़ा भारी नहीं होने देता, कहीं न कहीं किसी तरह सम-तुला हो जाती है। कर्म से अधिक चाहते हो तो कुछ अधिक का भोग देना होगा।

भाग्य, कर्मफल और संतोष की संकल्पनाएं कोरे शब्द नहीं थे। ज़िंदगी उनके कारण सुसह्य हो जाती थी। सुरक्षित भी।

– भावानुवाद

ME TOO : क्या हम इसके दीर्घकालीन प्रभावों के लिए तैयार हैं?

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