Me Too : खाई-पी-अघाई हुई औरतें ही आज पीड़ित बनकर दे रहीं दुहाई

प्रतीकात्मक चित्र

अगर आपके साथ सच में ज़बरदस्ती होती है तो आपको तुरंत इसका विरोध करना चाहिए।

इसका सबसे अच्छा उदाहरण तरुण तेजपाल का केस है, जिसमें पीड़ित लड़की ने फौरन एक्शन लिया।

उस लड़की ने एक बार भी यह नहीं सोचा कि तरुण तेजपाल के खिलाफ गयी तो कहीं उसका कैरियर न चौपट हो जाये। उसने नहीं सोचा कि चलो आज एक बार ‘समझौता’ कर लूं, और कोई दमदार पोस्ट पा लूं।

बिना पिता की उस लड़की पर (जो कि तरुण तेजपाल को ही पिता मानती थी) कई तरह से दबाव डाला गया केस वापस लेने का, पर वो लड़की अपने साथ हुई ऐसी बेहूदा हरकत से आहत थी, उसने सीधे एक्शन लिया और आज तक अपने बयान पर कायम है।

कोर्ट, मीडिया, समाज सब उसके साथ हैं। बावजूद इसके वो लड़की इस कथित ‘मी टू’ मुहिम में अब तक शामिल नहीं हुई क्योंकि यह आंदोलन ही फ़र्ज़ी है।

दूसरों की कृपा पर खाई-पी-अघाई हुई औरतें ही आज पीड़ित बनकर दुहाई दे रही हैं। जब लगा कि आत्मसम्मान से समझौता करके कुछ बड़ा हासिल कर सकते हैं, तब समझौता कर लिया और अब सब कमा लिया – जुटा लिया तो विक्टिम बन गए?

जिसे आज ये ‘मर्दवादी’ मानसिकता कहकर कोस रही हैं उसी मर्दवादी मानसिकता से ये लोग 15 – 20 वर्षो से समझौता कर अपना उल्लू सीधा कर रही थी। इनमें से बहुतेरी तो ऐसी हैं जो अब खुद ऐसे शोषक केंद्रों की आका बनकर बैठी हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में आगे आने वाली नई लड़कियों को गोलमोल बातें करके अपने गिरोह में जोड़ती है।

ऐसे बीमार, मनोरोगी, सेक्स कुंठित, द्विअर्थी संवाद करने वाले लोग हर जगह हैं, हर प्रोफेशन में हैं। चिकित्सा, व्यापार, विज्ञान, कला, साहित्य सब जगह। लेकिन कुछ अवसरवादी महिलाओं द्वारा ऐसे लोगों की कुंठाओं से समझौता करना, अपना काम निकालना, मोटा माल बनाना और फिर खुद पीड़ित बन जाना, यह ऐसा गोलमाल है जिसमें चित भी इनकी और पट्ट भी इनकी।

यह सच है कि सभी महिलाओं को जीवन मे सैकड़ों बार ऐसी ओछी हरकतों को झेलना पड़ता है, लेकिन यह भी सच है कि बावजूद इसके महिलाओं का एक बड़ा तबका इन हरकतों को नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ जाता है या अपने ही तरीके से ऐसे उच्चकों को सबक सिखा देता है, भले ही फिर बाकी जीवन इन्हें संघर्ष से बिताना पड़े…

लेकिन एक वर्ग उन महिलाओं का भी है जो बड़े बिंदास अंदाज़ में ‘सब चलता है’ कह कर सब सहती हुई, ताकतवर-कद्दावर मर्दों का हाथ थाम आगे बढ़ जाती हैं, और अपने लेखों-कविताओं-फिल्मों के माध्यम से दुनिया भर में स्त्री की आज़ादी और संबंधों की उन्मुक्तता पर ज्ञान बांटती है।

हम स्त्रियों में यह विशेष गुण होता है कि किसी पुरूष से महज बातचीत करके ही हमें सही या गलत भाव का एहसास हो जाता है, अगर फिर भी कहीं दुविधा है (क्योंकि कुछ लोग द्विअर्थी संवाद करते हैं) तो अपने से बड़ों से बात कीजिये।

जब आप गलत नहीं है तो डरना क्या? लेकिन सब कुछ जानते हुए भी अपना त्वरित फायदा देखकर जीवन भर समझौता करते जाना, ऐसे शोषक-उत्पीड़क गिरोह का हिस्सा बन पुरस्कार, सम्मान सब बटोर लेना और फिर अबला नारी बनकर विलाप करना… ये नहीं चलेगा।

ऐसी अवसरवादी स्वघोषित पीड़िताओं के लिए वर्ष 1954 में आई फ़िल्म ‘आर-पार’ के एक गीत की चन्द पंक्तियां मेरी तरफ से पेश ए ख़िदमत है –

शिकायत कर लो, जी भर लो, अजी किसने रोका है
हो सके तो दुनिया छोड़ दो, दुनिया भी धोखा है

अपनी सुविधा से ‘चलता है’ कहकर समझौता कर लिया, अपनी सुविधा से बन गए पीड़ित!

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