ME TOO : क्या हम इसके दीर्घकालीन प्रभावों के लिए तैयार हैं?

ढेरों बातें आती हैं मन में। हर बार उंगलियाँ उठती हैं, पर फिर मिटा देती हूँ।

पता नहीं क्यों, लेकिन कभी कभी लगने लगता है कि लोग जानबूझ कर अंधे और बहरे बन रहे और ऐसे में कुछ भी कहना बेकार है।

फिर भी,

आज पिछले कुछ दिनों से हर तरफ यह #me_too वाली जो हवा चल रही है – उसे देख कर मुझे वाकई बहुत आश्चर्य होता है। हँसी भी आती है क्योंकि जो कहानियाँ, जिन लॉजिक के साथ सामने आ रही हैं, वे न केवल स्त्रियों को बेवकूफ और कमज़ोर ठहराती हैं बल्कि “भेड़िया आया” वाली कहानी की याद दिलाती हैं… और सबसे अफसोसजनक बात यह कि निर्भया कांड जैसी घृणित और क्रूर घटनाओं को बेहद आम बना देती हैं !!

पढ़ी-लिखी आधुनिक सोच-विचार-चलन और जीवन में विश्वास करने वाली स्त्रियाँ कब से इतनी कमज़ोर हो गईं कि गलत को इतने समय तक स्वीकार करती रहीं और चुप रहीं?

मैंने अपने जीवन में अपने आसपास ऐसी लड़कियाँ बहुत कम देखी हैं, जो गलत को होठ सिले स्वीकार करती हों। यहाँ तक कि मेरी सहायिका भी ऐसी नहीं, जिसके कारण उसकी पिटाई होती है और वह प्रत्युत्तर में पीटती है! कहने का तात्पर्य यह कि अनपढ़ गरीब तक नहीं चुप रहती यहाँ तो!

मेरे घर में माँ का कठोर अनुशासन रहा। बचपन भरपूर बचपन रहा, जहाँ एक बड़ा संयुक्त परिवार था। दादा दादी, 4 चाचा चाची और उनके बच्चे। बकायदे पेड़ पर चढ़ना, खेत और बगीचा घूमना, उछल-कूद-पिटाई सब मिली। पूरे गाँव के अभिभावकों का प्रचुर स्नेह और आशीर्वाद मिला। लेकिन वह सब कभी न हुआ, जो अब सुनने में आता है।

बाद में ‘बड़े होने’ पर पुरुषों से एक निश्चित दूरी सदैव रही, माँ की कड़क निगहबानी में। पिता जी के मित्र हों या भाई जी के, नमस्ते और औपचारिकताओं के बाद सामने से हटा दिया जाता। धीरे धीरे जब समझ आई तो माँ ने इशारे में बहुत कुछ बताया।

कॉलेज और बाद के ज़माने में सिनेमा हॉल में बदतमीजी की हालत में सेफ्टीपिन का प्रयोग किया। मुक्के और लात भी आवश्यकता पर चले हैं और घुटनों का सदुपयोग भी हुआ है।

और यह सब सदैव अपने लिए नहीं, अपने झुंड के लिए और कई बार तो अनजान लड़की के लिए किया है। लेकिन कभी भी चुप नहीं रही।

माँ ने कायर नहीं बनाया था मुझे। वह माँ, जो बस रामायण पढ़ लेती थीं और थोड़ा लिख लेती थीं, मेरे विचार से अपने युग से बहुत आगे थीं। यही कारण है कि मैं यह 10-20-40 वर्ष पुराने घाव का आज हठात् एकसाथ बजबजा कर बह निकलने वाली बात नहीं स्वीकार कर पा रही हूँ।

मेरे लिए यह ठीक ‘पुरस्कार लौटाओ’ जैसा राजनीति से प्रेरित एक प्रायोजित campaign है। संभव है कि कुछ घटनाएँ सही हों। लेकिन अफसोस कि वह इस भेड़चाल में कहीं बिसर जाएँगी।

चुनाव तो अगले वर्ष हो जाएँगे। साथ ही इस ड्रामे का भी समापन हो जाएगा। लेकिन स्त्रियों की सुरक्षा और आम समाज में हमारे प्रति उनका दृष्टिकोण एवं मानसिकता पर जो असर पड़ेगा – वह लंबे समय तक चलेगा…

क्या हम उसके लिए तैयार हैं?

ME TOO : बिना तैयारी के यह ओढ़ी हुई आधुनिकता बहुत भारी पड़ गई

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