बेटा बच्चन ना बन जईबा… बच्चन तो बस हो जाया करते हैं

1991-92 की बात है। पटना में कोई फिल्म देख रहा था, नाम याद नहीं। उस फिल्म में सुदेश बेरी ने अमिताभ की भरपूर नकल की है, जो कि वो करते रहे हैं। उनकी ऊब भरी नकल से परेशान होकर पीछे बैठे एक सज्जन पूरा पटनिया तेवर में बोल पड़े…. बच्चन ना बन जइबा…! बच्चन नहीं बन जाओगे चाहे कितनी ही नकल कर लो !

सच है कि कोई बच्चन नहीं बन सकता। बन सकना संभव भी नहीं है क्योंकि बच्चन बस हो गया। एक बार हुआ, दुबारा न होगा। लड़कपन में दीवार फिल्म देखते हुए जब पहली बार ये डायलॉग सुना… रहीम चाचा, जो पच्चीस साल में नहीं हुआ वो अब होगा.. अगले हफ्ते एक और कुली मवालियों को पैसे देने से इन्कार करने वाला है ! पिछले देखे,सुने सारे डायलॉग और सितारे बुझ गए। अमिताभ खोपड़ी में घुस बैठे। फिर उसी फिल्म का अमर डायलॉग… मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता… सुन कर लगा जैसे स्टार का दूसरा नाम बच्चन है। अभी भी लिखते हुए लोमहर्षक भाव हैं।

अमिताभ एक नैचुरली स्टाइलिश स्टार हैं। वो कोई उल्टे सीधे स्टाइल नहीं मारते बल्कि स्टाइल उनकी वेशभूषा है। उनके पर्सोना में प्रविष्ट! इसलिए वो स्टाइल कभी समाप्त नहीं होती। पचहत्तर साल में भी जलवा जारी है।

मुझे याद है सत्तर के दशक में जब अमिताभ सुपरस्टारडम का आनंद ले रहे थे और ऋषि दा जैसे निर्देशक उनकी इस भूमिका से खुश नहीं थे तब उन्होंने क्षुब्ध होकर कहा था कि अमिताभ जैसे बेजोड़ कलाकार को टाइपकास्ट कर के खत्म कर देना आपराधिक अन्याय है! अमिताभ इस देश के चोटी के निर्देशकों की सूची में हमेशा रहे। सत्यजित राय से लेकर अडूर गोपालाकृष्णऩ तक ने उन्हें महानतम अभिनेताओं की सूची में रखा।

तेलुगु हीरो नागार्जुन ने एक बार कहा था कि डॉन में अमिताभ जिस सन्नाटे के साथ एक टपोरी बच्चन से गर्वीले डॉन में कायांतरण करते हैं वो अनन्य है, हैरान करता है। और सच भी यही है कि अमिताभ की घटिया फिल्मों में भी कई सारे दृश्यों में वो कुछ ऐसा दे गए हैं जो किसी और स्टार से संभव न था।

सौदागर फिल्म में गुड़ बेचने वाला बच्चन, जिसके चेहरे पर नूतन को अपने मकसद से हासिल करने का काईयांपन है और दीवार का डॉन, स्मगलर बच्चन जो अंडर वर्ल्ड के सामंत को लिफ्ट में अपने पांवों की धृष्टता से चुनौती देता है, दोनों में कोई मेल है क्या? दीवार और त्रिशूल का निर्मोही मर्द कभी कभी में कोमल कविताएं सुनाता है। उसे जैसे इस जीवन की क्षणभंगुरता का भान है, उसकी आंखों में देख लीजिए।

न जाने कितने ही किरदार, कितनी फिल्मों में अमिताभ की याद दिलाते हैं। लेकिन अस्सी के मध्य से नब्बे के उत्तरार्ध तक अमिताभ अपने ही बनाए लोक से लोहा लेते रहे। वो उऩके दौर का सबसे कठोर और घटिया समय था, जब उन्होंने सड़ी फिल्में की, रद्दी अभिनय किया, जैसे कोई हठी अभिनेता यह मानने को तैयार न हो कि अब लोग तुम्हें किसी तूफान और जादूगर के रूप में नहीं देख सकते।

लेकिन अमिताभ तो यथा नाम हैं ! उन्होंने अपने विवेक से दूसरा जन्म लिया। जो अमिताभ एंग्री यंग मैन बन कर हमारी युवा रगों में घुस चुका था वो इस बार हर उम्र में घुसपैठ कर बैठा। बच्चे, बूढ़े और जवान..!

अमिताभ ने उम्र के निविड़ विपिन को पार कर लिया है। आज जब कभी वकील बन कर, कभी कब्ज का मारा पीकू बंगाली बनकर और कभी सरकार बन कर उन्हें परदे पर उतरते देखता हूं तो यकीन हो जाता है कि बच्चन ने अभिनय और आतिशबाजी के बीच क्या गजब का तालमेल बिठाया है। वो दिलीप कुमार से लेते हुए उनसे बहुत आगे निकल जाते हैं। उनमें संजीव कुमार जैसे नैचुरल एक्टर से अपने अंदाज में लोहा लेने का माद्दा है। वो एक साथ देश की श्रेष्ठ आवाज़ का मालिक हो सकता है और उसी आवाज़ से कमाल करते हुए कह सकता है कि… अब कमाने का तो ये है मौसी कि आदमी हर बार जीत नहीं सकता ना.. कभी कभी हार भी जाता है…!

आज जब अमिताभ को केबीसी में देखता हूं तो उनके प्रत्युत्पन्नमतित्व, देसी इलाहाबादी रंग और साधारण से साधारण इंसान के साथ साधारण बन जाने की असाधारणता से दंग रह जाता हूं। यही बात उन्हें भारतीय सिनेमा का महानायक बनाती है। अमिताभ अमिताभ होकर भी अमिताभ के केंचुल में नहीं होते। ये परित्यक्त पूर्णता है जो उन जैसे अनन्य प्रोफेश्नल में ही आ सकती है। ऐसा प्रोफेश्नल जो रात को दो बजे शूटिंग खत्म कर सुबह के तय शूटिंग समय यानी पांच बजे के लिए चार बज कर पचास मिनट पर सेट पर तैयार मिलता है। न कोई शिकायत, न कोई फऱमाइश। एक छोटा सा निर्देशक जो कहे वो सुनता है। बच्चन बनने के लिए बहुत तपाना पड़ता है। ऐसे नहीं बनते बच्चन। इसीलिए कहते हैं बेटा बच्चन ना बन जईबा…

‘अमीता’ बच्चन! : नाम ही काफी है… हांय!

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