ME TOO : बिना तैयारी के यह ओढ़ी हुई आधुनिकता बहुत भारी पड़ गई

ऊँट बैल का साथ हुआ है,
कुत्ता पकड़े हुए जुआ है ।

यह संसार सभी बदला है
फिर भी नीर वही गदला है,
जिससे सिंचकर ठण्डा हो तन,
उस चित-जल का नहीं सुआ है …

– सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

सत्तर के शरुआती वर्षों का एक वीडियो है। बंबई में फिल्मफेयर पुरस्कार की शाम है । बड़ी हलचल है । सभागार के बाहर राजकपूर और दिलीप कुमार जैसे अभिनेता तारक तारिकाओं का स्वागत कर रहे हैं । समारोह में आने वाली सभी चोटी की अभिनेत्रियों ने बड़ी ही शालीनता से साड़ियां पहन रखी हैं । ऐसा लग रहा है जैसे किसी संभ्रांत, अमीर परिवार में किसी की शादी हो रही है । लोग आ रहे हैं । कहीं से कोई मिनि स्कर्ट.. और क्लिवेज दिखाने वाली नहीं हैं । मैंने दो तीन साल पहले जब यह वीडियो देखा था, तब कुछ देर तक विचलित रहा कि हम कहां आ गए हैं ।

ना ना.. साहब मुझे ग़लत न समझिएगा ! मैं किसी आधुनिक वस्त्र पहनने वाली लड़की या अभिनेत्री का विरोध नहीं कर रहा । सबका अपना लोकतंत्र है । परंतु, मैं यह दृढ़ता से मानता हूं कि जिस आधुनिकता को हमारे शहरी समाज ने ओढ़ रखा है, उसकी तैयारी यहां नहीं है । वह उन्मुक्तता नहीं है । जो भारतीय जीवनशैली या परंपरा में खुलापन था वह आक्रांताओं के आंतक से नष्ट हो गया । हमने घूँघट और पर्दा ओढ़ना शुरू कर दिया और फिर एक दिन अचानक धड़ाम से बिकिनी पर आ गए ।

आधुनिकता का यह अंग्रेजी अंधड़ बहुत कुछ उड़ा कर ले गया । जैसे बाढ़ से आप्लावित गंदी नदी का प्रवाह भी धवल दीखने लगता है पर नीचे तो गाद ही बहती है, वैसे ही बिना तैयारी के, बिना क्रमिक विकास के, यह ओढ़ी हुई आधुनिकता बहुत भारी पड़ गई ।

जब सार्वजनिक रूप से रणवीर सिंह कुत्ते की तरह पोज़ देते हैं और करण जौहर माइक संभाल कर कहते हैं कि नो नो रणवीर… दैट इज़ माइ पोजिशन.. तब वहां बैठी हीरोइनें मुग्ध होकर ताली बजाती हैं लेकिन उसी हॉल में बैठे पचासों मर्द मानते हैं कि अगर यह परिहास स्वीकार्य है तो छू लेना.. जबरदस्ती करना भी तो स्वीकार्य होगा!

खैर… सिनेमा जो कभी मेहनतकश, ईमानदार और पढ़े लिखों का क्षेत्र था, अब वह लुच्चों, बिल्डरों, धनाड्य वर्ग का ऐशगाह बना हुआ है । उसके पास दौलत थी। उसने सोचा कि हर चीज अब उसकी ज़द में है । वह जिस्म खऱीद सकता है, वह जिस्म मसल सकता है । नंगी लड़कियों को नचा सकता है । पश्चिम की भौंडी नकल में अत्यंत घटिया और विकृत सेक्स सीन्स दिखला सकता है । आखिर क्यों न दिखलाए.. देखो तो सही खजुराहो के मंदिरों में क्या उत्कीर्ण है !! उन्मुक्त होना है तो कुत्ता और कुतिया हो जाओ… क्या फर्क पड़ता है !

हिन्दी सिनेमा पर पहले बंगाल और पंजाब के लोगों को एकाधिकार था । और दोनों ही प्रांतों से आने वाले निर्माता निर्देशक पढ़े लिखे संवेदनशील थे । धीरे-धीरे बंगाल का पतन हो गया, पंजाब हावी होता गया । उनकी दूसरी तीसरी पीढियां यहां प्रविष्ट हुईं, जिनके पास कलात्मक दृष्टि नहीं थी ना ही सिनेमा का एस्थेटिक्स था, लेकिन ऐश्वर्य बहुत था, मद था, दिखावे की सनक थी । उसने मान लिया था कि सिनेमा तो वही बनाएगा । अब हीराइनें भी मुक्त हुईं.. उन्हें मुक्त किया गया । सफलता की चाह में काम करने वाली महत्वाकांक्षी नायिकाओं ने समझौते भी किए। चंद ने ही किए लेकिन पुरुषवादी वर्चस्व ने सबको समेटा । जिसे जब जो हाथ आया, उसे ही दबोचने की दौड़ शुरू हो गई ।

एक तरफ आधुनिकता का स्वांग, दूसरी और यौन कुंठा का कुआं । मैंने दो तीन दिन पहले भी लिखा था कि लड़कियां तो भोगने और पीटने की वस्तु हैं । हमारे ही दफ्तर में बॉस ने उनकी पीठ पर हाथ रख दिया तो क्या हुआ भई.. अरे समय बदल गया है ! अब तो वो गाल छूकर क्यूटी क्यूटी भी कर सकते हैं और कार से घर छोड़ते हुए कुछ प्रस्ताव भी रख सकते हैं । इंटर्नशिप करने आई छोटी लड़कियों को फांसने के लिए अपने शराबी चिल्लर चेलों को छोड़़ सकते हैं ।

आश्चर्य है कि अब तक ये स्त्रियां चुप रहीं । मैंने काम करते हुए न जाने कितनी ही बार अपने मित्रों से चर्चा की थी कि साला एक कंटाप जड़ दे तो ठरकपने का सारा भूत हरहरा कर बह जाय। मगर वे चुप रहीं, क्यों चुप रहीं, मेरी समझ से बाहर की बात है । यहां भय या नौकरी जाने का खतरा रहा हो.. परंतु संगठित रूप से कुछ करने की ज़रूरत तो पहले से ही थी ।

अब शुरुआत हुई है तो खुल कर हो । मैं यह मानता हूं कि परिहास और स्वस्थ हास्य की एक सीमा होनी चाहिए । अगर आप सबकुछ स्वीकार कर सकती हैं, तो फिर उत्पीड़न झेलने के लिए भी तैयार रहिए । अन्यथा, वहीं रोक दीजिए जहां पुरुष साथी सीमा लांघ रहा है । एक कठोर दृष्टि ही बहुत है । पुरुषों का मन स्त्रियों का दास होता है । वह दुबारा आगे बढ़ने से पहले कई बार विचार करेगा । मैं सेक्शुअली पागल और विक्षिप्त लोगों को इस दायरे से बाहर रखता हूं…

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