ME TOO : बन्द कीजिये पुरुषों और स्त्रियों के बीच अविश्वास फैलाने की यह युक्ति

दो चार Me Too वास्तविक होंगे, पर अधिकतर Me Too के आगे स्वतः ही stupid आ जाता है पढ़ने और सोचने में…

यौनाकर्षण एक सहज और स्वाभाविक स्वभाव है। 18-20 वर्ष पहले एक व्यक्ति जो भी होता है अथवा था, वह इतने वर्षों बाद पहले जैसा तो निश्चित रूप से नहीं होगा।

एक पुरुष की समझ स्त्री जैसी नहीं हो सकती। हम समलिंगियों, अपराधियों, चोरों, पढ़ने में मन नहीं लगाने वाले विद्यार्थियों, आतंकियों, देशद्रोहियों, जातिवादियों तक का मनोविज्ञान समझने का प्रयास कर सकते हैं तो एक पुरुष का क्यों नहीं?

कई बार मेरा अवलोकन कहता है कि हम स्त्रियां जिसे दुराचार समझती हैं वह पुरुषों के लिये बहुत सामान्य होता है, इतना कि वे आश्चर्यचकित हो जाते हैं कि इसमें इतना गलत क्या था?

उनको समझने के साथ आपको उन्हें समझाना भी आना चाहिये।

एक बार एक सम्बन्धी जो सम्बन्ध में भाई लगता था मुझसे लगभग 6-7 वर्ष छोटा था, मुझे ऐसे स्पर्श किया कि मैं सन्न रह गयी। सम्भवतः 20-22 वर्ष की मेरी आयु रही होगी।

मैंने अगले दिन उससे केवल इतना ही कहा कि अगर तुम्हारी माँ जितनी आयु में मेरा विवाह हो गया होता तो तुमसे थोड़ा ही छोटा मेरा भी पुत्र होता। तुम भाई हो पर बेटे जैसे ही तो हो, स्पर्श कर लिया तो ठीक, पर क्या अपनी माँ को भी ऐसे ही कर पाओगे?

उस दिन भरे गले से क्षमा मांगने के पश्चात से ले कर आज तक उसने मेरी ओर कुदृष्टि तो नहीं ही डाली, उसके बाद वह मेरा बहुत अच्छा मित्र भी सिद्ध हुआ।

उसने हृदय से क्षमा मांगी और मैंने हृदय से क्षमा कर दिया।

(इस घटना के संदर्भ में परिहास मत कीजियेगा)

तो पुरुषों के बीच में प्रथमतः तो अपनी सीमाएं अपने हाव भाव से पहले ही प्रकट कर देने चाहिये और यदि फिर भी वे सीमा का उल्लंघन करें तो उनकी माँ बहन का परिचय तुरन्त माँगने का साहस आप में होना चाहिये।

18-20 वर्ष की आयु तक लगभग प्रत्येक युवती ऐसे दुराचारों की सरल आखेट होती है। और ऐसे विषयों पर यदि वह अपने माता पिता से बात नहीं कर सकती, तो युवती के उस दुराचारी के बराबर का दोष उसके माता पिता का भी है। उन्हें बराबर का दण्ड मिलना चाहिये।

और इस आयु वय के पश्चात स्वयं पर कुदृष्टि डालने वाले की आंखें तुरन्त नोच लेने का आपमें यदि साहस नहीं है, तो दोषी आप भी हैं। ऐसी हर घटना के पश्चात और कुछ नहीं तो दो झापड़ आपको भी मिलने चाहिये।

प्रत्येक विषय के लिये न्यूनतम एक सूत्र तो समान है। यदि शक्ति चाहिये तो श्रम करना पड़ेगा और यदि अधिकार चाहिये तो कर्तव्य निभाने पड़ेंगे।

आप शक्ति मांग रही हैं तो आपने आरम्भ ही गलत कर दिया।

शक्ति अर्जन कीजिये। प्रतिउत्तर तुरन्त हो अथवा आगे के लिये सीख सीखिये।

गड़े मुर्दे मत उखाड़िये। पुराने प्रेम पत्र लहराने से जैसे प्रेम वापस नहीं आता वैसे ही पुरानी त्रुटियां स्मृत कराने से उस अपराध का परिमार्जन नहीं होगा।

बन्द कीजिये पुरुषों और स्त्रियों के बीच अविश्वास फैलाने की यह युक्ति!

पुराने इतिहास से कुछ न सीख कर उस में बस गोते लगाते रहना एक मानसिक रोग भर है।

हाँ, आप मोदी सरकार और मोदी भक्तों के इस समय में यह विश्वास रखती हैं कि आपके अपराधी को दण्ड मिलेगा तो यह अच्छी बात है परन्तु इससे आपको न्याय नहीं मिलेगा।

ज्योति अवस्थी

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