गांधी : सामान्य व्यक्ति के चारों ओर गढ़ा असामान्य ऑरा

भारत, जो कभी नित नए विचारों को जन्म देता था और संसार को हिला देता था। ऐसे विचार जो किताबों पर नहीं आचरण की कर्मभूमि पर लिखे जाते थे।

कभी आया था राम का ‘लोकोन्मुखी राजत्व’ का सिद्धांत जिसे आज तक बुद्धिजीवी समझने की क्षमता तक अर्जित नहीं कर पाए।

कृष्ण का ‘निष्काम कर्म सिद्धांत’ जिसे तथाकथित विद्वान ‘कर्म करो और फल ईश्वर पर छोड़ दो’ कहकर मूर्खतापूर्ण ढंग से परिभाषित करते हैं।

फिर आये तथागत और महावीर जिन्होंने दिया ‘अहिंसा’ का महासिद्धांत जिसकी मनमानी व्याख्या की बीसवीं शताब्दी के भारत के एक औसत बुद्धि के अड़ियल, ज़िद्दी आदमी ने और उस युग के लाखों मासूम इंसानों की ज़िंदगी नर्क से बदतर बन गई।

ठीक वैसे ही जैसे भारतीयों द्वारा आचरण व कर्म की श्रेष्ठता के आधार पर दिये गए ‘आर्यत्व’ के सिद्धान्तों की मनमानी ‘नस्लवादी व्याख्या’ की इसी युग में यूरोप के एक अड़ियल, ज़िद्दी और हिंसक व्यक्ति ने और उधर भी लाखों मासूमों की ज़िंदगी नर्क से बदतर बन गयी।

भारत के इस ज़िद्दी, अड़ियल और अहंकारी व्यक्ति का नाम था मोहनदास करमचंद गांधी और यूरोप के इस अड़ियल अहंकारी व्यक्ति का नाम था, एडोल्फ हिटलर।

एक और ज़बरदस्त साम्य था दोनों में। दोनों की वह छवि गढ़ी गई जो कि वे थे ही नहीं।

हिटलर की छवि गढ़ने वाला व्यक्ति था ‘गोएबल्स’ और गांधी की छवि गढ़ी ब्रिटिश सरकार ने।

हिटलर को आर्थिक व राजनीतिक संरक्षण दिया जर्मनी के पूंजीपतियों व पूर्व सैनिक अधिकारियों ने, जबकि गांधी को राजनीतिक व सुरक्षात्मक संरक्षण दिया ब्रिटिशों ने व आर्थिक संरक्षण दिया भारतीय पूंजीपतियों ने।

भारत में ब्रिटिशों के सबसे बड़े पपेट (कठपुतली) गोपालकृष्ण गोखले के बाद ब्रिटिशों ने अपना दाँव दक्षिण अफ्रीका के इस प्रतिशोधी वकील पर लगाया। ज़रा सोचकर देखिये कैसे गाँधी को चुनौती देने वाले सारे शख्स रहस्यमय तरीके से या तो मर गए या अप्रासंगिक कर दिये गए।

लोकमान्य तिलक, भगत सिंह, नेताजी सुभाषचंद्र बोस और फिर स्वयं सरदार पटेल… लिस्ट बहुत लंबी है।

आप क्या सोचते हैं कि भगतसिंह को सॉन्डर्स वध के लिये फांसी दी गई? अगर आप ऐसा सोचते हैं तो आप वाकई क्यूट हैं।

नेताजी को मरने की कगार तक पहुंचा देने वाली जेल और अंडमान में सावरकर को पागल तक कर देने वाली यातना भरी सज़ा देने वाली ब्रिटिश सरकार गांधी को जेल में मस्त सुविधाओं के बीच नज़रबंद करती थी। क्यो? अगर वो ब्रिटिश साम्राज्य के लिए इतना बड़ा खतरा थे तो उन्हें क्यों नहीं कठोर कारावास दिया गया। ज़ाहिर है, ‘अपने सबसे कीमती पपेट’ को ब्रिटिश सरकार क्योंकर हलाल करती?

स्पष्ट है कि गांधी को आइकॉन बनाया गया और उस युग के सभी नेता उनकी मास लीडिंग क्वालिटी से प्रभावित थे और बाद के सारे लोग ‘मिथकीय प्रभाव’ से।

तथाकथित वैश्विक हस्तियों यथा आइंस्टीन, मार्टिन लूथर किंग, रतन टाटा आदि में से कोई भी वह आम शरणार्थी नहीं था जिसे उसके मासूम और बीमार बच्चों और बूढ़े माँ बाप सहित गांधी के आदेश पर पुलिस द्वारा भरी बरसात में निकालकर खड़ा कर दिया।

इन वैश्विक शख्सियतों में से कोई भी ऐसा नहीं था जिसने गांधी के तथाकथित ‘बहादुर मोपलाओं’ द्वारा अपने बच्चों के कटते गले और अपनी बहनों के साथ सामूहिक बलात्कार होते देखे हों।

इन वैश्विक महापुरुषों ने गांधी के बारे में वही पढ़ा और जाना, जो उन्हें पहले ब्रिटिश सरकार ने और बाद में नेहरूवियन प्रोपोगेन्डिस्ट ने पढ़ाया।

इसी श्रेणी में है तथाकथित महान बुद्धिजीवी रामचंद्र गुहा जो इस परंपरा को जारी रखते हुए भारी भरकम ग्रंथों में वो सबकुछ विश्लेषित कर रहे हैं जो खुद कभी गांधी ने भी ना सोचा हो।

और बेचारे आरएसएस और भाजपाई नेता अपनी ‘सर्वस्वीकार्य और सर्वसमावेशी छवि’ गढ़ने के लिए जब गांधी का गुणगान करते हैं तो रैगिंग के शिकार हुए उस निरीह छात्र की सी छवि उभरती है जो खिसियानी हँसी हंसता हुआ अपनी बेसुरी आवाज़ में भौंडा सा गाना गा रहा हो। खैर…

मुझे कोई बस ये समझा दे कि गांधी का कौन सा सिद्धांत मौलिक या क्रांतिकारी था जिसके लिये मुझे उनका एहसानमंद होना चाहिये?

अहिंसा को गांधी ने क्या महावीर और बुद्ध से ज़्यादा पालन किया?

अपरिग्रह का पालन क्या ब्राह्मणों से ज्यादा किसी ने किया?

ब्रह्मचर्य पालन के लिए लोग हनुमान की ओर देखें या गांधी के तथाकथित ‘ब्रह्मचर्य के प्रयोगों’ की ओर?

अब बात करें ग्रामीण भारत के विकास की… तो क्या गुरुकुलों की स्थापना को गांधी सहमत होते?

स्पष्ट है इस सामान्य इंसान के चारों ओर एक असामान्य ‘ऑरा’ रचा गया जिसकी गिरफ्त में आज भी कई लोग आ जाते हैं।

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