लड़की तो पीटने और भोगने की ही वस्तु है…!

बिहार के सुपौल में विचित्र घटना हुई है। स्कूल की दीवार पर अशिष्ट टिप्पणियों का विरोध करने वाली स्कूली छात्राओं ने जब कुछ छात्रों को पीटा तो उनके अभिभावक और ग्रामीण स्कूल पहुंच गए। उन्होंने मिलकर स्कूली लड़कियों को धुन दिया।

बिहार में समाजवाद चलता है। लड़के अगर अभद्रता करते हैं और बेहूदी फब्तियां कसते हैं तो क्या..? यह तो सर्वसिद्ध, सर्वकालिक पुरुष अधिकार है कि वे लड़कियों पर टिप्पणियां करें!.. उन्हें घूरें.!! दबोच लें.. मसल डालें! यह तो उनके मूड की बात है ना। उनके कपड़ों पर लड़कों की निगाह हो। वे क्या पहनें, क्या न पहनें, यह तय करना भी उनका ही तो काम है।

बिहार की घटना इतना बताने के लिए पर्याप्त है कि आम तौर पर हम लड़कियों या स्त्रियों के बारे में क्या सोचते हैं। इन दिनों यौन उत्पीड़न का मामला गर्म है। सिनेमा से लेकर समाज तक। तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर को कटघरे में खड़ा कर दिया है, और अब कई पुराने जिन्न निकल रहे हैं।

ऐसा लगता है जैसा कोई सड़ा हुआ फफोला फूट गया है, मवाद बह रहा है। क्योंकि आपसी सहमति से कई स्त्रियों के साथ सोने वाला पुरुष पुरुषार्थी, हैंडसम हंक, कैसेनोवा, ग़ज़ब का स्मार्ट माना जाता है..!! लेकिन सहमति से अलग अलग पुरुषों के साथ सोने वाली स्त्री रंडी शब्द से विभूषित होती है। सीधे कहो तो यह, कि साली देती फिरती है…!

ध्यान रहे कि सेक्स को लेकर किसी का मन पढ़ना असंभव है। कोई ऐक्टर राष्ट्रवादी या देशभक्त है तो जरूरी नहीं है कि वह यौन कुंठित नहीं होगा या उसने अभद्रता नहीं की होगी। यहां तो बड़े सिद्धों का धैर्य छुटते देखा है तो सितारे कौन हैं!!..लेकिन मैं इस घटना को सिर्फ गलतफ़हमी या पब्लिसिटी स्टंट मानने से इन्कार भी नहीं कर सकता।

मैंने बहुत निकट से यह सब देखा है। इन दिनों वैसे भी थोड़ी उन्मुक्तता है। मीडिया के दफ्तरों में विचित्र वेशभूषा वाली बालाएं भी होती हैं, जिन पर कई बार मेरी निगाह भी ठिठक कर रह गई है कि अरे यह कौन सा पैरहन है.. जो पंख लगाकर यहां वहां से उड़ता फिरता है.. देह के कई कोने दृश्यमान होते रहते हैं।

कई बार भौंडापन की हदें तोड़ता हुआ और कई बार मूर्खता के अंतहीन अंधकार को भरता हुआ। अब कोई देवी जी यह भी पूछ सकती हैं कि तुम उसे देखते ही क्यों थे भला.. तो मेरा उत्तर यह है कि सामने साक्षात प्रकट हुई ऐसी अनिंद्य सुंदरी को देखना ही पड़ता है। कोई आँख बंद कर तो चलता नहीं। लेकिन यह उनकी अपनी इच्छा है। वे क्या पहनती हैं नहीं पहनती हैं, यह उनका विशेषाधिकार है। उनके पहनावे से उनकी यौनेच्छा का प्राकट्य नहीं होता। कदापि् नहीं। परंतु, अस्सी फीसदी पुरुष मानते हैं कि ऐसे वस्त्रों वाली बाला के दिल में काला है। उसे भोगना या हेरना तो सिद्ध ही समझो !

मीडिया में आधुनिक लोग काम करते हैं। चमक दमक से भरा संसार है। लेकिन उनके भीतर भी वैसा ही नैराश्य और कुंठा है.. जैसा कि सुपौल के लोगों में था। वे भी वैसी ही फब्तियां कस सकते हैं जैसी कि सड़क के लुच्चे कसते हैं। यह संभावना उनमें बनी रहती है।

सिनेमा में भी इसी समाज के लोग काम करते हैं। कोई देवलोक से नहीं आता। और वहां तो और भी खुला माहौल है। परिहास कभी भी सीमा का पुल लांघ सकता है। जब सीमा लांघने पर स्त्री चुप रहती है तो यह मान लिया जाता है कि हां, यह तो तैयार है। इसलिए इसे छूने में कोई हर्ज नहीं है। मैंने मीडिया में कई ठरकी संपादकों को भी छोटी-छोटी लड़कियों को छूने का प्रयास करते हुए देखा है। बल्कि वे तो बेटे कह कर भी बतिया लेते हैं लेकिन भीतर तो गुलशन ग्रोवर बैठा रहता है। वहां न उम्र की सीमा है… न कोई और बंधन है।

यह सब होता रहा है। परंतु, यह इकतरफा भी नहीं है। आधुनिक चेतनासंपन्न होने की दौड़ में लड़कियां लड़खड़ा कर गिर रही हैं। आधुनिक होने का अर्थ पुरातन या नंगा होना भी तो नहीं है। जैसे, मेरी दृष्टि में शर्ट के बटन खोलकर अपना सीना दिखाते हुए चलने वाला पुरुष कोई हीरो नहीं बल्कि टपोरी या लुच्चा है। उसी तरह से महिलाओं द्वारा अपने वक्षस्थल को येन केन प्रकारेण दिखलाने का प्रयास निंदनीय है। या फिर साड़ी पहनते हुए पूरी पीठ ही व्हाइट बोर्ड की तरह उभार देना भी कल्पना से परे है।

दफ्तर में कपड़ों का एक संस्कार तो होना ही चाहिए। यह नहीं चल सकता कि कोई आधुनिक लड़की है तो कुछ भी पहन कर आ जाएगी। परंतु उसके कुछ भी पहन लेने से भी पुरुषों को कुछ भी सोच लेने का अधिकार नहीं है। थोड़ा विचार करना चाहिए कि समय बदल चुका है। अभद्र टिप्पणी भी लिखना और विरोध करने पर लड़कियों को खदेड़ कर मारना भी। वाह ! यह तो बिहार का ही प्रोडक्ट हो सकता है !!

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