पहला कदम है भारत-रूस की डॉलर रहित डील, छुरी चला दी गई है, अब देखिए तमाशा

रूस से S400 एयर डिफेंस सिस्टम की डील ऐतिहासिक है। ये इसलिए क्योंकि डॉलर की जगह रूबल में पेमेंट करने के परिणाम दूरगामी होंगे।

मैं कोई इकोनॉमिस्ट नहीं हूँ लेकिन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार 24 वर्ष से कर रहा हूँ… अनुभव के आधार पर कुछ बातें कहता हूँ।

किसी इकोनॉमिस्ट से बात करके कन्फर्म कर सकते हैं या त्रुटि पर सुझाव दे सकते है… डॉलर से हट के रूपये, रूबल या फिर US$ रहित बिज़नेस करने का मतलब…

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में सबसे ज्यादा चार मुद्राएँ चलती हैं… US$, Euro, GBP और Yen. जब EU देशों से व्यापार करना है तब Euro में पेमेंट, जापान से Yen में, UK से व्यापार GBP में और अमेरिका तथा अन्य सारे विश्व के देशों में US$ में व्यवसाय का स्टैण्डर्ड है।

हालाँकि Canadian डॉलर, सिंगापुर डॉलर और स्विस फ्रैंक भी अंतराष्ट्रीय व्यापार में चलन में हैं लेकिन स्विस फ्रैंक की जगह Euro में कर सकते हैं और अन्य कनाडा तथा सिंगापुर में US$ का ही व्यापार चलता हैं… ये कैसे होता है…

अगर मान लिया कि आपने 1000 US$ का कोई सामान खरीदा – US या किसी भी देश से तथा इस दाम का लैटर ऑफ़ क्रेडिट, या फिर CAD आदि नियमों से पेमेंट करने का आश्वासन दिया तो उस दिन डील 1000$ की फिक्स हो गई… लेकिन अगर 4 हफ्ते बाद जब सामान की डिलीवरी होगी तब बैंक आपके खाते से US$ 1000 आगे बेचने वाले को देगा…

जिस दिन डील फिक्स की उस दिन 1 US$ = 70 Rs था लेकिन जिस दिन पेमेंट किया उस दिन 1 US$ = 71 Rs हो गया, तो बैंक आपके खाते से 71000 Rs काट लेगी न कि 70000 Rs.

पेमेंट उस दिन के रेट से लगता है जिस दिन पैसे भेजा गया… पाने वाले को US $1000 मिला लेकिन भेजने वाले का 71000 Rs लग गया… इसलिए बेचने वाला किसी नुकसान में नहीं रहा लेकिन खरीदने वाले को 1000 Rs का नुकसान हो गया।

अतः कोई भी डील जो US$, Euro, GBP या Yen पर आधारित है, उस डील में पैसा भेजने वाले दिन के खर्चे को माना जाएगा।

अब अगर यही डील रुपये में हो तो जिस दिन आपने 70000 Rs की डील फाइनल किया और एक माह बाद पेमेन्ट का प्रदान हुआ तो उस दिन भी 70000 Rs ही खर्च हुए… और अगर यही डील किसी कमज़ोर मुद्रा जैसे रूबल से हुई तो भी कोई नुकसान नहीं होगा।

मेरे अनुसार इस INR – रूबल डील से कुछ निष्कर्ष निकलते हैं… जिसके नजदीकी और दूरगामी परिणाम होने चाहिए ……

हर US$ डील को US के बैंकिंग सिस्टम से गुज़रना होता है अतः किसी भी देश के US$ पर निर्भर पेमेंट सिस्टम से अमेरिका को पूरे लेन देन का मोटा मोटा पता चल जाता है।

अगर डील US$ से अलग है तो कभी भी पैसा US के बैंकिंग सिस्टम से नहीं गुजरेगा और अमेरिका को कोई खबर नहीं लगेगी कि क्या transaction हुआ है। सारा व्यवसाय US बैंकिंग सिस्टम से होने के कारण हर वैश्विक डील पर अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका की भी खूब कमाई हो जाती है।

भारत-रूस की डॉलर रहित डील ने अमेरिका के बैंकिंग वाले इस सिस्टम को तोड़ा है। अगर इस तरह की और डील होने लगेंगी तो भारत की कंपनियां US बैंकिंग सिस्टम से बाहर काम करने लगेंगी। US$ से लेन देन की अनिवार्यता ख़त्म होगी।

इसके परिणाम ये होंगे कि अमेरिकन निवेशक भारत के बाज़ार में बिकवाली का दौर ज़रूर ला देंगे… शेयर बाज़ार गिरने लगेगा… रूपया कमज़ोर होगा।

हालाँकि ये शेयर बाज़ार के गिरने से आम तौर पर कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा क्योकि अमेरिकी निवेशक अपना नुकसान भी ज्यादा नहीं करवा सकेंगे। एक निश्चित अवधि के बाद शेयर बाज़ार फिर उछलना चालू होगा। उसी निश्चित अवधि के बाद रुपये का टूटना भी रुकेगा। ठीक उसी तर्ज़ पर जैसे पुरानी इमारत गिरा के नई इमारत बनाना… शुरू में दिक्कत लेकिन आने वाले दिनों में कई वर्षों के लिए मज़बूत बाज़ार का आगमन होगा।

अगर ईरान और रूस जैसी कुछ डील भारत और तय करता है तो आने वाले समय में BRICS बैंक का रोल दुनिया में बढ़ेगा… क्योंकि भारत – रूस – चीन – ब्राज़ील – दक्षिण अफ्रीका मिलकर एक कॉमन करेंसी में आपसी व्यापार करने की सहमति जता सकते हैं।

इससे US$ की वैश्विक दादागिरी को न सिर्फ चुनौती मिलेगी बल्कि वह कम भी होगी… चूँकि इसके लिए ज्यादा reserve की ज़रूरत होगी, अभी भारत के पास लगभग 450 Billion US$ का भण्डार है जिसको 2021 तक 600 Billion US$ होना पड़ेगा।

S400 की 5.2 Billion US$ की डील को जिस तरह से पूरी तरह से US के बैंकिंग सिस्टम से अलग रखा है… ये पहला कदम है… छुरी चला दी गई है, आगे आगे तमाशा देखिए…

However it’s not easy… It is going to be a war… not bloody but economical war… Modi has started playing his cards well, he has broken a big global myth… Be ready for a economic upheaval… NaMo is taking country on the path of economical stardom… उसके लिए फिलहाल थोड़ी उथल पुथल को सहना होगा।

शेयर बाज़ार में निवेश करने वाले चाहे तो गिरते शेयरों को खरीद के आगे जबर माल बना सकते हैं… लेकिन शेयर लेकर कम से कम 2 वर्ष के लिए भूल जाओ… वो गिरेगा… गिरेगा… खूब गिरेगा… लेकिन 2 वर्ष में एवरेस्ट फतह करेगा… मैं शेयर बाजार एक्सपर्ट नहीं हूँ इसलिए सलाह है कि किसी इकोनॉमिस्ट से बात कर लें और हमको भी सिखाएँ… Welcome BSE at par with Nasdaq and Nikkei in coming years.

अटल सरकार का कार्य, जो जनता तक कभी पहुंचा ही नहीं

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