जानिए कि क्यों लोकप्रिय होते हैं गांधी-नेहरू, और सावरकर क्यों नहीं

“पेंग्विन ने रामचंद्र गुहा से 97 लाख रुपयों का क़रार किया, जिसके एवज़ में यह तय किया गया कि गुहा उनके लिए दो खंडों में गांधी की बायोग्राफ़ी लिखेंगे और पांच अन्य एन्थॉलॉजीज़ उनके लिए कम्पाइल और एडिट करेंगे। गुहा ने क़रारनामे पर दस्तख़त कर दिए। बाद में खुलासा हुआ कि दूसरे पब्लिशर्स तो एक करोड़ दे रहे थे।”

इस पुस्तक के रिव्यू में एक सज्जन ने एक सुंदर पोस्ट लिखी है, जिसमें से ये ऊपर का परिच्छेद लिया है। चूंकि उनकी जानकारी इन मामलों में पक्की होती है तो इस जानकारी पर मुझे एक अक्षर का भी संदेह नहीं। लेकिन इस लेख के लिए ये पुस्तक और ये जानकारी निमित्त हैं, लेख का उद्देश्य कोई और मुद्दा है जिसपर सीधा आते हैं।

रामचन्द्र गुहा से मेरा कोई परिचय नहीं और मैं उनके पासंग का नहीं हूँ, और उनकी इस कमाई से भी मुझे कोई जलन वगैरह बिलकुल नहीं है यह भी पहले ही स्पष्ट किए देता हूँ।

तो फिर इस लेख का हेतु क्या है, विषय क्या है?

विषय है R o I का, रिटर्न ऑन इनवेस्टमेंट का। निवेश पर होते लाभ का। 97 लाख का निवेश है, कैसे कब चुकाया जाना है यह मैं नहीं जानता और न ही मुझे गुहा जी की आर्थिक स्थिति सुधरने से कोई दिक्कत है।

प्रश्न है कि पेंग्विन एक व्यावसायिक बिज़नस हाउस है और गुहा भले ही एक highly respected historian हों, bestseller author नहीं हैं। क्या उतने की किताबें बिकेंगी जितना निवेश है?

और याद रहे, 97 लाख तो केवल गुहा जी को दिये जा रहे हैं, किताबों की डिजाइन, छपाई, जगह जगह विमोचन, रिव्यू छपवाना, मार्केटिंग, प्रमोशन… कई और बातें होती हैं जिनका अपना खर्चा कई लाखों में जाता है।

अगर गुहा जी का अपना नाम ही बिज़नस की गारंटी हो तो किसी भारतीय प्रकाशक ने क्यों उन्हें ऐसी ऑफर नहीं दी? क्या उन्हें बिज़नस सेंस नहीं है या ये रकम देने की हैसियत नहीं है?

मुझे नहीं लगता कि ऐसा कहा जा सकता है। आज भारतीय प्रकाशन गृह भी सक्षम हैं।

तो फिर बात आती है रिटर्न की। पेंग्विन को कौन सा रिटर्न दिख रहा है जो भारतीय प्रकाशन गृहों को नहीं दिख रहा? या फिर ये वो रिटर्न नहीं जिसे नॉर्मल अकाउंट में लिख सकते हैं?

युद्ध के पहलू वे भी होते हैं जहां शस्त्र अस्त्र अलग ही होते हैं। इतिहास वो शस्त्र है जो आने वाली पीढ़ियों को मानसिक पंगु बना देता है। वहाँ हमेशा अन्यों पर हावी होने का संघर्ष चलता है कि भविष्य में जब संदर्भ मिले तो दूसरा कोई संदर्भ ही न रहे। अपनी तरफ का संदर्भ ही एकमेव संदर्भ हो।

अगर विदेशियों के प्रति अहोभाव रखना प्रजा का स्थायी भाव हो तो प्रसिद्ध और विदेशी प्रकाशकों पर पसंद उतारना समझ में आता है। इसे आप futuristic hegemony कह सकते हैं।

दुर्भाग्य से हिंदुओं को, या साफ कहे तो हिन्दुत्व के पुरोधाओं की ना यह सोच है और ना ही इसकी कोई परवाह। ऐसी लड़ाई का महत्व ही नहीं समझते वे, क्योंकि वह लड़ाई इनको लड़नी नहीं पड़ रही और न ही इनके वंशजों को लड़नी पड़ेगी क्योंकि वे इन अस्त्रों से लड़ेंगे ही नहीं बल्कि उनके प्रभाव में कार्य करेंगे। उनको पता भी नहीं चलेगा अपनी मानसिक गुलामी का, क्योंकि यही स्थापित होगा और सत्य कहलाएगा।

हिन्दू बिज़नस मैन इसलिए इनमें निवेश ही नहीं करता क्योंकि यह लड़ाई उसके लिए आउट ऑफ सिलेबस है और निवेश का कोई रिटर्न नहीं। बाकी रही उसके वंशजों की बात, तो वह यह मानता है कि पैसेवाले होने के कारण वे कहीं भी अपना महत्व बनाए रखेंगे। उन्हें कश्मीर, कैराना और पाकिस्तान की टूर करानी चाहिए जहां संपन्नता कभी हिंदुओं के पास थी।

लेकिन इतिहास पर मिट्टी डालकर आगे बढ़ने को हिंदुओं ने कब न जाने महान गुण मान लिया। कभी ये तो सोचते कि उसी मिट्टी से किस तरह की पौध उग आती है?

वैसे जिन्हें ये सवाल पूछने का मन है कि सरकार इस मामले में क्या कर रही है, या फिर सरकार ऐसे सौदों को रोकती क्यों नहीं, तो पहली बात तो यह है कि देश का संविधान सेक्युलर है इसलिए सरकार ऐसे मामलों का संज्ञान भी नहीं ले सकती क्योंकि इसमें हिंसा की कोई संभावना नहीं और ये सभी अटकलें हैं।

तो सरकार न गुहा को लिखने से रोक सकती है, न पेंग्विन को उनको पैसे देने से। कोई नहीं रोक सकता। केवल हिन्दू समाज अपने पक्ष का निर्माण कर सकता है।

क्या कर सकता है… इस पर पहले ही कई गणित कई बार समझा चुका हूँ। लेकिन भविष्य के गणित समझने की हमारी सामाजिक इच्छा मर चुकी है, और उन गणितों का अर्थ अगर यह है कि हिन्दू का अस्तित्व तो रहेगा लेकिन व्यक्ति विशेष को अपने वंशजों के बारे में कोई स्पष्टता नहीं, तो उसे इस गणित का हिस्सा बनने में रस भी नहीं, मिटता है हिन्दू तो मिटने दो, मुझे तो केवल अपने वंशजों के लिए निवेश करना है, धर्म और समाज का हम ने ठेका थोड़े ही ले रखा है?

गांधी नेहरू क्यों लोकप्रिय होते हैं और सावरकर क्यों नहीं इसका उत्तर इसी में निहित है।

उन लोगों को क्या कहा जाए जिन्होंने ऐसी शर्तें मान ली?

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