मोदी के प्रयासों का एक लक्ष्य है, और वह है गरीबों का सशक्तिकरण

प्रसिद्ध गणितज्ञ जॉर्ज पोल्या के पास कठिन समस्याओं को सुलझाने के लिए एक अच्छी स्ट्राटेजी थी।

उनका मानना था कि अगर आप किसी समस्या को नहीं सुलझा पाते तो उससे निपटने के लिए किसी आसान सी समस्या को ढूंढिए और उसे सुलझा दीजिये।

अब, भारत की स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र की सत्ता नेहरू और उनके राजवंशजों ने हथिया ली। गरीबी, असमानता, विकास की कमी, गंदगी, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार, महिला स्वास्थ्य – इन सभी समस्याओं से देश जूझ रहा था।

राजवंश के लिए यह बहुत बड़ी समस्या हो गई जिसको वह सुलझा नहीं पा रहे थे। इसके लिए उन्होंने इससे ‘आसान’ समस्या को ढूंढ निकाला जिसका नाम उन्होंने सम्प्रदायवाद और पूंजीवाद रख दिया।

इमरजेंसी के समय संविधान की प्रस्तावना में संशोधन करके उन्होंने सेकुलरिज़्म और समाजवाद, ये दोनों शब्द डाल दिए और अहा… देश की समस्या को उन्होंने सुलझा दिया।

जब भी आम जनता शिकायत करेगी कि गरीबी से छुटकारा नहीं मिल रहा, इलाज नहीं हो रहा, शिक्षा व्यवस्था लचर है, असमानता बढ़ रही है, यातायात के साधन अपर्याप्त है, राजवंश स्वयं भ्रष्टाचारी है और भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा दे रहा है… तो उनके सामने सेकुलरिज़्म और समाजवाद का झुनझुना बजा दिया जाता था।

कहा जाता था कि देखो पूंजीवाद और संप्रदायवाद की ‘बड़ी’ समस्या को हमने कैसे सुलझा दिया।

राजवंश ने समाजवाद और सेकुलरिज़्म के नाम पर अपने आप को, अपने नाते रिश्तेदारों और मित्रों को समृद्ध बनाया। अपनी समृद्धि को इन्होंने विकास और सम्पन्नता फैलाकर नहीं किया, बल्कि जनता के पैसे को धोखे से और भ्रष्टाचार से अपनी ओर लूट कर किया।

लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ी समस्याओं को सुलझाना शुरू कर दिया है। पहले गरीबी हटाने की सिर्फ बातें और नारे होते थे। उन्होंने उस कल्चर या संस्कृति को पीछे छोड़ दिया है।

एक मित्र बड़ी मेहनत से प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा किए गए प्रयासों और परिणामों की जानकारी हम सब तक पहुंचाते रहते हैं। कहां पर कितना विकास हुआ, कैसे रेल लाइन बन रही है, फ्रेट कॉरिडोर बन रहे हैं, स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्या हो रहा है, सुदूर क्षेत्रों में सड़कें कैसे बन गई, सब्सिडी कैसे गरीबों तक पहुंच रही है, सब के बारे में वे प्रतिदिन कुछ ना कुछ नई जानकारी देते रहते हैं।

लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा किए गए प्रयासों का एक लक्ष्य है। ऐसा नहीं है कि उन्होंने कहा कि यहां सड़क बना दो, वहां स्वास्थ्य में बीमा कर दो, और राष्ट्र में जीएसटी लागू कर दो।

और वह लक्ष्य है : गरीबों का सशक्तिकरण। देश के गरीब का जीवन ऊपर उठाने के लिए सशक्तिकरण को टूल या औज़ार बनाया गया है। सशक्तिकरण चाहे समाज के कमजोर वर्गो का हो या फिर महिलाओं का, ‘सबका साथ-सबका विकास’ का मूल मंत्र सच्चाई में बदल रहा है।

ग्रामीणों, निचले और मध्यम वर्ग को समृद्ध बनाने के लिए तेज विकास और इनोवेशन की आवश्यकता है, जिससे उत्पादकता बढ़े, जिसके लिए 24 घंटे बिजली चाहिए, ट्रांसपोर्ट चाहिए, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाएं चाहिए, नियमों में पारदर्शिता चाहिए, भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहिए।

इसके लिए भारत की राजनीतिक और आर्थिक संरचना को ही बदलना होगा, जो एक बड़ी समस्या को सुलझाने के समान है। छोटे मोटे संशोधनों या समस्याओं को सुलझाने से काम नहीं चलने जा रहा।

प्रधानमंत्री मोदी यही कर रहे हैं। वह भारत की औपनिवेशिक संरचना को बदल रहे हैं। उस औपनिवेशिक संरचना को, जिसे अंग्रेज़ों ने उस समय के अभिजात्य वर्ग को सौंप दिया; जिसे अभिजात्य वर्ग ने अपना लिया और उसी से अपने परिवार और खानदान को राजनीतिक और आर्थिक सत्ता के शीर्ष पर बनाए रखा। इस कार्य में भ्रष्ट बुद्धिजीवी और मीडिया सहयोग देते हैं।

वे अभिजात्य वर्ग का रचनात्मक विनाश कर रहे हैं। भारत का ट्रांसफॉर्मेशन (समग्र परिवर्तन) कर रहे हैं।

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